भारतकोश
झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography

वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा

DevanagariHindipublished526 पृष्ठ

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२८६ झांसी की रानी खुदाबख्श ने जवाब दिया, 'जरा भी नही। मालिक ने हाथ क्या फेरा, अमृत लुढका दिया । सच कहता हूं, अभी उनकी आज्ञा हो तो घोडे पर बैठकर उस अत्याचारी से दो हाथ करूं ।' फिर उसने करवट लेने की कोशिश की । जरा कष्ट हुआ । एक आह को दबाकर बोला, 'जान पडता है कि श्रीमन्त सरकार मेरे स्वस्थ होने तक नही ठहरेंगी ।' मोतीबाई ने सतृष्ण नेत्रो से कहा, 'मै भी उनके साथ जाऊँगी ।' खुदाबख्श ने आंख मीच ली । बोला, 'आप भी जाओगी ।' 'क्यो ? मुझे क्या हुआ ? उनकी छाया में आदमी आधी बन जाता है, तो औरत क्या आदमी भी नही बन सकती ।' मोतीबाई को रत्नावली नाटक में रंगमंच पर रत्नावली का अभिनय करते देखा था । स्मरण हो आया । एक साथ कोमलता और प्रसूनो के चित्र आंखो में घूम गये । खुदाबख्श ने एक निश्वास लिया । आंखे मूंदे ही बोला, 'मेरी मरहम-पट्टी के लिये रह जाना ।' मोतीबाई ने सस्नेह कहा, 'सरकार से कह देना । मैं खुशी से रह जाऊँगी ।' खुदाबख्श ने आंख खोली । भ्रुकुटि भंग की । जरा रुखाई के साथ बोला, 'श्रीमन्त सरकार से भिक्षा मागूंगा कि रत्नावली को सेवा टहल के लिये दे दीजिये ।' मोतीबाई ने उसकी उपेक्षा की । कहा, 'रत्नावली कौन ?' खुदाबख्श को आश्चर्य हुआ । बोला, 'क्या मैंने रत्नावली कहा ?' मोतीबाई हंसी । उसकी हंसी में चमत्कार था परन्तु खुदाबख्श पर कोई प्रभाव नही पडा । मोतीबाई—'रत्नावली ही तो कहा। क्या कोई सपना देख रहे थे ?' खुदाबख्श—'वह सपना था । अब मीठा जागरण सामने है ।'