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झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography

वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा

DevanagariHindipublished526 पृष्ठ

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लक्ष्मीबाई २८५ रानी ने फिर सिर पर हाथ फेरा। चौकी पर बैठ गई। सहेलिया खडी थी। मोतीबाई सहेलियो के पीछे से खुदाबख्श को एकटक देख रही थी। खुदाबख्श ने उसको देख लिया, परन्तु आखे उसकी मोतीबाई की ओर न थी। खुदाबख्श ने रानी को सागरसिंह की लडाई का व्योरेवार हाल सुनाया। रानी—'कुछ पता चला सागरसिंह अब कहा चला गया है?' खुदाबख्श—'सरकार गाव वाले पता नही बतलाते। वे ही उसको शरण, भोजन इत्यादि सब देते हैं। इतना तो भी मालूम हो गया है कि वह पडोस के जगल मे है।' रानी—'गाव वाले डाकुओ से डरते हैं। उनके पास निर्भय होने का कोई साधन नही है। अग्रेजी राज्य ने पञ्चायतो का सर्वनाश कर दिया है इसलिये गावो में परस्पर सहायता की प्रणाली उठसी गई है और उसने डाकुओ को सहायता देने का रूप पकड़ लिया है। देखू गी। तुम चिन्ता मत करो।' खुदाबख्श—'अब सरकार स्वय यहा आगई हैं। मुझको किस बात की चिन्ता? घाव लगभग अच्छे होगये हैं। एकाध दिन में ठीक हुआ जाता हूँ। फिर देखता हूँ सागरसिंह को।' रानी ने उसको विश्राम करने का हठ किया। मोतीबाई को खुदाबख्श के पास छोडकर, किले के महल वाले हिस्से में चली गईं। स्नान ध्यान में लग गईं। अब मोतीबाई की आखे तरल हुई। रुद्ध कठ मुखरित होने के लिये आकुल हो गया। खुदाबख्श ने देख लिया। बोला, 'यह क्या ! आखो में आसू ! आपको तो हर्ष और गर्व से हँसना चाहिये था। आपका कैदी—नही आपकी सरकार का सिपाही अपने मालिक के लिये कुछ तो कर सका।' मोतीबाई ने आख पोछ कर कहा, 'क्या दर्द बहुत है।'