भारतकोश
झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography

वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा

DevanagariHindipublished526 पृष्ठ

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पृष्ठ 295

२८४ झांसी की रानी पहाडो की कन्दराओ में घुसे हुये, उनको आच्छादित किये हुये वादलो में होकर वह वकुलावलि छिपती हुई सी मालूम पडी और फिर तितर-वितर हुई । जैसे हिलती हुई सावली सलोनी चादर में टके हुये सितारे । पहाड पर बडे बडे और सघन पेड । गहरे हरे श्यामल । बगुले एक पेड पर जा बैठे मानो वनदेवी ने प्रभा छिटका दी हो । उस विषम धार के पार थोडी देर में किनारा दिखलाई दिया । रानी फिर हँसी । बगुलो की सफेदी से रानी के दातो ने तुरन्त होड लगा दी । चिल्लाकर बोली, 'देखो किनारा आ गया । पडाव मार लिया ।' थोडी देर में पूरा दस्ता नदी पार हो गया । सब भीग गये थे परन्तु पीठ पर कसे ढके हुये हथियार लगभग सूखे थे । घोडे ठिठुर गये थे । घाट पर कपडे सुखाने, बदलने में और घोडो को आराम देने में थोडा सा समय लगा । फिर दौड लगी और रानी बरुआसागर के किले में दोपहर के करीब पहुँच गईं । बरवासागर का किला विशाल झील के ठीक ऊपर है । झील में बरवा नाम का बड़ा नाला पडता है । झील को विशालता इस नाले ने ही दी है । घायल सिपाही और खुदाबख्श इसी किले में पडे हुये थे । रानी ने तुरन्त इन सबको देखा । किसी के सिर पर हाथ फेरा, किसी की मरहमपट्टी की देखभाल की । सिपाही अपनी रानी के स्नेह को पाकर मुग्ध और गद्गद् हो गये । फिर खुदाबख्श के पास पहुँची । खुदाबख्श ने चारपाई से उठने का प्रयत्न किया, परन्तु न उठ सका । रानी को देखते ही उसके आंसू आ गये । चरण स्पर्श करने की कोशिश की ।