झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)
Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography
वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२८४ झांसी की रानी पहाडो की कन्दराओ में घुसे हुये, उनको आच्छादित किये हुये वादलो में होकर वह वकुलावलि छिपती हुई सी मालूम पडी और फिर तितर-वितर हुई । जैसे हिलती हुई सावली सलोनी चादर में टके हुये सितारे । पहाड पर बडे बडे और सघन पेड । गहरे हरे श्यामल । बगुले एक पेड पर जा बैठे मानो वनदेवी ने प्रभा छिटका दी हो । उस विषम धार के पार थोडी देर में किनारा दिखलाई दिया । रानी फिर हँसी । बगुलो की सफेदी से रानी के दातो ने तुरन्त होड लगा दी । चिल्लाकर बोली, 'देखो किनारा आ गया । पडाव मार लिया ।' थोडी देर में पूरा दस्ता नदी पार हो गया । सब भीग गये थे परन्तु पीठ पर कसे ढके हुये हथियार लगभग सूखे थे । घोडे ठिठुर गये थे । घाट पर कपडे सुखाने, बदलने में और घोडो को आराम देने में थोडा सा समय लगा । फिर दौड लगी और रानी बरुआसागर के किले में दोपहर के करीब पहुँच गईं । बरवासागर का किला विशाल झील के ठीक ऊपर है । झील में बरवा नाम का बड़ा नाला पडता है । झील को विशालता इस नाले ने ही दी है । घायल सिपाही और खुदाबख्श इसी किले में पडे हुये थे । रानी ने तुरन्त इन सबको देखा । किसी के सिर पर हाथ फेरा, किसी की मरहमपट्टी की देखभाल की । सिपाही अपनी रानी के स्नेह को पाकर मुग्ध और गद्गद् हो गये । फिर खुदाबख्श के पास पहुँची । खुदाबख्श ने चारपाई से उठने का प्रयत्न किया, परन्तु न उठ सका । रानी को देखते ही उसके आंसू आ गये । चरण स्पर्श करने की कोशिश की ।