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झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography

वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा

DevanagariHindipublished526 पृष्ठ

पृष्ठ 294, कुल 526 में से

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लक्ष्मीबाई २८३ फिर क्या था, उनको सहेलियां और सब घुड़सवार धार को चीरते दिखलाई पड़ने लगे । रानी सबसे आगे । बेतवा की धार पुञ्ज के ऊपर पुञ्ज सी दिखलाई पड़ती थी । क्रम अभंग और अनन्त सा । जब एक क्षण में ही अनेक बार एक जलपुञ्ज दूसरे से सघर्ष खाता और एक, दूसरे से, आगे निकल जाने का अनवरत, अथक, अटूट प्रयास करता तब इतना फेनिल हो जाता कि सारी नदी में फेन ही फेन दिखलाई पड़ता था । झाग की इतनी बड़ी निरन्तर बहती और उत्पन्न होती हुई राशियां आड़े आ जाती थीं कि घुड़सवारों को सामने का किनारा नही दिखलाई पड़ पाता था । लहरो के एक पल्लड़ को चीरा, उस पर के झाग को बेधा कि दूसरा सामने । शब्दमय प्रवाह की निरर्थक भाषा मानो बार बार कहती थी बचो, बचो । सामने की उथल पुथल से आगे बढ़े कि बगल से थपेड़ पड़ी । घोड़े आँखें फाड़े नथनो से जल फुफकारते बढ़ रहे थे । वे अपना और अपने सवार का संकट समझ रहे थे । सवार के पैर घोड़े से चिमटे हुये और उनके पैरो के नीचे घोड़े की निस्तब्ध टाप । और टाप के नीचे ? न जाने कितनी गहराई । सवारो के चारो ओर भँवरे पड़ पड़ जा रही थी । एक भंवर बनी, पार की, कि दूसरी तुरन्त मौजूद । परन्तु अपनी रानी और उनकी सहेलियो को आगे देखकर किस सिपाही के मनमें अधिक समय तक भय ठहर सकता था ? रानी के घोड़े का केवल सिर ऊपर, शेष भाग पानी और झाग में । रानी की कमर तक झाग, पानी और धार के साथ बहकर आया हुआ झाड़ी-झंखाड़ । धार की बूँदो की झड़ी उचट उचट कर आखो में, बालो पर और सारे शरीर पर बरस रही थी । जब कभी सिपाहियो और सहेलियो को उत्साह देना होता तो हँस हँसकर शाबाशी देती—मानो प्रचण्ड बेतवा की मलिन अञ्जलि में मुक्ता बरसा दिये हो । घूमरे बादलो के आगे एक ओर बगुलो की पात निकल गई । मानो पहाड़ियो और पहाड़ियो से मिलने वाले बादलो को सफेद कोर लगा दी हो ।

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