भारतकोश
झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography

वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा

DevanagariHindipublished526 पृष्ठ

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२८२ झांसी की रानी भी जा सकता है, परन्तु मै इस समय प्रदर्शन बचाना चाहती हूँ, और वह सवारी बहुत धीमी भी है ।' मोतीबाई—'सरकार को कुछ घुडसवार साथ में ले लेने चाहिये ।' रानी—'लूंगी । दीवान रघुनाथसिंह को सबेरे सूचना दे देना ।' काशीबाई—'मै भी चलूंगी ।' रानी—'चलना, मैं क्या रोकती हूँ ?' मोतीबाई--'आज्ञा हो तो मै भी चलूं ।' रानी--'नाव न लगी तो घोडे पर नदी पार कर लेगी ?' मोतीबाई--'सरकार की सेवा में रहते, मुझको आग-पानी, किसी का भी डर नही रहा ।' रानी ने स्वीकृत किया । रात में पानी थोडा थोडा बरसता रहा । सबेरे बादल खुला सा दिखलाई दिया । रानी सहेलियो समेत बरवासागर की ओर चल दी । पच्चीस घुडसवार साथ में ले लिये । दीवान रघुनाथसिंह सङ्ग में । शीघ्र ही घाट पर यह दस्ता पहुच गया । देखे तो बेतवा दोनो पाट दाबे वेग से चली जा रही है । ऊपर ज्यादा पानी बरस गया था, इसलिये बेतवा बेतहाशा इठला गई । हवा, आँधी के रूप में चल रही थी । मल्लाहो के लिये नाव का लगाना असम्भव था । अनेक घुडसवारो के दिल टूटने लगे । उस पार की पहाडियो का लहरियादार सिलसिला हरियाली से ढका हुआ था । बादल के सफेद धूनरे टुकडे पहाडियो की चोटी और हरियाली को चूमने के लिये नभ से उतर उतर कर टकराते चले जा रहे थे । बेतवा का शोर आँधी का साथ पाकर तुमुल हो उठा । रानी ने मुडकर मोतीबाई की ओर देखा । वह उस पार की पहाडियो से टकराते हुये मेघ खण्डो पर दृष्टि जमाये थी । रानी ने आज्ञा दी, 'कूद पड़ो ।' और वे सबसे आगे घोडे पर पानी में धस गईं ।