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झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography

वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा

DevanagariHindipublished526 पृष्ठ

२८२ झांसी की रानी भी जा सकता है, परन्तु मै इस समय प्रदर्शन बचाना चाहती हूँ, और वह सवारी बहुत धीमी भी है ।' मोतीबाई—'सरकार को कुछ घुडसवार साथ में ले लेने चाहिये ।' रानी—'लूंगी । दीवान रघुनाथसिंह को सबेरे सूचना दे देना ।' काशीबाई—'मै भी चलूंगी ।' रानी—'चलना, मैं क्या रोकती हूँ ?' मोतीबाई--'आज्ञा हो तो मै भी चलूं ।' रानी--'नाव न लगी तो घोडे पर नदी पार कर लेगी ?' मोतीबाई--'सरकार की सेवा में रहते, मुझको आग-पानी, किसी का भी डर नही रहा ।' रानी ने स्वीकृत किया । रात में पानी थोडा थोडा बरसता रहा । सबेरे बादल खुला सा दिखलाई दिया । रानी सहेलियो समेत बरवासागर की ओर चल दी । पच्चीस घुडसवार साथ में ले लिये । दीवान रघुनाथसिंह सङ्ग में । शीघ्र ही घाट पर यह दस्ता पहुच गया । देखे तो बेतवा दोनो पाट दाबे वेग से चली जा रही है । ऊपर ज्यादा पानी बरस गया था, इसलिये बेतवा बेतहाशा इठला गई । हवा, आँधी के रूप में चल रही थी । मल्लाहो के लिये नाव का लगाना असम्भव था । अनेक घुडसवारो के दिल टूटने लगे । उस पार की पहाडियो का लहरियादार सिलसिला हरियाली से ढका हुआ था । बादल के सफेद धूनरे टुकडे पहाडियो की चोटी और हरियाली को चूमने के लिये नभ से उतर उतर कर टकराते चले जा रहे थे । बेतवा का शोर आँधी का साथ पाकर तुमुल हो उठा । रानी ने मुडकर मोतीबाई की ओर देखा । वह उस पार की पहाडियो से टकराते हुये मेघ खण्डो पर दृष्टि जमाये थी । रानी ने आज्ञा दी, 'कूद पड़ो ।' और वे सबसे आगे घोडे पर पानी में धस गईं ।

लक्ष्मीबाई २८३ फिर क्या था, उनको सहेलियां और सब घुड़सवार धार को चीरते दिखलाई पड़ने लगे । रानी सबसे आगे । बेतवा की धार पुञ्ज के ऊपर पुञ्ज सी दिखलाई पड़ती थी । क्रम अभंग और अनन्त सा । जब एक क्षण में ही अनेक बार एक जलपुञ्ज दूसरे से सघर्ष खाता और एक, दूसरे से, आगे निकल जाने का अनवरत, अथक, अटूट प्रयास करता तब इतना फेनिल हो जाता कि सारी नदी में फेन ही फेन दिखलाई पड़ता था । झाग की इतनी बड़ी निरन्तर बहती और उत्पन्न होती हुई राशियां आड़े आ जाती थीं कि घुड़सवारों को सामने का किनारा नही दिखलाई पड़ पाता था । लहरो के एक पल्लड़ को चीरा, उस पर के झाग को बेधा कि दूसरा सामने । शब्दमय प्रवाह की निरर्थक भाषा मानो बार बार कहती थी बचो, बचो । सामने की उथल पुथल से आगे बढ़े कि बगल से थपेड़ पड़ी । घोड़े आँखें फाड़े नथनो से जल फुफकारते बढ़ रहे थे । वे अपना और अपने सवार का संकट समझ रहे थे । सवार के पैर घोड़े से चिमटे हुये और उनके पैरो के नीचे घोड़े की निस्तब्ध टाप । और टाप के नीचे ? न जाने कितनी गहराई । सवारो के चारो ओर भँवरे पड़ पड़ जा रही थी । एक भंवर बनी, पार की, कि दूसरी तुरन्त मौजूद । परन्तु अपनी रानी और उनकी सहेलियो को आगे देखकर किस सिपाही के मनमें अधिक समय तक भय ठहर सकता था ? रानी के घोड़े का केवल सिर ऊपर, शेष भाग पानी और झाग में । रानी की कमर तक झाग, पानी और धार के साथ बहकर आया हुआ झाड़ी-झंखाड़ । धार की बूँदो की झड़ी उचट उचट कर आखो में, बालो पर और सारे शरीर पर बरस रही थी । जब कभी सिपाहियो और सहेलियो को उत्साह देना होता तो हँस हँसकर शाबाशी देती—मानो प्रचण्ड बेतवा की मलिन अञ्जलि में मुक्ता बरसा दिये हो । घूमरे बादलो के आगे एक ओर बगुलो की पात निकल गई । मानो पहाड़ियो और पहाड़ियो से मिलने वाले बादलो को सफेद कोर लगा दी हो ।

२८४ झांसी की रानी पहाडो की कन्दराओ में घुसे हुये, उनको आच्छादित किये हुये वादलो में होकर वह वकुलावलि छिपती हुई सी मालूम पडी और फिर तितर-वितर हुई । जैसे हिलती हुई सावली सलोनी चादर में टके हुये सितारे । पहाड पर बडे बडे और सघन पेड । गहरे हरे श्यामल । बगुले एक पेड पर जा बैठे मानो वनदेवी ने प्रभा छिटका दी हो । उस विषम धार के पार थोडी देर में किनारा दिखलाई दिया । रानी फिर हँसी । बगुलो की सफेदी से रानी के दातो ने तुरन्त होड लगा दी । चिल्लाकर बोली, 'देखो किनारा आ गया । पडाव मार लिया ।' थोडी देर में पूरा दस्ता नदी पार हो गया । सब भीग गये थे परन्तु पीठ पर कसे ढके हुये हथियार लगभग सूखे थे । घोडे ठिठुर गये थे । घाट पर कपडे सुखाने, बदलने में और घोडो को आराम देने में थोडा सा समय लगा । फिर दौड लगी और रानी बरुआसागर के किले में दोपहर के करीब पहुँच गईं । बरवासागर का किला विशाल झील के ठीक ऊपर है । झील में बरवा नाम का बड़ा नाला पडता है । झील को विशालता इस नाले ने ही दी है । घायल सिपाही और खुदाबख्श इसी किले में पडे हुये थे । रानी ने तुरन्त इन सबको देखा । किसी के सिर पर हाथ फेरा, किसी की मरहमपट्टी की देखभाल की । सिपाही अपनी रानी के स्नेह को पाकर मुग्ध और गद्गद् हो गये । फिर खुदाबख्श के पास पहुँची । खुदाबख्श ने चारपाई से उठने का प्रयत्न किया, परन्तु न उठ सका । रानी को देखते ही उसके आंसू आ गये । चरण स्पर्श करने की कोशिश की ।

लक्ष्मीबाई २८५ रानी ने फिर सिर पर हाथ फेरा। चौकी पर बैठ गई। सहेलिया खडी थी। मोतीबाई सहेलियो के पीछे से खुदाबख्श को एकटक देख रही थी। खुदाबख्श ने उसको देख लिया, परन्तु आखे उसकी मोतीबाई की ओर न थी। खुदाबख्श ने रानी को सागरसिंह की लडाई का व्योरेवार हाल सुनाया। रानी—'कुछ पता चला सागरसिंह अब कहा चला गया है?' खुदाबख्श—'सरकार गाव वाले पता नही बतलाते। वे ही उसको शरण, भोजन इत्यादि सब देते हैं। इतना तो भी मालूम हो गया है कि वह पडोस के जगल मे है।' रानी—'गाव वाले डाकुओ से डरते हैं। उनके पास निर्भय होने का कोई साधन नही है। अग्रेजी राज्य ने पञ्चायतो का सर्वनाश कर दिया है इसलिये गावो में परस्पर सहायता की प्रणाली उठसी गई है और उसने डाकुओ को सहायता देने का रूप पकड़ लिया है। देखू गी। तुम चिन्ता मत करो।' खुदाबख्श—'अब सरकार स्वय यहा आगई हैं। मुझको किस बात की चिन्ता? घाव लगभग अच्छे होगये हैं। एकाध दिन में ठीक हुआ जाता हूँ। फिर देखता हूँ सागरसिंह को।' रानी ने उसको विश्राम करने का हठ किया। मोतीबाई को खुदाबख्श के पास छोडकर, किले के महल वाले हिस्से में चली गईं। स्नान ध्यान में लग गईं। अब मोतीबाई की आखे तरल हुई। रुद्ध कठ मुखरित होने के लिये आकुल हो गया। खुदाबख्श ने देख लिया। बोला, 'यह क्या ! आखो में आसू ! आपको तो हर्ष और गर्व से हँसना चाहिये था। आपका कैदी—नही आपकी सरकार का सिपाही अपने मालिक के लिये कुछ तो कर सका।' मोतीबाई ने आख पोछ कर कहा, 'क्या दर्द बहुत है।'

२८६ झांसी की रानी खुदाबख्श ने जवाब दिया, 'जरा भी नही। मालिक ने हाथ क्या फेरा, अमृत लुढका दिया । सच कहता हूं, अभी उनकी आज्ञा हो तो घोडे पर बैठकर उस अत्याचारी से दो हाथ करूं ।' फिर उसने करवट लेने की कोशिश की । जरा कष्ट हुआ । एक आह को दबाकर बोला, 'जान पडता है कि श्रीमन्त सरकार मेरे स्वस्थ होने तक नही ठहरेंगी ।' मोतीबाई ने सतृष्ण नेत्रो से कहा, 'मै भी उनके साथ जाऊँगी ।' खुदाबख्श ने आंख मीच ली । बोला, 'आप भी जाओगी ।' 'क्यो ? मुझे क्या हुआ ? उनकी छाया में आदमी आधी बन जाता है, तो औरत क्या आदमी भी नही बन सकती ।' मोतीबाई को रत्नावली नाटक में रंगमंच पर रत्नावली का अभिनय करते देखा था । स्मरण हो आया । एक साथ कोमलता और प्रसूनो के चित्र आंखो में घूम गये । खुदाबख्श ने एक निश्वास लिया । आंखे मूंदे ही बोला, 'मेरी मरहम-पट्टी के लिये रह जाना ।' मोतीबाई ने सस्नेह कहा, 'सरकार से कह देना । मैं खुशी से रह जाऊँगी ।' खुदाबख्श ने आंख खोली । भ्रुकुटि भंग की । जरा रुखाई के साथ बोला, 'श्रीमन्त सरकार से भिक्षा मागूंगा कि रत्नावली को सेवा टहल के लिये दे दीजिये ।' मोतीबाई ने उसकी उपेक्षा की । कहा, 'रत्नावली कौन ?' खुदाबख्श को आश्चर्य हुआ । बोला, 'क्या मैंने रत्नावली कहा ?' मोतीबाई हंसी । उसकी हंसी में चमत्कार था परन्तु खुदाबख्श पर कोई प्रभाव नही पडा । मोतीबाई—'रत्नावली ही तो कहा। क्या कोई सपना देख रहे थे ?' खुदाबख्श—'वह सपना था । अब मीठा जागरण सामने है ।'

लक्ष्मीबाई २८७ मोतीबाई ने खुदाबख्श की आखो में स्नेह को पकडने का प्रयत्न किया। बोली, 'तब मैं खुद तो उनसे नही कह सकूँगी। वह सोचेगी, मैं बहुत तुच्ची हूँ।' 'जी हा,' खुदाबख्श ने जरा सा सिर उठा कर कहा, 'आप चाहती हैं वह आपको बहादुर समझे और मुझे तुच्चा और निकम्मा।' 'मैंने यह तो नही कहा,' मोतीबाई बोली, 'खुदा करे आप जल्दी अच्छे हो जावें', और वह वहा से चली गई। ऊपर की छत को घेरे हुये किले की दीवार थी। दीवार में मुडेरदार खिडकी। उसमे होकर मोतीबाई झील की लहरो को परखने लगी-और रोने लगी। जब उसने रत्नावली का अभिनय किया था इतनी नही रोई थी। नियन्त्रण करके वह अपने काम में लग गई।

२८८ झाँसी की रानी [ ५६ ] सन्ध्या के पहले बरवासागर के मुखिया और पञ्च रानी से मिलने के लिये आये । नज़र न्योछावर हुई । रानी ने सबसे कुशलक्षेम की वार्ता की । जब एकान्त पाया थानेदार ने रानी को सागरसिंह के विषय में सूचना दी । मालूम हुआ कि खिसनी के जङ्गल में आश्रय पाये हुये हैं । खिसनी का जङ्गल बरवासागर से १२ मील था । थानेदार को उन्होने आदेश दिया । 'सवेरे आठ बजे तैयार रहना किसी को मालूम न होने पावे ।' सवेरे सब तैयार हो गये । ठीक समय पर उन्होने मोतीबाई को बुलाकर कहा, 'तुम यही रहो । खुदाबख्श की मरहम पट्टी और देख भाल करना ।' मोतीबाई ने पलके नीची की । बोली, 'मै तो सरकार की सेवा में चलूगी । क्या किसी ने प्रार्थना की है ?' 'नही, मैं ही कह रही हू,' रानी ने उत्तर दिया । मोतीबाई ने चलने का हठ किया । उनकी अन्य सहेलियो ने भी अनुरोध किया । रानी मान गई । रानी अपनी और बरवासागर के थाने की टुकडी को लिये हुये चल दी । उन्होने इस टुकडी के दो भाग किये । एक को दीवान रघुनाथसिंह की अधीनता में रावली की ओर रवाना किया और दूसरी को स्वय लेकर खिसनी के जङ्गल का ओर चलदी । दीवान रघुनाथसिंह ने सागरसिंह की हवेली घेर ली । एक गाव वाले से कहलवा भेजा, 'हथियार डालकर मेरे पास आ जाओ । रानी साहब कुछ रियायत कर देंगी, नही तो हवेली की ईंट से ईंट बजा दूँगा ।' गाव वाले ने कहा, 'कुंवर सागरसिंह हवेली में नही है ।' रघुनाथसिंह—'तब तो हवेली को पटक देने में और भी सुभीता रहेगा ।'

लक्ष्मीबाई २८६ परन्तु जब उसको निश्चय हो गया कि सागरसिंह हवेली में नही है, उसने रानी के पास सन्देशा खिसनी की ओर भेज दिया । खुद हवेली का घेरा डाले रहा । रानी जब जगल को घेरने की योजना तैयार कर रही थी, तब उनको यह सन्देशा मिला। उनका मन कह रहा था कि सागरसिंह इसी डाग में है। जासूस ने घन्टे भर के भीतर सूचना दी, 'दो पहाडियो की दून के सिरे पर एक बडी सी पर्णकुटी बागी खाने पीने की तार मे लगे हुये हैं। उनके पास घोडे हैं। रानी ने दोनो पहाडियो की ऊँचाइयाँ बन्दूक वालो से घिरवा ली और दून के सिरे पर भी कुछ आदमी भेज दिये । स्वय तीनो सहेलियो और मोतीबाई के साथ दून के निकास पर दो कतारो में ओट लेकर घोडो ॅ समेत ठहर गई । उनकी आज्ञा थी कि ऊपर वाले सिपाही धीरे धीरे दून के ढाल की ओर बढे और जब डाकुओ के जरा निकट आ जावें तब बन्दूको की बाढ दगे । ऐसा ही किया गया । डाकू बेहद हडबडा गये । खाना-पीना और साज-सामान छोडकर, घोडो पर न गी पीठ सवार हुये और दून के निकास की ओर भागे । ऊपर, तीन ओर से बन्दूके चल रही थी, परन्तु डाकुओ का एक आदमी भी घायल तक नही हुआ । निकास पर पहुँचते ही उनके ऊपर सामने से पाँच बन्दूके चली । घोडे मरे, डाकू घायल हुये । उन लोगो ने बन्दूको से जवाब दिया, परन्तु रानी का दल आड लिये हुये था । इसलिये कोई प्रभाव नही पडा । डाकू सिर पर पैर रखकर इधर-उधर भागे । काशी, सुन्दर और मोतीबाई ने अलग अलग पीछा किया । रानी और मुन्दर के पास से जो डाकू घोडे पर सवार, जरा पीछे निकला वह सतर्क था । नगी तलवार हाथ में, गले में सोने का जेवर ।

२६० झाँसी की रानी वस्त्र भी उसके अच्छे। जो वर्णन उनको सागरसिंह का मिला था, उससे इस डाकू-सवार की हुलिया मिलती थी। रानी ने निर्णय किया कि यही सागरसिंह है। रानी ने मुन्दर को मुस्कराकर इशारा किया। मुन्दर ने होठ दाबे और सपाटे के साथ उस पर टूटी। रानी दूसरी बगल से। सागरसिंह ने घोडा तेज किया। इन दोनो ने पीछा किया। जब तक मार्ग ऊवड-खावड रहा सागरसिंह वचता हुआ चला गया। जब मार्ग कुछ समस्थल आया, जमीन मुलायम और कीचड वाली मिली। सागरसिंह का घोडा अटकने लगा। रानी और मुन्दर के घोडे बहुत प्रबल थे—दोनो काठियावाडी। सागरसिंह को एक ओर से मुन्दर ने दबाया और दूसरी ओर से रानी ने। रानी गले में हीरो का दमदमाता हुआ कण्ठा डाले थी। उनको देखते ही सागरसिंह समझ गया कि जिस रानी के विषय में बहुत सुना करते थे, वह स्वय आज, इसी क्षण उसके प्राणो की गाहक बनकर आ कूदी है। आत्मरक्षा के भाव से प्रेरित होकर उसने रानी पर वार किया। तुरन्त मुन्दर ने चपल गति से अपनी तलवार उस पर ढाई। वार ओछा पडा, घोडे की पीठ पर। उधर रानी ने घोडे को फुर्ती के साथ जरासा रोका। वह कुछ अगुल पीछे हुई, और सागरसिंह का वार उनके आगे खिंच गया। रानी ने अपनी तलवार ऐसी कसी कि सागरसिंह की तलवार के दो टुकडे हो गये। उसने अपने घोडे को बहुत खीचा दावा, परन्तु उसकी पीठ कट चुकी थी। मुन्दर ने सागरसिंह की गर्दन को ताक कर तलवार उबारी कि रानी ने तुरन्त कहा, 'जीवित पकडना है,' और रानी ने इस तरकीब मे अपना घोडा सागरसिंह की वराबरी पर किया कि वह सट गया। रानी ने सागरसिंह की कमर में अपना हाथ डाला। मुन्दर समझ गई कि क्या करना है। दूसरी ओर से उसने अपना हाथ उसकी कमर में लपेट दिया। और झटका देकर घोड़े पर से उठा लिया। घोडा पीछे रह गया। सागरसिंह ने इस वज्रपाश में से निकलने, खिसकने की बहुत कोशिश की

लक्ष्मीबाई २६१ परन्तु वह सफल न हो सका । उसने अपने दातो को काम में लाने का प्रयत्न किया । रानी ने तुरन्त कहा, 'सावधान, यदि मुह खोला तो तलवार ठूंस दूंगी ।' सागरसिंह को रानी और मुन्दर के बल की प्रतीत हो गई और उसने अपनी रक्षा को अपने भाग्य के हवाले कर दिया । थोडी दूर चलने पर रानी के दस्ते के लोग सिमट आये । सागरसिंह उस वज्रपाश में से निकला और रस्सियो से बाध लिया गया । घोडे पर लाद कर यह टुकडी एक जगह ठहर गई । मोतीबाई, काशी और सुन्दर की बाट देखने लगी । रानी ने बिगुल बजवाया । वे तीनो थोडी देर में उस स्थल पर आ गईं । मालूम हुआ कि बाकी डाकू निकल भागे । दीवान रघुनाथसिंह को समाचार देकर रानी बरवासागर चली आईं । उन्होने कहा, ये भागे हुये डाकू इस समय हाथ न लगेंगे । समय काफी हो चुका है । बरवासागर सन्ध्या के पहले पहुँच जाना चाहिये ।' रानी सन्ध्या के पहले बरवासागर पहुँच गईं । सागरसिंह सख्त पहरे में रख दिया गया । रात होने के पहले रघुनाथसिंह अपने दल समेत आ गया । रानी की बुद्धि और विकट वीरता की घर घर महिमा बखानी जाने लगी । दूसरे दिन गांव गांव में चर्चा फैल गई । समय पर सागरसिंह रानी के सामने पेश किया गया । उसने प्रणाम किया और पैर छूने के लिये हाथ बढाने चाहे । पहरे वालो ने रोक लिया । रानी ने पूछा, 'तुम्हारा नाम ?' उसने उत्तर दिया, 'कुंवर सागरसिंह, श्रीमन्त सरकार ।' रानी मुस्कराई । सागरसिंह उस मुस्कराहट से कांप गया ।' रानी ने कहा, 'कुंवर होकर यह निकृष्ट आचरण कैसा ?' सागरसिंह बोला, 'सरकार, हमारा वश सदा लडाइयो में भाग लेता रहा है । महाराजा ओरछा की सेवा में लडा महाराज छत्रसाल की सेवा में रहकर युद्ध किये । जब अङ्गरेज आये तब उनकी आधीनता जिन

२६२ झाँसी की रानी ठाकुरो ने स्वीकार नही की, उनमे हम लोग भी थे । हमको जब दबाया गया, हम लोग बिगड खडे हुये और डाके डालने लगे । मैं अपने लिये और अपने साथियो के लिये गङ्गाजी की शपथ लेकर कह सकता हूँ कि हम-लोगो ने स्त्रियो और दीन-दरिद्रो को कभी नही सताया ।' रानी ने कहा, 'इन दिनो जिन लोगो पर तुमने डाके डाले वे सब मेरी प्रजा है, अङ्गरेजो की नही । डाके के लिये दण्ड प्राणो का है । तैयार हो आजो । तुम्हारे साथी भी न बचेगे और न तुम्हारे और उनके घर । मिट्टी मे मिलवा दूंगी ।' सागरसिंह ने कनखियो रानी को देखा । उसने इतनी बडी, ऐसी करारी और प्रभापूर्णा आँख न देखी थी । उसको ऐसा लगा मानो साक्षात् दुर्गा सामने खडी है । सागरसिंह बोला, 'सरकार, मै कुछ प्रार्थना कर सकता हू ?' रानी ने अनुमति दी । सागरसिंह ने प्रार्थना की, 'मुझको प्राणदण्ड गोली या तलवार से दिया जाय, फांसी से नही । यदि फांसी दी गई तो मेरा और जाति भर का अपमान होगा । बागी बढ जावेगे । घटेंगे नही सरकार ।' रानी—तुमको यदि छोडदूं तो क्या करोगे ?' सागरसिंह—'श्रीमन्त सरकार के सामने झूठ नही बोलूंगा । यदि काम न मिला तो फिर डाके डालूंगा, परन्तु सरकार के राज्य मे नही । रानी—'यदि मैं कहूँ कि तुम डाके बिलकुल न डालो तो इसके बदले मे क्या चाहोगे ?' सागरसिंह—'सरकार के चरणो की नौकरी, जहा रह कर लडाई में कल की अपेक्षा अधिक पराक्रम दिखला सकूँगा ।' रानी—'तुम्हारे साथी कितने हैं ?' सागरसिंह—'जङ्गल में १५, १६ थे । गावो में ६०, ६५ है और अदृष्ट सहायक मेरे सब नातेदार ।' रानी—'वे लोग क्या करेंगे ?'

लक्ष्मीबाई २६३ सागरसिंह—'सरकार की आज्ञा हुई तो सरकार की सेना में मेरे साथ नोकरी।' रानी—'यदि मैंने आज्ञा न दी तो ?' सागरसिंह— सरकार के राज्य के सिवाय और सब जगह उनकी बगावत का अधिकार-क्षेत्र चाहूंगा।' रानी—'तुमको मैं इसी समय छोड़ दूँ तो सीधे कहा जाओगे ?' सागरसिंह—'सरकार, झासी।' रानी—'तुम सबसे बडी सोगन्ध किसकी मानते हो ?' सागरसिंह—'गगाजी की। सरकार के चरणो की, अपनी तलवार की।' रानी—'मैं तुमको छोडती हू सागरसिंह। सौगन्ध खाओ और अपने साथियो सहित झासी की सेना में भर्ती होजाओ।' सागरसिंह ने सौगन्ध खाई। रानी ने उसको छोड़ दिया। वह उसके पैरो में गिर पडा। हाथ जोड कर बोला, 'सरकार मै झासी चलूँगा। वहा सेना में भर्ती होने के उपरान्त घर लौटूँगा और अपने साथियो की बटोर कर झासी ले आऊँगा। और उन सबको भर्ती कराऊँगा।' 'नही सागरसिंह,' रानी ने कहा, मै बरवासागर तब छोड़ूँगी जब तुम्हारे सब साथी मेरे सामने आ जायें और सौगन्ध खा जाये नही तो मैं उनको पकडूंगी और दड दूँगी।' 'मेरा नाम कु वर सागरसिंह नहीं जो मैंने सरकार के सामने सबो को पेश न किया।' सागरसिंह ने दम्भ को दबाते हुए कहा। आंख में झेंप थी। रानी जरा हँसी। सोचने लगी। बोली, 'तुमको कुँवर शब्द से सम्बोधन करने के पहले मेरा एक और सामन्त इस पदवी के पाने का पात्र है। वही जो तुमको पकडने के लिए तुम्हारी हवेली में पहुँच गया था और जिसको तमने घायल कर दिया था।'

२६४ झाँसी की रानी 'सरकार' सागरसिंह बोला, 'उस दिन यदि मैंने उस सामन्त को घायल न कर पाया होता तो मैं किसी प्रकार भी न बच पाता।' रानी—'वह यही है। अभी अस्वस्थ है।' सागरसिंह—'मैं उसके दर्शन करना चाहता हूँ। क्षमा माँगूँगा।' रानी ने खुदाबख्श की कुशलवार्ता मँगवाई। वह एक सिपाही का सहारा लेकर आ गया। सागरसिंह ने उसको अभिवादन किया। रानी ने कहा, 'क्या हाल है?' खुदाबख्श ने उत्तर दिया, 'इतने बड़े स्वामी की रक्षा होते हुये हाल बुरा हो ही नहीं सकता। जिस समय सरकार के पराक्रम की बात मालूम हुई उसी समय दुख दर्द एक स्वप्न सा हो गया।' रानी ने कहा, 'तुमने सुन लिया होगा कि मैंने अपराधी को छोड़ दिया है।' खुदाबख्श बोला, 'मैंने सरकार की दया का सब हाल सुन लिया।' रानी ने कहा, 'आज से तुम कुंवर खुदाबख्श कहलाओगे और यह कुँवर सागरसिंह। जितने लोग अनोखी सूरवीरी के काम करेंगे, वे सब कुँवर कहलायेंगे और उनका वर्ग कुँवर मंडली के नाम से राज्य के कागज़ पत्रो में सम्बोधित होगा।' खुदाबख्श गद्गद् हो गया। पैर छुये और बोला, 'सरकार, कुंवर मंडली का नाम सच्चा तब होगा जब कदमो की सेवा करते हुये हम सबके सिर कटे।' रानी ने कहा, 'जाओ कुँवर खुदाबख्श आराम करो।' खुदाबख्श बोला, 'माता का आशीर्वाद मिल गया अब आराम ही आराम है।' 'सागरसिंह,' रानी ने कहा, 'तुम्हारा नाम हमारे कागजो में कुँवर युक्त लिखा जावेगा, परन्तु मुझको बारबार कुँवर, राव, दीवान इत्यादि कहने में अड़चन जान पड़ती है। क्या बुरा मानोगे?'

लक्ष्मीबाई २६५ सागरसिंह का गला रुद्ध हो गया । जिस मनुष्य ने एक दीर्घ समय डकैती और वटमारी में विताया था उसको जान पड़ा मेरे भीतर कुछ पवित्र भी है । हाथ जोड कर बोला, 'नही सरकार, कभी नही । यदि मेरा आधा नाम ही लिया जायगा तो बहुत है । मुझको क्षमा किया जाय ।' कुवर रघुनाथसिंह ने कहा, 'जब हम लोग पूरे कुवर की पदवी पर पहुँच जावेगे तव हमारा नाम आधा लिया जावेगा ।'

२६६ झाँसी की रानी [ ५७ ] वरवासागर मे रानी कुल पंद्रह दिन रही। सागरसिंह का पूरा गिरोह हथियार डालकर उनकी शरण मे आ गया और सेना मे भर्ती हो गया। खुदाबख्श चंगा तो उसी दिन से हो चला था, अब स्वस्थ हो गया। रानी झासी ससैन्य लौट आई। लोगो की छाती रानी के पराक्रम से उमङ्ग उठी। नवाब अलीबहादुर रानी को बधाई देने आये। इत्रपान लेकर चले गये। कम से कम मोतीबाई को उनकी बधाई की सचाई में विश्वास नही था। अलीबहादुर और पीरअली में सलाह हुई। अलीबहादुर — पीरअली यह वही सागरसिंह है, जो झाँसी का जेल तोडकर भागा था। रानी ने उसी को नही बल्कि उसके सारे गिरोही डाकुओ को, फौज मे भर्ती कर लिया है। यह सब सरकार बहादुर के खिलाफ तैयारी का सबूत है।' पीरअली — और हुजूर, तुर्रा यह कि उनके नये पुराने कामदार, अङ्गरेज सरकार को इस धोखे मे रखना चाहते हैं कि झाँसी का राज नवाब गवर्नर जनरल बहादुर की तरफ से किया जा रहा है और रानी साहब तो केवल मुन्तजिम हैं।' अलीबहादुर — 'असली बात की इत्तला जबलपुर पहुँचनी चाहिये, जसे हो तैसे।' पीरअली — 'हुजूर का हुक्म हो तो मैं चला जाऊँ। मगर मेरे जाने से शक हो जावेगा।' अलीबहादुर — 'माल का सरिश्तेदार रानी के बुरे सलूक की वजह से नाराज़ हैं। वह इस काम के करने के लिये तैयार हो जावेगा। अगर जाये तो खर्चा मै दे दूँगा। पीरअली — 'मै कहूँगा। वे मान जायेगे। उनको टीकमगढ होकर भेजा जाय। वहा से दीवान नत्थेखा की चिट्ठी और उनके कुछ आदमियो को साथ लेते जावे, क्योकि रास्ते में खतरा है।'

लक्ष्मीबाई २६७ अलीबहादुर—'बिलकुल ठीक है। तुमने इस बात को तलाश किया कि झांसी खास में रानी के खिलाफ कितने आदमी हैं ?' पीरअली—'ऐसे किसी खास आदमी का नाम नहीं ले सकता। मगर औरतों में रानी साहव ने जो इतनी आज़ादी फैला रक्खी है वह ज़रूर बहुत लोगो को खटकती है।' अलीबहादुर—'रानी के खिलाफ बहुत लोग होगे, मगर तुमको वे लोग रानी का आदमी समझने लगे हैं इसलिये अपने मन की बात नहीं बतलाते।' पीरअली—ऐसी हालत में कम से कम कुछ ऐसे आदमी हुजूर के पास तो ज़रूर आते, जो रानी से बैर मानते हो। अलीबहादुर—'हो सकता है। सम्भव है। कम से कम सरश्तेिदार वगैरह उनके बहुत खिलाफ हैं।' नबाव अलीबहादुर ने सरिश्तेदार को इस प्रपञ्च के लिये राज़ी कर लिया। अपनी चिट्ठी दी। वह पहले टीकमगढ गया। टीकमगढ़ से उसने आदमी लिये और रुपया भी। दीवान नत्थेखां को अलीबहादुर की योजना पसन्द आई। उसने अलीबहादुर के पास अपना एक विश्वास्त आदमी भेजा। उसके द्वारा परस्पर सहायता देने की बात निश्चित हो गई। नवाब साहब को आशा हो गई कि किसी दिन नत्थेखां झांसी पर आक्रमण करेगा। वे उस दिन की बाट जोहने लगे। ओर्च्छे के राजा भारतीचन्द के पीछे सन् १७७६ में विक्रमाजीत राजा हुये। राज्य की बहुत हीन अवस्था हो गई थी। राजा के पास केवल ५० सैनिक, १ हाथी और दो घोडे रह गये थे। छ सात बरस में इन्होंने अपने राज्य का फिर विस्तार कर लिया। राजधानी टीकमगढ मे कायम की। सन् १८१२ में अगरेज़ो से सन्धि हुई। इन्होंने अपने जीवनकाल में अपने लडके धर्मपाल को गद्दी दे दी, परन्तु उसका देहान्त हो गया और फिर बहुत वृद्धावस्था में मर गये। इनके भाई ने ७ वर्ष राज्य किया। सन् १८४१ में गद्दी खाली थी। धर्मपाल की विधवा रानी लड़ई दावेदार

२६८ झाँसी की रानी हुईं। सुजानसिंह उक्त वृद्ध राजा के भतीजे थे। उनका रानी लडई से झगडा था। वे झासी चले आये। राजा रघुनाथराव वाले महलो में, नईबस्ती मे, गगाधरराव ने इनको ठहराया था। अलीबहादुर को अपना ठौर छोड़ना पडा था, इसलिये उनके मनमें झासी के राजा के प्रति क्षोभ और भी सघन हो गया। सुजानसिंह के देहान्त के बाद सन् १८५४ में रानी लडई को गोद लेने की अनुमति मिल गई और उन्होने हमीरसिंह को गोद ले लिया। सन् ५७ के विप्लव के समय रानी लडई हमीरसिंह की ओर से अभिभावक थी और नत्थेखा मन्त्री था। इधर-उधर से कुछ अग्रेज़ अफसर भागकर टीकमगढ आये। राज्य ने उनको शरण दी। इन लोगो की सलाह से अलीबहादुर की चिट्ठी जबलपुर भेज दी गई और एक खास दूत द्वारा इनको कहला भेजा कि झासी में अपने अनुकूल एक गिरोहबन्दी कर लो, एकाध झगडा-बखेड़ा हो जाय तो और भी अच्छा, हम ठीक मौके पर टीकमगढ से सेना लेकर आते हैं। नत्थेखा ने तैयारी शुरू कर दी। अलीबहादुर को खुशी हुई। मुहर्रम आने वाला था। उपयुक्त अवसर की कमी न थी। पानी खूब बरस कर यकायक रुक गया। बादल खुल गये। दिन को कडी धूप, रात को घुले हुये निर्मल तारे और शीतल पवन। जनता दिन में परिश्रम करती सन्ध्या समय आमोद-प्रमोद। रात को गहरी नीद में सो जाती। उसके नीचे जो सुरंग तैयार की जा रही थी उसका बिचारी जनता को पता न था। हिन्दू रियासतो में एक ज़माने से शिया मुसलमान काफी संख्या में आ बसे थे। कोई नौकर थे, कोई कारीगर, हकीम, जर्राह इत्यादि। परन्तु संख्या सुन्नी मुसलमानो की अधिक थी। इनमें भी उनाव-दरवाजे की तरफ मेवाती और बडागाव दरवाजे के निकट पठान। इन मुहल्लो में केवल मुसलमान ही न बसते थे—मराठे, ठाकुर तेली, काछी इत्यादि हिन्दू बीच बीच में। बड़ेगाव दरवाजे मसजिद थी और थोडी दूर पर बिहारी

जी का मन्दिर। हिन्दू और मुसलमान, सब, अपने अपने विश्वास के अनुसार परम्परा क्रमागत त्योहारो को मनाते आये थे कभी कोई झंझट खडा नही हुआ। उस साल डोल एकादशी और मुहर्रम एक ही दिन-सोमवार को पडे। सुन्नी मुसलमान ६-१० दिन पहले से ताजियो की तैयारी में लगे— अबकी साल उनको ताजिये और भी अधिक धूमधाम के साथ निकालने थे क्योकि उनकी झासी स्वतन्त्र हो गई थी, उनकी रानी राज्य कर रही थी। मन्दिरो में भी खूब नाच और गान के साथ मनकी ओज प्रस्फुटित हो रही थी। इन दिनो भी झासी के मन्दिरो में जो नित्य नई सजावट की जाती है उनको 'घटा' कहते हैं। किसी दिन नीली घटा, किसी दिन पीली घटा, किसी दिन कोई और। सारे मन्दिर में एक ही प्रकार के रंग के वस्त्र और फूल। यह सब कई दिन एकादशी तक चलता रहा। सोमवार के रोज शाम के समय ताजिये दफनाये जाने को थे और उसी समय विमानो का जलविहार होना था। यदि दोनो धर्म वालो मे मेल- जोल हो तो मजे मे सब रस्में निभा ली जायें, और यदि एक दूसरे से अनमने हो, तो एक डग भी रखने को जगह नही। मोतीबाई और जूही जैसे दिवाली मनाती थी वैसे ही ताजियादारी भी करती थी। और उसी उत्साह के साथ वे मुरली मनोहर के मन्दिर में, जिस समय रानी दर्शन के लिये जाती थी, नृत्य और गान भी करती थी—उन्ही दिनो मुहर्रम के जमाने में। परन्तु उनके इस कार्य पर मुसलमान किसी प्रकार का आक्षेप नही कर रहे थे, क्योकि वे प्रायः रानी के साथ रहा करती थी। दुर्गाबाई सुन्नी मुसलमान थी। वह भी ताजियादारी करती थी और नाचना उसका पेशा था। मन्दिरो में उसके नृत्य की माग थी। वह मन्दिरो में नृत्य के लिये जाने लगी। कुछ मुसलमानो को असगत लगा। चर्चा शुरू हो गई। इस चर्चा में पीरअली ने प्रधान भाग लिया।

३०० झाँसी की रानी सबेरे का समय था। ठंडी हवा चल रही थी, धूप मे तेजी न आई थी। हलवाइयो की दूकान पर ताजी मिठाइया थालो में सजती और विकती चली जा रही थी। दूसरी ओर मालिनो की, फूलो से भरी हुई डलिया थोडी ही देर में खाली होने को थी। दुर्गा नर्तकी ने हलवाई के यहाँ से मिठाई ली और मालिकन के यहा से फूल। मार्ग में एक जगह ठेवा लगा। पैर में जरा सी चोट आई। साथ ही मिठाई के दोने में से कुछ सामान नीचे जा गिरा। उसका मुँह बिदरा। पास से जाने वाला एक आदमी हँस पडा। दूसरे का कष्ट उसका विनोद बना। और भी कुछ लोग हँसे। एक ने कहा, 'उठालो दुर्गा नीचे पडा हुआ सामान, वह भी एक अदा ही होगी।' 'अरे रे मुझको तो लग गई तुम हँसते हो।' दुर्गा हँसती हुई बोली। वही पीरअली भी था। वह भी हँसा था। 'अभी क्या हुआ दुर्गाबाई जी' पीरअली ने कहा, 'जैसा करोगी वैसा पाओगी।' बात कुछ नही थी, परन्तु दुर्गा को आग सी लग गई। पीरअली शिया था। उसकी व्यर्थ बात में कोई गूढ प्रच्छन्नव्यङ्ग अवगत करके बोली, 'तुम कहां के दूध के धुले हो मिया। किसी दिन तुमको भी खुदा ऐसा समझेगा कि याद करोगे।' पीरअली—'मैं तुम सरीखी औरत को मुँह नही लगाना चाहता, अपनी राह देखो।' दुर्गा—'तुम्ही मुँह लगने को फिरते हो। मैं तो ऐसो पर लानत भेजती हू।' पीरअली—'खबरदार जो बदजमानी की। जीभ काटकर फेक दूगा।' दुर्गा—'हां बल-पोरस औरतो पर ही चलाने आये हो पर मेरी जबान काटने आओगे तो मै कौन तुम्हारी जीभ की पूजा करने बैठ जाऊँगी। जानते हो किसका राज है?' पीरअली दात पीस कर रह गया।

लक्ष्मीबाई ३०१ कई लोगो ने 'जाओ जाओ,' 'रहने दो, रहने दो' कहा । ऊपर से झगड़ा रफा दफा हो गया लेकिन भीतर भीतर आग सुलग उठी । 'एक सुन्नी औरत ने, सो भी नर्तकी, वेश्या ने, एक शिया मर्द पर, मुहर्रम के दिनो में लातन भेजी ।' 'शिया सुन्नियो के झगड़े का इस अत्यन्त क्षुद्र घटना के कारण सूत्रपात हुआ । शिया लोग घरो में चुपचाप मातम मनाते हैं। सुन्नियो में भी मातम मनाया जाता है। परन्तु ताजिया इत्यादि बनाने की कोई पाबन्दी नही । तो भी बनाये जाते थे और धूमधाम के साथ निकाले जाते थे । रघुनाथराव के समय में अलीबहादुर का बहुत प्रभाव था । शिया थे । कदाचित् इसलिये भी राज्य की ओर से ताजियो की कोई धूमधाम नही की जाती थी । अलीबहादुर का प्रभाव उठ गया था, परन्तु ताजिया सम्बन्धी परम्परा अवशिष्ट थी । शिया अपने ताजिये चुपचाप निकाल ले जाते थे और उनका समय भी सुन्नियो के ताजियो के निकालने के समय से टक्कर न खाता था । परन्तु एकादशी के दिन डोल भी निकलने थे । दिन में । दिन ही में शिया-सुन्नियो के ताजिये भी निकलने थे । दोपहर दोपहर तक दोनो फिर्को के ताजिये निकल जाये और २ बजे से विमान निकले, यही योजना सम्भव जान पडती थी । पर शिया-सुन्नी इस पर राजी नही दिखलाई पडते थे । दीवान ने समझाने-बुझाने और मनाने की कोशिश की । विफल हुआ । ताजियादार कहते थे — 'हमारा ताजिया तीसरे नम्बर पर उठा करता है । पहले नम्बर वाला पहले उठे और चल पडे और उसके पीछे दूसरे नम्बर वाला, हम तुरन्त उसके पीछे हो जायेगे ।' हमारा पहला नम्बर जरूर है, परन्तु ताजिया हमारा हमेशा तब उठा है जब शियो के ताजिये निकल गये । आप कहते हैं कि नौ बजे