झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)
Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography
वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंलक्ष्मीबाई २६७ अलीबहादुर—'बिलकुल ठीक है। तुमने इस बात को तलाश किया कि झांसी खास में रानी के खिलाफ कितने आदमी हैं ?' पीरअली—'ऐसे किसी खास आदमी का नाम नहीं ले सकता। मगर औरतों में रानी साहव ने जो इतनी आज़ादी फैला रक्खी है वह ज़रूर बहुत लोगो को खटकती है।' अलीबहादुर—'रानी के खिलाफ बहुत लोग होगे, मगर तुमको वे लोग रानी का आदमी समझने लगे हैं इसलिये अपने मन की बात नहीं बतलाते।' पीरअली—ऐसी हालत में कम से कम कुछ ऐसे आदमी हुजूर के पास तो ज़रूर आते, जो रानी से बैर मानते हो। अलीबहादुर—'हो सकता है। सम्भव है। कम से कम सरश्तेिदार वगैरह उनके बहुत खिलाफ हैं।' नबाव अलीबहादुर ने सरिश्तेदार को इस प्रपञ्च के लिये राज़ी कर लिया। अपनी चिट्ठी दी। वह पहले टीकमगढ गया। टीकमगढ़ से उसने आदमी लिये और रुपया भी। दीवान नत्थेखां को अलीबहादुर की योजना पसन्द आई। उसने अलीबहादुर के पास अपना एक विश्वास्त आदमी भेजा। उसके द्वारा परस्पर सहायता देने की बात निश्चित हो गई। नवाब साहब को आशा हो गई कि किसी दिन नत्थेखां झांसी पर आक्रमण करेगा। वे उस दिन की बाट जोहने लगे। ओर्च्छे के राजा भारतीचन्द के पीछे सन् १७७६ में विक्रमाजीत राजा हुये। राज्य की बहुत हीन अवस्था हो गई थी। राजा के पास केवल ५० सैनिक, १ हाथी और दो घोडे रह गये थे। छ सात बरस में इन्होंने अपने राज्य का फिर विस्तार कर लिया। राजधानी टीकमगढ मे कायम की। सन् १८१२ में अगरेज़ो से सन्धि हुई। इन्होंने अपने जीवनकाल में अपने लडके धर्मपाल को गद्दी दे दी, परन्तु उसका देहान्त हो गया और फिर बहुत वृद्धावस्था में मर गये। इनके भाई ने ७ वर्ष राज्य किया। सन् १८४१ में गद्दी खाली थी। धर्मपाल की विधवा रानी लड़ई दावेदार