झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)
Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography
वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२६८ झाँसी की रानी हुईं। सुजानसिंह उक्त वृद्ध राजा के भतीजे थे। उनका रानी लडई से झगडा था। वे झासी चले आये। राजा रघुनाथराव वाले महलो में, नईबस्ती मे, गगाधरराव ने इनको ठहराया था। अलीबहादुर को अपना ठौर छोड़ना पडा था, इसलिये उनके मनमें झासी के राजा के प्रति क्षोभ और भी सघन हो गया। सुजानसिंह के देहान्त के बाद सन् १८५४ में रानी लडई को गोद लेने की अनुमति मिल गई और उन्होने हमीरसिंह को गोद ले लिया। सन् ५७ के विप्लव के समय रानी लडई हमीरसिंह की ओर से अभिभावक थी और नत्थेखा मन्त्री था। इधर-उधर से कुछ अग्रेज़ अफसर भागकर टीकमगढ आये। राज्य ने उनको शरण दी। इन लोगो की सलाह से अलीबहादुर की चिट्ठी जबलपुर भेज दी गई और एक खास दूत द्वारा इनको कहला भेजा कि झासी में अपने अनुकूल एक गिरोहबन्दी कर लो, एकाध झगडा-बखेड़ा हो जाय तो और भी अच्छा, हम ठीक मौके पर टीकमगढ से सेना लेकर आते हैं। नत्थेखा ने तैयारी शुरू कर दी। अलीबहादुर को खुशी हुई। मुहर्रम आने वाला था। उपयुक्त अवसर की कमी न थी। पानी खूब बरस कर यकायक रुक गया। बादल खुल गये। दिन को कडी धूप, रात को घुले हुये निर्मल तारे और शीतल पवन। जनता दिन में परिश्रम करती सन्ध्या समय आमोद-प्रमोद। रात को गहरी नीद में सो जाती। उसके नीचे जो सुरंग तैयार की जा रही थी उसका बिचारी जनता को पता न था। हिन्दू रियासतो में एक ज़माने से शिया मुसलमान काफी संख्या में आ बसे थे। कोई नौकर थे, कोई कारीगर, हकीम, जर्राह इत्यादि। परन्तु संख्या सुन्नी मुसलमानो की अधिक थी। इनमें भी उनाव-दरवाजे की तरफ मेवाती और बडागाव दरवाजे के निकट पठान। इन मुहल्लो में केवल मुसलमान ही न बसते थे—मराठे, ठाकुर तेली, काछी इत्यादि हिन्दू बीच बीच में। बड़ेगाव दरवाजे मसजिद थी और थोडी दूर पर बिहारी