झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)
Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography
वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंजी का मन्दिर। हिन्दू और मुसलमान, सब, अपने अपने विश्वास के अनुसार परम्परा क्रमागत त्योहारो को मनाते आये थे कभी कोई झंझट खडा नही हुआ। उस साल डोल एकादशी और मुहर्रम एक ही दिन-सोमवार को पडे। सुन्नी मुसलमान ६-१० दिन पहले से ताजियो की तैयारी में लगे— अबकी साल उनको ताजिये और भी अधिक धूमधाम के साथ निकालने थे क्योकि उनकी झासी स्वतन्त्र हो गई थी, उनकी रानी राज्य कर रही थी। मन्दिरो में भी खूब नाच और गान के साथ मनकी ओज प्रस्फुटित हो रही थी। इन दिनो भी झासी के मन्दिरो में जो नित्य नई सजावट की जाती है उनको 'घटा' कहते हैं। किसी दिन नीली घटा, किसी दिन पीली घटा, किसी दिन कोई और। सारे मन्दिर में एक ही प्रकार के रंग के वस्त्र और फूल। यह सब कई दिन एकादशी तक चलता रहा। सोमवार के रोज शाम के समय ताजिये दफनाये जाने को थे और उसी समय विमानो का जलविहार होना था। यदि दोनो धर्म वालो मे मेल- जोल हो तो मजे मे सब रस्में निभा ली जायें, और यदि एक दूसरे से अनमने हो, तो एक डग भी रखने को जगह नही। मोतीबाई और जूही जैसे दिवाली मनाती थी वैसे ही ताजियादारी भी करती थी। और उसी उत्साह के साथ वे मुरली मनोहर के मन्दिर में, जिस समय रानी दर्शन के लिये जाती थी, नृत्य और गान भी करती थी—उन्ही दिनो मुहर्रम के जमाने में। परन्तु उनके इस कार्य पर मुसलमान किसी प्रकार का आक्षेप नही कर रहे थे, क्योकि वे प्रायः रानी के साथ रहा करती थी। दुर्गाबाई सुन्नी मुसलमान थी। वह भी ताजियादारी करती थी और नाचना उसका पेशा था। मन्दिरो में उसके नृत्य की माग थी। वह मन्दिरो में नृत्य के लिये जाने लगी। कुछ मुसलमानो को असगत लगा। चर्चा शुरू हो गई। इस चर्चा में पीरअली ने प्रधान भाग लिया।