झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)
Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography
वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३०० झाँसी की रानी सबेरे का समय था। ठंडी हवा चल रही थी, धूप मे तेजी न आई थी। हलवाइयो की दूकान पर ताजी मिठाइया थालो में सजती और विकती चली जा रही थी। दूसरी ओर मालिनो की, फूलो से भरी हुई डलिया थोडी ही देर में खाली होने को थी। दुर्गा नर्तकी ने हलवाई के यहाँ से मिठाई ली और मालिकन के यहा से फूल। मार्ग में एक जगह ठेवा लगा। पैर में जरा सी चोट आई। साथ ही मिठाई के दोने में से कुछ सामान नीचे जा गिरा। उसका मुँह बिदरा। पास से जाने वाला एक आदमी हँस पडा। दूसरे का कष्ट उसका विनोद बना। और भी कुछ लोग हँसे। एक ने कहा, 'उठालो दुर्गा नीचे पडा हुआ सामान, वह भी एक अदा ही होगी।' 'अरे रे मुझको तो लग गई तुम हँसते हो।' दुर्गा हँसती हुई बोली। वही पीरअली भी था। वह भी हँसा था। 'अभी क्या हुआ दुर्गाबाई जी' पीरअली ने कहा, 'जैसा करोगी वैसा पाओगी।' बात कुछ नही थी, परन्तु दुर्गा को आग सी लग गई। पीरअली शिया था। उसकी व्यर्थ बात में कोई गूढ प्रच्छन्नव्यङ्ग अवगत करके बोली, 'तुम कहां के दूध के धुले हो मिया। किसी दिन तुमको भी खुदा ऐसा समझेगा कि याद करोगे।' पीरअली—'मैं तुम सरीखी औरत को मुँह नही लगाना चाहता, अपनी राह देखो।' दुर्गा—'तुम्ही मुँह लगने को फिरते हो। मैं तो ऐसो पर लानत भेजती हू।' पीरअली—'खबरदार जो बदजमानी की। जीभ काटकर फेक दूगा।' दुर्गा—'हां बल-पोरस औरतो पर ही चलाने आये हो पर मेरी जबान काटने आओगे तो मै कौन तुम्हारी जीभ की पूजा करने बैठ जाऊँगी। जानते हो किसका राज है?' पीरअली दात पीस कर रह गया।