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झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography

वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा

DevanagariHindipublished526 पृष्ठ

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लक्ष्मीबाई ३०१ कई लोगो ने 'जाओ जाओ,' 'रहने दो, रहने दो' कहा । ऊपर से झगड़ा रफा दफा हो गया लेकिन भीतर भीतर आग सुलग उठी । 'एक सुन्नी औरत ने, सो भी नर्तकी, वेश्या ने, एक शिया मर्द पर, मुहर्रम के दिनो में लातन भेजी ।' 'शिया सुन्नियो के झगड़े का इस अत्यन्त क्षुद्र घटना के कारण सूत्रपात हुआ । शिया लोग घरो में चुपचाप मातम मनाते हैं। सुन्नियो में भी मातम मनाया जाता है। परन्तु ताजिया इत्यादि बनाने की कोई पाबन्दी नही । तो भी बनाये जाते थे और धूमधाम के साथ निकाले जाते थे । रघुनाथराव के समय में अलीबहादुर का बहुत प्रभाव था । शिया थे । कदाचित् इसलिये भी राज्य की ओर से ताजियो की कोई धूमधाम नही की जाती थी । अलीबहादुर का प्रभाव उठ गया था, परन्तु ताजिया सम्बन्धी परम्परा अवशिष्ट थी । शिया अपने ताजिये चुपचाप निकाल ले जाते थे और उनका समय भी सुन्नियो के ताजियो के निकालने के समय से टक्कर न खाता था । परन्तु एकादशी के दिन डोल भी निकलने थे । दिन में । दिन ही में शिया-सुन्नियो के ताजिये भी निकलने थे । दोपहर दोपहर तक दोनो फिर्को के ताजिये निकल जाये और २ बजे से विमान निकले, यही योजना सम्भव जान पडती थी । पर शिया-सुन्नी इस पर राजी नही दिखलाई पडते थे । दीवान ने समझाने-बुझाने और मनाने की कोशिश की । विफल हुआ । ताजियादार कहते थे — 'हमारा ताजिया तीसरे नम्बर पर उठा करता है । पहले नम्बर वाला पहले उठे और चल पडे और उसके पीछे दूसरे नम्बर वाला, हम तुरन्त उसके पीछे हो जायेगे ।' हमारा पहला नम्बर जरूर है, परन्तु ताजिया हमारा हमेशा तब उठा है जब शियो के ताजिये निकल गये । आप कहते हैं कि नौ बजे