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झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography

वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा

DevanagariHindipublished526 पृष्ठ

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पृष्ठ 313

३०२ झाँसी की रानी से ताज़िये निकालना शुरू कर दो। हम तैयार हैं, परन्तु शियो के ताज़िये पहले निकलवा दीजिये।' और शियो के ताज़िये उतने सवेरे निकल नही सकते थे। विवश कोई किसी को कर नही सकता था। धर्म का मामला ठहरा ! अच्छा यही था कि यह झंझट दो दिन पहले खडा हो गया था ! शिया लोग अपने ताजिये यदि आतुरता के साथ बडे भोर निकाल भी ले जाते तो भी इसमें सन्देह था कि सुन्नी अपने ताज़िये हर साल के समय के प्रतिकूल दफना देते या नही। पीरअली इस झंझट में कही भी ऊपर नही दिखलाई पडता था, परन्तु भीतर भीतर उसकी उत्प्रेरणा मौजूद थी। जब दीवान समस्या को न हल कर सका तब उसने कोतवाली से पुराने कागज मँगवाये। परन्तु पुराने कागज विप्लव के आरम्भ में ही भस्मीभूत हो चुके थे—और उनसे कुछ सहायता मिल भी नही सकती थी। दीवान हैरान था। निदान मामला रानी के सामने पहुँचा। हिन्दू-मुसलमानो की भीड इकट्ठी हो गई। रानी ने समझने का यत्न किया। लडाना-भिडाना चाहती तो सहज ही ऐसा कर सकती थी, परन्तु वे तो मेल कराने पर तुली हुई थी। जब वे कोई सुझाव देती तो सब 'बहुत ठीक सरकार,' बहुत ठीक सरकार' कह देते और थोडी देर चुप रहने के बाद 'किन्तु' 'परन्तु' करने लगते। रानी ने यकायक कहा 'क्या इतने हिन्दू-मुसलमानो में कोई ऐसा नही जो इस कठिनाई को हल कर दे?' महल के पडोस मे एक बढई रहता था। वह आगे आया। उसने विनय की, 'सरकार मै कुछ निवेदन करना चाहता हू।' रानी— कहा ।'