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झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography

वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा

DevanagariHindipublished526 पृष्ठ

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लक्ष्मीबाई ३०३ बढ़ई—'सरकार राम और रहीम सबसे बड़े हैं । उसी तरह उनका मन्दिर विमान से बड़ा और इनकी मसजिद ताजिया से बड़ी । मसजिद में रहीम की पूजा की जाती है। मैं मसजिद बनाकर ठीक समय पर निकाल दूंगा । सब ताज़िये उसके साथ निकल जाना चाहिये । आगे पीछे का कोई सवाल नही खड़ा होता ।' सुन्नी ताज़ियेदार सहमत हो गये । 'मसजिद बेशक सबसे बड़ी ।' 'मसजिद ज़रूर सबसे आगे रहेगी !' 'मसजिद के पीछे पीछे हम सबके ताज़िये चलेंगे ।' उस बढ़ई ने दो दिन के भीतर कागज और भोडर की एक सुन्दर मसजिद बनाई । एकादशी के दिन ठीक समय पर सब ताज़िये निकल गये । सबसे आगे बढ़ई की मसजिद थी । हिन्दुओ के विमानो को निकलने में कुछ विलम्ब हो गया, परन्तु इसका किसी ने बुरा न माना । इस प्रकार वह उठता हुआ तूफान बिना प्रयास के ठंडा हो गया । परन्तु दूसरा तूफान जो उठ खड़ा हुआ था वह न बैठ सका । नत्थे खा ने तैयारी करली थी । झाँसी में झगडा खड़ा हो जाता तो अच्छा ही था, नही खड़ा हुआ तो भी उसको प्रहार करना ही था । वह एकादशी के दो दिन बाद ओर्छा में ससैन्य आगया । तीसरे दिन अनन्त चतुर्दशी थी ।x* अनन्त चतुर्दशी के दिन भोर होते ही नत्थेखा का दूत दीवान के पास आया । • X कहते हैं कि यह बीस सहस्र सेना लेकर आया था । *अनन्त चतुर्दशी उस साल तीन सितम्बर को थी ।