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झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography

वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा

DevanagariHindipublished526 पृष्ठ

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३०४ झाँसी की रानी [ ५८ ] नत्थेखा के दूत ने जो सदेसा दिया, उसका सार यह था कि झाँसी पहले ओर्छा का अंश था, वह अनुचित प्रकार से ओर्छा से काट दिया गया, अब ओर्छा को वापिस मिलना चाहिये। अङ्गरेज जो पाच सहस्र मासिक वृत्ति रानी साहब को देते थे उन्हे ज्यो की त्यो मिलती रहेगी, किला नगर और शस्त्र हमारे हवाले करदो। नगर में समाचार फैलते देर न लगी। नईबस्ती से, जहा अलीबहादुर का निवास था, खबर फैली कि नत्थेखा फौज लेकर आ भी गया है और शहर के चारो ओर घेरा पड गया है। लोग घबरा गये। मोतीबाई ने रानी को समाचार दिया, 'नत्थेखा बीस सहस्र सेना और अनेक तोपे लेकर ओर्छा से कूच करने वाला है।' रानी ने पूछा, 'वह ओर्छे में आया कब?' 'कल आया था,' मोतीबाई ने उत्तर दिया। रानी ने कर्मचारियो से विचार-विमर्श किया। झासी में अच्छी तैयारी न थी। कर्मचारी सब घबराहट में थे। अकेली रानी धैर्य धारण किये थी। उन्होने कहा, 'राजनीति की आप लोग जानो। युद्ध का संचालन मै करती हूँ। नत्थेखा को भागने के लिये कठिनता से गली मिलेगी।' नाना भोपटकर ने अनुरोध किया, 'सरकार विजय की मूर्ति हैं। हमको युद्ध के अन्तिम परिणाम के विषय मे कोई सन्देह नही। यदि सरकार को मेरी राजनीति मे विश्वास है, तो मेरी एक प्रार्थना मानी जाय।' रानी ने स्वीकार किया। भोपटकर ने कहा, हमारे यहा अङ्गरेज झडा, यूनियन-जैक रक्खा हुआ है। अपने झडे के साथ हम उसको भी खडा करेगे। किले में जो अङ्गरेज बन्द हो गये थे उनमे से एक मार्टिन नाम का व्यक्ति, फौज वालो के हाथ से भाग निकला था। वह आग्रा में है। एक चिट्ठी मे उसकों इस प्रकार की लिखूँगा कि हम लोग नत्थेखा के विरुद्ध अगरेज़ो की ओर