झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)
Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography
वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२६६ झाँसी की रानी [ ५७ ] वरवासागर मे रानी कुल पंद्रह दिन रही। सागरसिंह का पूरा गिरोह हथियार डालकर उनकी शरण मे आ गया और सेना मे भर्ती हो गया। खुदाबख्श चंगा तो उसी दिन से हो चला था, अब स्वस्थ हो गया। रानी झासी ससैन्य लौट आई। लोगो की छाती रानी के पराक्रम से उमङ्ग उठी। नवाब अलीबहादुर रानी को बधाई देने आये। इत्रपान लेकर चले गये। कम से कम मोतीबाई को उनकी बधाई की सचाई में विश्वास नही था। अलीबहादुर और पीरअली में सलाह हुई। अलीबहादुर — पीरअली यह वही सागरसिंह है, जो झाँसी का जेल तोडकर भागा था। रानी ने उसी को नही बल्कि उसके सारे गिरोही डाकुओ को, फौज मे भर्ती कर लिया है। यह सब सरकार बहादुर के खिलाफ तैयारी का सबूत है।' पीरअली — और हुजूर, तुर्रा यह कि उनके नये पुराने कामदार, अङ्गरेज सरकार को इस धोखे मे रखना चाहते हैं कि झाँसी का राज नवाब गवर्नर जनरल बहादुर की तरफ से किया जा रहा है और रानी साहब तो केवल मुन्तजिम हैं।' अलीबहादुर — 'असली बात की इत्तला जबलपुर पहुँचनी चाहिये, जसे हो तैसे।' पीरअली — 'हुजूर का हुक्म हो तो मैं चला जाऊँ। मगर मेरे जाने से शक हो जावेगा।' अलीबहादुर — 'माल का सरिश्तेदार रानी के बुरे सलूक की वजह से नाराज़ हैं। वह इस काम के करने के लिये तैयार हो जावेगा। अगर जाये तो खर्चा मै दे दूँगा। पीरअली — 'मै कहूँगा। वे मान जायेगे। उनको टीकमगढ होकर भेजा जाय। वहा से दीवान नत्थेखा की चिट्ठी और उनके कुछ आदमियो को साथ लेते जावे, क्योकि रास्ते में खतरा है।'