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झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography

वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा

DevanagariHindipublished526 पृष्ठ

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पृष्ठ 305

२६४ झाँसी की रानी 'सरकार' सागरसिंह बोला, 'उस दिन यदि मैंने उस सामन्त को घायल न कर पाया होता तो मैं किसी प्रकार भी न बच पाता।' रानी—'वह यही है। अभी अस्वस्थ है।' सागरसिंह—'मैं उसके दर्शन करना चाहता हूँ। क्षमा माँगूँगा।' रानी ने खुदाबख्श की कुशलवार्ता मँगवाई। वह एक सिपाही का सहारा लेकर आ गया। सागरसिंह ने उसको अभिवादन किया। रानी ने कहा, 'क्या हाल है?' खुदाबख्श ने उत्तर दिया, 'इतने बड़े स्वामी की रक्षा होते हुये हाल बुरा हो ही नहीं सकता। जिस समय सरकार के पराक्रम की बात मालूम हुई उसी समय दुख दर्द एक स्वप्न सा हो गया।' रानी ने कहा, 'तुमने सुन लिया होगा कि मैंने अपराधी को छोड़ दिया है।' खुदाबख्श बोला, 'मैंने सरकार की दया का सब हाल सुन लिया।' रानी ने कहा, 'आज से तुम कुंवर खुदाबख्श कहलाओगे और यह कुँवर सागरसिंह। जितने लोग अनोखी सूरवीरी के काम करेंगे, वे सब कुँवर कहलायेंगे और उनका वर्ग कुँवर मंडली के नाम से राज्य के कागज़ पत्रो में सम्बोधित होगा।' खुदाबख्श गद्गद् हो गया। पैर छुये और बोला, 'सरकार, कुंवर मंडली का नाम सच्चा तब होगा जब कदमो की सेवा करते हुये हम सबके सिर कटे।' रानी ने कहा, 'जाओ कुँवर खुदाबख्श आराम करो।' खुदाबख्श बोला, 'माता का आशीर्वाद मिल गया अब आराम ही आराम है।' 'सागरसिंह,' रानी ने कहा, 'तुम्हारा नाम हमारे कागजो में कुँवर युक्त लिखा जावेगा, परन्तु मुझको बारबार कुँवर, राव, दीवान इत्यादि कहने में अड़चन जान पड़ती है। क्या बुरा मानोगे?'