झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)
Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography
वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा
लक्ष्मीबाई २६३ सागरसिंह—'सरकार की आज्ञा हुई तो सरकार की सेना में मेरे साथ नोकरी।' रानी—'यदि मैंने आज्ञा न दी तो ?' सागरसिंह— सरकार के राज्य के सिवाय और सब जगह उनकी बगावत का अधिकार-क्षेत्र चाहूंगा।' रानी—'तुमको मैं इसी समय छोड़ दूँ तो सीधे कहा जाओगे ?' सागरसिंह—'सरकार, झासी।' रानी—'तुम सबसे बडी सोगन्ध किसकी मानते हो ?' सागरसिंह—'गगाजी की। सरकार के चरणो की, अपनी तलवार की।' रानी—'मैं तुमको छोडती हू सागरसिंह। सौगन्ध खाओ और अपने साथियो सहित झासी की सेना में भर्ती होजाओ।' सागरसिंह ने सौगन्ध खाई। रानी ने उसको छोड़ दिया। वह उसके पैरो में गिर पडा। हाथ जोड कर बोला, 'सरकार मै झासी चलूँगा। वहा सेना में भर्ती होने के उपरान्त घर लौटूँगा और अपने साथियो की बटोर कर झासी ले आऊँगा। और उन सबको भर्ती कराऊँगा।' 'नही सागरसिंह,' रानी ने कहा, मै बरवासागर तब छोड़ूँगी जब तुम्हारे सब साथी मेरे सामने आ जायें और सौगन्ध खा जाये नही तो मैं उनको पकडूंगी और दड दूँगी।' 'मेरा नाम कु वर सागरसिंह नहीं जो मैंने सरकार के सामने सबो को पेश न किया।' सागरसिंह ने दम्भ को दबाते हुए कहा। आंख में झेंप थी। रानी जरा हँसी। सोचने लगी। बोली, 'तुमको कुँवर शब्द से सम्बोधन करने के पहले मेरा एक और सामन्त इस पदवी के पाने का पात्र है। वही जो तुमको पकडने के लिए तुम्हारी हवेली में पहुँच गया था और जिसको तमने घायल कर दिया था।'
२६४ झाँसी की रानी 'सरकार' सागरसिंह बोला, 'उस दिन यदि मैंने उस सामन्त को घायल न कर पाया होता तो मैं किसी प्रकार भी न बच पाता।' रानी—'वह यही है। अभी अस्वस्थ है।' सागरसिंह—'मैं उसके दर्शन करना चाहता हूँ। क्षमा माँगूँगा।' रानी ने खुदाबख्श की कुशलवार्ता मँगवाई। वह एक सिपाही का सहारा लेकर आ गया। सागरसिंह ने उसको अभिवादन किया। रानी ने कहा, 'क्या हाल है?' खुदाबख्श ने उत्तर दिया, 'इतने बड़े स्वामी की रक्षा होते हुये हाल बुरा हो ही नहीं सकता। जिस समय सरकार के पराक्रम की बात मालूम हुई उसी समय दुख दर्द एक स्वप्न सा हो गया।' रानी ने कहा, 'तुमने सुन लिया होगा कि मैंने अपराधी को छोड़ दिया है।' खुदाबख्श बोला, 'मैंने सरकार की दया का सब हाल सुन लिया।' रानी ने कहा, 'आज से तुम कुंवर खुदाबख्श कहलाओगे और यह कुँवर सागरसिंह। जितने लोग अनोखी सूरवीरी के काम करेंगे, वे सब कुँवर कहलायेंगे और उनका वर्ग कुँवर मंडली के नाम से राज्य के कागज़ पत्रो में सम्बोधित होगा।' खुदाबख्श गद्गद् हो गया। पैर छुये और बोला, 'सरकार, कुंवर मंडली का नाम सच्चा तब होगा जब कदमो की सेवा करते हुये हम सबके सिर कटे।' रानी ने कहा, 'जाओ कुँवर खुदाबख्श आराम करो।' खुदाबख्श बोला, 'माता का आशीर्वाद मिल गया अब आराम ही आराम है।' 'सागरसिंह,' रानी ने कहा, 'तुम्हारा नाम हमारे कागजो में कुँवर युक्त लिखा जावेगा, परन्तु मुझको बारबार कुँवर, राव, दीवान इत्यादि कहने में अड़चन जान पड़ती है। क्या बुरा मानोगे?'
लक्ष्मीबाई २६५ सागरसिंह का गला रुद्ध हो गया । जिस मनुष्य ने एक दीर्घ समय डकैती और वटमारी में विताया था उसको जान पड़ा मेरे भीतर कुछ पवित्र भी है । हाथ जोड कर बोला, 'नही सरकार, कभी नही । यदि मेरा आधा नाम ही लिया जायगा तो बहुत है । मुझको क्षमा किया जाय ।' कुवर रघुनाथसिंह ने कहा, 'जब हम लोग पूरे कुवर की पदवी पर पहुँच जावेगे तव हमारा नाम आधा लिया जावेगा ।'
२६६ झाँसी की रानी [ ५७ ] वरवासागर मे रानी कुल पंद्रह दिन रही। सागरसिंह का पूरा गिरोह हथियार डालकर उनकी शरण मे आ गया और सेना मे भर्ती हो गया। खुदाबख्श चंगा तो उसी दिन से हो चला था, अब स्वस्थ हो गया। रानी झासी ससैन्य लौट आई। लोगो की छाती रानी के पराक्रम से उमङ्ग उठी। नवाब अलीबहादुर रानी को बधाई देने आये। इत्रपान लेकर चले गये। कम से कम मोतीबाई को उनकी बधाई की सचाई में विश्वास नही था। अलीबहादुर और पीरअली में सलाह हुई। अलीबहादुर — पीरअली यह वही सागरसिंह है, जो झाँसी का जेल तोडकर भागा था। रानी ने उसी को नही बल्कि उसके सारे गिरोही डाकुओ को, फौज मे भर्ती कर लिया है। यह सब सरकार बहादुर के खिलाफ तैयारी का सबूत है।' पीरअली — और हुजूर, तुर्रा यह कि उनके नये पुराने कामदार, अङ्गरेज सरकार को इस धोखे मे रखना चाहते हैं कि झाँसी का राज नवाब गवर्नर जनरल बहादुर की तरफ से किया जा रहा है और रानी साहब तो केवल मुन्तजिम हैं।' अलीबहादुर — 'असली बात की इत्तला जबलपुर पहुँचनी चाहिये, जसे हो तैसे।' पीरअली — 'हुजूर का हुक्म हो तो मैं चला जाऊँ। मगर मेरे जाने से शक हो जावेगा।' अलीबहादुर — 'माल का सरिश्तेदार रानी के बुरे सलूक की वजह से नाराज़ हैं। वह इस काम के करने के लिये तैयार हो जावेगा। अगर जाये तो खर्चा मै दे दूँगा। पीरअली — 'मै कहूँगा। वे मान जायेगे। उनको टीकमगढ होकर भेजा जाय। वहा से दीवान नत्थेखा की चिट्ठी और उनके कुछ आदमियो को साथ लेते जावे, क्योकि रास्ते में खतरा है।'
लक्ष्मीबाई २६७ अलीबहादुर—'बिलकुल ठीक है। तुमने इस बात को तलाश किया कि झांसी खास में रानी के खिलाफ कितने आदमी हैं ?' पीरअली—'ऐसे किसी खास आदमी का नाम नहीं ले सकता। मगर औरतों में रानी साहव ने जो इतनी आज़ादी फैला रक्खी है वह ज़रूर बहुत लोगो को खटकती है।' अलीबहादुर—'रानी के खिलाफ बहुत लोग होगे, मगर तुमको वे लोग रानी का आदमी समझने लगे हैं इसलिये अपने मन की बात नहीं बतलाते।' पीरअली—ऐसी हालत में कम से कम कुछ ऐसे आदमी हुजूर के पास तो ज़रूर आते, जो रानी से बैर मानते हो। अलीबहादुर—'हो सकता है। सम्भव है। कम से कम सरश्तेिदार वगैरह उनके बहुत खिलाफ हैं।' नबाव अलीबहादुर ने सरिश्तेदार को इस प्रपञ्च के लिये राज़ी कर लिया। अपनी चिट्ठी दी। वह पहले टीकमगढ गया। टीकमगढ़ से उसने आदमी लिये और रुपया भी। दीवान नत्थेखां को अलीबहादुर की योजना पसन्द आई। उसने अलीबहादुर के पास अपना एक विश्वास्त आदमी भेजा। उसके द्वारा परस्पर सहायता देने की बात निश्चित हो गई। नवाब साहब को आशा हो गई कि किसी दिन नत्थेखां झांसी पर आक्रमण करेगा। वे उस दिन की बाट जोहने लगे। ओर्च्छे के राजा भारतीचन्द के पीछे सन् १७७६ में विक्रमाजीत राजा हुये। राज्य की बहुत हीन अवस्था हो गई थी। राजा के पास केवल ५० सैनिक, १ हाथी और दो घोडे रह गये थे। छ सात बरस में इन्होंने अपने राज्य का फिर विस्तार कर लिया। राजधानी टीकमगढ मे कायम की। सन् १८१२ में अगरेज़ो से सन्धि हुई। इन्होंने अपने जीवनकाल में अपने लडके धर्मपाल को गद्दी दे दी, परन्तु उसका देहान्त हो गया और फिर बहुत वृद्धावस्था में मर गये। इनके भाई ने ७ वर्ष राज्य किया। सन् १८४१ में गद्दी खाली थी। धर्मपाल की विधवा रानी लड़ई दावेदार
२६८ झाँसी की रानी हुईं। सुजानसिंह उक्त वृद्ध राजा के भतीजे थे। उनका रानी लडई से झगडा था। वे झासी चले आये। राजा रघुनाथराव वाले महलो में, नईबस्ती मे, गगाधरराव ने इनको ठहराया था। अलीबहादुर को अपना ठौर छोड़ना पडा था, इसलिये उनके मनमें झासी के राजा के प्रति क्षोभ और भी सघन हो गया। सुजानसिंह के देहान्त के बाद सन् १८५४ में रानी लडई को गोद लेने की अनुमति मिल गई और उन्होने हमीरसिंह को गोद ले लिया। सन् ५७ के विप्लव के समय रानी लडई हमीरसिंह की ओर से अभिभावक थी और नत्थेखा मन्त्री था। इधर-उधर से कुछ अग्रेज़ अफसर भागकर टीकमगढ आये। राज्य ने उनको शरण दी। इन लोगो की सलाह से अलीबहादुर की चिट्ठी जबलपुर भेज दी गई और एक खास दूत द्वारा इनको कहला भेजा कि झासी में अपने अनुकूल एक गिरोहबन्दी कर लो, एकाध झगडा-बखेड़ा हो जाय तो और भी अच्छा, हम ठीक मौके पर टीकमगढ से सेना लेकर आते हैं। नत्थेखा ने तैयारी शुरू कर दी। अलीबहादुर को खुशी हुई। मुहर्रम आने वाला था। उपयुक्त अवसर की कमी न थी। पानी खूब बरस कर यकायक रुक गया। बादल खुल गये। दिन को कडी धूप, रात को घुले हुये निर्मल तारे और शीतल पवन। जनता दिन में परिश्रम करती सन्ध्या समय आमोद-प्रमोद। रात को गहरी नीद में सो जाती। उसके नीचे जो सुरंग तैयार की जा रही थी उसका बिचारी जनता को पता न था। हिन्दू रियासतो में एक ज़माने से शिया मुसलमान काफी संख्या में आ बसे थे। कोई नौकर थे, कोई कारीगर, हकीम, जर्राह इत्यादि। परन्तु संख्या सुन्नी मुसलमानो की अधिक थी। इनमें भी उनाव-दरवाजे की तरफ मेवाती और बडागाव दरवाजे के निकट पठान। इन मुहल्लो में केवल मुसलमान ही न बसते थे—मराठे, ठाकुर तेली, काछी इत्यादि हिन्दू बीच बीच में। बड़ेगाव दरवाजे मसजिद थी और थोडी दूर पर बिहारी
जी का मन्दिर। हिन्दू और मुसलमान, सब, अपने अपने विश्वास के अनुसार परम्परा क्रमागत त्योहारो को मनाते आये थे कभी कोई झंझट खडा नही हुआ। उस साल डोल एकादशी और मुहर्रम एक ही दिन-सोमवार को पडे। सुन्नी मुसलमान ६-१० दिन पहले से ताजियो की तैयारी में लगे— अबकी साल उनको ताजिये और भी अधिक धूमधाम के साथ निकालने थे क्योकि उनकी झासी स्वतन्त्र हो गई थी, उनकी रानी राज्य कर रही थी। मन्दिरो में भी खूब नाच और गान के साथ मनकी ओज प्रस्फुटित हो रही थी। इन दिनो भी झासी के मन्दिरो में जो नित्य नई सजावट की जाती है उनको 'घटा' कहते हैं। किसी दिन नीली घटा, किसी दिन पीली घटा, किसी दिन कोई और। सारे मन्दिर में एक ही प्रकार के रंग के वस्त्र और फूल। यह सब कई दिन एकादशी तक चलता रहा। सोमवार के रोज शाम के समय ताजिये दफनाये जाने को थे और उसी समय विमानो का जलविहार होना था। यदि दोनो धर्म वालो मे मेल- जोल हो तो मजे मे सब रस्में निभा ली जायें, और यदि एक दूसरे से अनमने हो, तो एक डग भी रखने को जगह नही। मोतीबाई और जूही जैसे दिवाली मनाती थी वैसे ही ताजियादारी भी करती थी। और उसी उत्साह के साथ वे मुरली मनोहर के मन्दिर में, जिस समय रानी दर्शन के लिये जाती थी, नृत्य और गान भी करती थी—उन्ही दिनो मुहर्रम के जमाने में। परन्तु उनके इस कार्य पर मुसलमान किसी प्रकार का आक्षेप नही कर रहे थे, क्योकि वे प्रायः रानी के साथ रहा करती थी। दुर्गाबाई सुन्नी मुसलमान थी। वह भी ताजियादारी करती थी और नाचना उसका पेशा था। मन्दिरो में उसके नृत्य की माग थी। वह मन्दिरो में नृत्य के लिये जाने लगी। कुछ मुसलमानो को असगत लगा। चर्चा शुरू हो गई। इस चर्चा में पीरअली ने प्रधान भाग लिया।
३०० झाँसी की रानी सबेरे का समय था। ठंडी हवा चल रही थी, धूप मे तेजी न आई थी। हलवाइयो की दूकान पर ताजी मिठाइया थालो में सजती और विकती चली जा रही थी। दूसरी ओर मालिनो की, फूलो से भरी हुई डलिया थोडी ही देर में खाली होने को थी। दुर्गा नर्तकी ने हलवाई के यहाँ से मिठाई ली और मालिकन के यहा से फूल। मार्ग में एक जगह ठेवा लगा। पैर में जरा सी चोट आई। साथ ही मिठाई के दोने में से कुछ सामान नीचे जा गिरा। उसका मुँह बिदरा। पास से जाने वाला एक आदमी हँस पडा। दूसरे का कष्ट उसका विनोद बना। और भी कुछ लोग हँसे। एक ने कहा, 'उठालो दुर्गा नीचे पडा हुआ सामान, वह भी एक अदा ही होगी।' 'अरे रे मुझको तो लग गई तुम हँसते हो।' दुर्गा हँसती हुई बोली। वही पीरअली भी था। वह भी हँसा था। 'अभी क्या हुआ दुर्गाबाई जी' पीरअली ने कहा, 'जैसा करोगी वैसा पाओगी।' बात कुछ नही थी, परन्तु दुर्गा को आग सी लग गई। पीरअली शिया था। उसकी व्यर्थ बात में कोई गूढ प्रच्छन्नव्यङ्ग अवगत करके बोली, 'तुम कहां के दूध के धुले हो मिया। किसी दिन तुमको भी खुदा ऐसा समझेगा कि याद करोगे।' पीरअली—'मैं तुम सरीखी औरत को मुँह नही लगाना चाहता, अपनी राह देखो।' दुर्गा—'तुम्ही मुँह लगने को फिरते हो। मैं तो ऐसो पर लानत भेजती हू।' पीरअली—'खबरदार जो बदजमानी की। जीभ काटकर फेक दूगा।' दुर्गा—'हां बल-पोरस औरतो पर ही चलाने आये हो पर मेरी जबान काटने आओगे तो मै कौन तुम्हारी जीभ की पूजा करने बैठ जाऊँगी। जानते हो किसका राज है?' पीरअली दात पीस कर रह गया।
लक्ष्मीबाई ३०१ कई लोगो ने 'जाओ जाओ,' 'रहने दो, रहने दो' कहा । ऊपर से झगड़ा रफा दफा हो गया लेकिन भीतर भीतर आग सुलग उठी । 'एक सुन्नी औरत ने, सो भी नर्तकी, वेश्या ने, एक शिया मर्द पर, मुहर्रम के दिनो में लातन भेजी ।' 'शिया सुन्नियो के झगड़े का इस अत्यन्त क्षुद्र घटना के कारण सूत्रपात हुआ । शिया लोग घरो में चुपचाप मातम मनाते हैं। सुन्नियो में भी मातम मनाया जाता है। परन्तु ताजिया इत्यादि बनाने की कोई पाबन्दी नही । तो भी बनाये जाते थे और धूमधाम के साथ निकाले जाते थे । रघुनाथराव के समय में अलीबहादुर का बहुत प्रभाव था । शिया थे । कदाचित् इसलिये भी राज्य की ओर से ताजियो की कोई धूमधाम नही की जाती थी । अलीबहादुर का प्रभाव उठ गया था, परन्तु ताजिया सम्बन्धी परम्परा अवशिष्ट थी । शिया अपने ताजिये चुपचाप निकाल ले जाते थे और उनका समय भी सुन्नियो के ताजियो के निकालने के समय से टक्कर न खाता था । परन्तु एकादशी के दिन डोल भी निकलने थे । दिन में । दिन ही में शिया-सुन्नियो के ताजिये भी निकलने थे । दोपहर दोपहर तक दोनो फिर्को के ताजिये निकल जाये और २ बजे से विमान निकले, यही योजना सम्भव जान पडती थी । पर शिया-सुन्नी इस पर राजी नही दिखलाई पडते थे । दीवान ने समझाने-बुझाने और मनाने की कोशिश की । विफल हुआ । ताजियादार कहते थे — 'हमारा ताजिया तीसरे नम्बर पर उठा करता है । पहले नम्बर वाला पहले उठे और चल पडे और उसके पीछे दूसरे नम्बर वाला, हम तुरन्त उसके पीछे हो जायेगे ।' हमारा पहला नम्बर जरूर है, परन्तु ताजिया हमारा हमेशा तब उठा है जब शियो के ताजिये निकल गये । आप कहते हैं कि नौ बजे
३०२ झाँसी की रानी से ताज़िये निकालना शुरू कर दो। हम तैयार हैं, परन्तु शियो के ताज़िये पहले निकलवा दीजिये।' और शियो के ताज़िये उतने सवेरे निकल नही सकते थे। विवश कोई किसी को कर नही सकता था। धर्म का मामला ठहरा ! अच्छा यही था कि यह झंझट दो दिन पहले खडा हो गया था ! शिया लोग अपने ताजिये यदि आतुरता के साथ बडे भोर निकाल भी ले जाते तो भी इसमें सन्देह था कि सुन्नी अपने ताज़िये हर साल के समय के प्रतिकूल दफना देते या नही। पीरअली इस झंझट में कही भी ऊपर नही दिखलाई पडता था, परन्तु भीतर भीतर उसकी उत्प्रेरणा मौजूद थी। जब दीवान समस्या को न हल कर सका तब उसने कोतवाली से पुराने कागज मँगवाये। परन्तु पुराने कागज विप्लव के आरम्भ में ही भस्मीभूत हो चुके थे—और उनसे कुछ सहायता मिल भी नही सकती थी। दीवान हैरान था। निदान मामला रानी के सामने पहुँचा। हिन्दू-मुसलमानो की भीड इकट्ठी हो गई। रानी ने समझने का यत्न किया। लडाना-भिडाना चाहती तो सहज ही ऐसा कर सकती थी, परन्तु वे तो मेल कराने पर तुली हुई थी। जब वे कोई सुझाव देती तो सब 'बहुत ठीक सरकार,' बहुत ठीक सरकार' कह देते और थोडी देर चुप रहने के बाद 'किन्तु' 'परन्तु' करने लगते। रानी ने यकायक कहा 'क्या इतने हिन्दू-मुसलमानो में कोई ऐसा नही जो इस कठिनाई को हल कर दे?' महल के पडोस मे एक बढई रहता था। वह आगे आया। उसने विनय की, 'सरकार मै कुछ निवेदन करना चाहता हू।' रानी— कहा ।'
लक्ष्मीबाई ३०३ बढ़ई—'सरकार राम और रहीम सबसे बड़े हैं । उसी तरह उनका मन्दिर विमान से बड़ा और इनकी मसजिद ताजिया से बड़ी । मसजिद में रहीम की पूजा की जाती है। मैं मसजिद बनाकर ठीक समय पर निकाल दूंगा । सब ताज़िये उसके साथ निकल जाना चाहिये । आगे पीछे का कोई सवाल नही खड़ा होता ।' सुन्नी ताज़ियेदार सहमत हो गये । 'मसजिद बेशक सबसे बड़ी ।' 'मसजिद ज़रूर सबसे आगे रहेगी !' 'मसजिद के पीछे पीछे हम सबके ताज़िये चलेंगे ।' उस बढ़ई ने दो दिन के भीतर कागज और भोडर की एक सुन्दर मसजिद बनाई । एकादशी के दिन ठीक समय पर सब ताज़िये निकल गये । सबसे आगे बढ़ई की मसजिद थी । हिन्दुओ के विमानो को निकलने में कुछ विलम्ब हो गया, परन्तु इसका किसी ने बुरा न माना । इस प्रकार वह उठता हुआ तूफान बिना प्रयास के ठंडा हो गया । परन्तु दूसरा तूफान जो उठ खड़ा हुआ था वह न बैठ सका । नत्थे खा ने तैयारी करली थी । झाँसी में झगडा खड़ा हो जाता तो अच्छा ही था, नही खड़ा हुआ तो भी उसको प्रहार करना ही था । वह एकादशी के दो दिन बाद ओर्छा में ससैन्य आगया । तीसरे दिन अनन्त चतुर्दशी थी ।x* अनन्त चतुर्दशी के दिन भोर होते ही नत्थेखा का दूत दीवान के पास आया । • X कहते हैं कि यह बीस सहस्र सेना लेकर आया था । *अनन्त चतुर्दशी उस साल तीन सितम्बर को थी ।
३०४ झाँसी की रानी [ ५८ ] नत्थेखा के दूत ने जो सदेसा दिया, उसका सार यह था कि झाँसी पहले ओर्छा का अंश था, वह अनुचित प्रकार से ओर्छा से काट दिया गया, अब ओर्छा को वापिस मिलना चाहिये। अङ्गरेज जो पाच सहस्र मासिक वृत्ति रानी साहब को देते थे उन्हे ज्यो की त्यो मिलती रहेगी, किला नगर और शस्त्र हमारे हवाले करदो। नगर में समाचार फैलते देर न लगी। नईबस्ती से, जहा अलीबहादुर का निवास था, खबर फैली कि नत्थेखा फौज लेकर आ भी गया है और शहर के चारो ओर घेरा पड गया है। लोग घबरा गये। मोतीबाई ने रानी को समाचार दिया, 'नत्थेखा बीस सहस्र सेना और अनेक तोपे लेकर ओर्छा से कूच करने वाला है।' रानी ने पूछा, 'वह ओर्छे में आया कब?' 'कल आया था,' मोतीबाई ने उत्तर दिया। रानी ने कर्मचारियो से विचार-विमर्श किया। झासी में अच्छी तैयारी न थी। कर्मचारी सब घबराहट में थे। अकेली रानी धैर्य धारण किये थी। उन्होने कहा, 'राजनीति की आप लोग जानो। युद्ध का संचालन मै करती हूँ। नत्थेखा को भागने के लिये कठिनता से गली मिलेगी।' नाना भोपटकर ने अनुरोध किया, 'सरकार विजय की मूर्ति हैं। हमको युद्ध के अन्तिम परिणाम के विषय मे कोई सन्देह नही। यदि सरकार को मेरी राजनीति मे विश्वास है, तो मेरी एक प्रार्थना मानी जाय।' रानी ने स्वीकार किया। भोपटकर ने कहा, हमारे यहा अङ्गरेज झडा, यूनियन-जैक रक्खा हुआ है। अपने झडे के साथ हम उसको भी खडा करेगे। किले में जो अङ्गरेज बन्द हो गये थे उनमे से एक मार्टिन नाम का व्यक्ति, फौज वालो के हाथ से भाग निकला था। वह आग्रा में है। एक चिट्ठी मे उसकों इस प्रकार की लिखूँगा कि हम लोग नत्थेखा के विरुद्ध अगरेज़ो की ओर
लक्ष्मीबाई ३०५ से लड रहे हैं। मेरी राजनीति को इस चिट्ठी से सहायता मिलेगी।' रानी बोली, 'परन्तु यह राजनीति चलेगी कितने दिनो ? हमारी अन्त में, सारे देश में स्वराज्य स्थापित करना है। यूनियन जैक झडे के नीचे स्वराज्य की स्थापना असंभव है। चिट्ठी चाहे जिसको मनमानी लिखो, परन्तु झडा तो चिट्ठी से बहुत बडा होता है।' 'सरकार,' भोपटकर ने कहा, चिट्ठी और झडे का सामञ्जस्य है। हम कुछ समय तक अपने आदर्श को ढका मुँदा रखना चाहते हैं। यदि स्वराज्य का प्रयत्न देश भर मे ३१ मई को एक साथ ही हो गया होता, तो राजनीति की दिशा कुछ और होती, परन्तु अब उसमे परिवर्तन आवश्यक है।' लालाभाऊ बख्शी बोला, 'सरकार देखने के दात कुछ और, खाने कुछ और। भोपटकर साहब का यही तात्पर्य है।' रानी मुस्कराईं। दरबारियो ने समझ लिया कि उन्होने कोई दृढ निश्चय कर लिया है। 'नाना की बात को मैं नही टाल सकती हू,' रानी ने कहा, 'परन्तु गेरुआ झडा सबसे ऊपर की बुर्ज पर रहेगा और अङ्गरेजो का झडा चाहे जहा, नीचे की बुर्ज पर लगा लो।' मन्त्रिमडल ने स्वीकार किया। रानी बोली, 'लालाभाऊ, तोपो का तुरन्त प्रबन्ध करो। जवाहरसिंह रघुनाथसिंह इत्यादि को सावधान करो। सब फाटक बन्द करके फाटको की बुर्जो पर गोला बारूद इसी समय जमा करो। नत्थेखा कई ओर से आक्रमण करेगा। किले पर बडी तोपें चढी हैं?' भाऊ ने उत्तर दिया, 'सरकार, केवल कडक बिजली नीचे रक्खी है। उसको अभी चढवाता हू और सरकार की अन्य आज्ञाओ का पालन करता हू। दीवान जवाहरसिंह यही हैं, परन्तु दीवान रघुनाथसिंह उनाव की ओर गये हुये हैं!' रानी - 'तुरन्त बुलाओ।'
३०६ झाँसी की रानी भाऊ—‘जो आज्ञा सरकार ।’ रानी—‘बरुवासागर वाला सागरसिंह कहा है ?’ भाऊ—‘मऊवाले काशीनाथ भैया के साथ करेरा की ओर गये हुये हैं।’ रानी—‘दोनो को वहा से बुलवाओ । सेना हमारे पास बहुत थोडी है । यदि नत्थेखा वास्तव में २० सहस्र सेना लेकर आ रहा है, तो कर्रा सामना पडेगा, परन्तु चिन्ता मत करो । हमारे पास किला है। बुर्जे और तोपे हैं । और गोलन्दाज अच्छे हैं ।’ भाऊ—‘गोलन्दाज हमारे पास कुछ कम हैं, परन्तु सरकार का जैसा आदेश होगा, उनकी वैसी ही नियुक्ति कर ली जावेगी ।’ रानी—‘मै कुछ स्त्रियो को तोपची का काम सिखलाना चाहती थी, अभी उनकी शिक्षा पूरी नही हो पाई है, इसलिये गुलाम गौसखा को ओर्छा दरवाजे के लिये तैयार रक्खो और तुम स्वय किले की दक्षिणी बुर्ज पर कडक बिजली चढाकर काम करो । मै अपनी स्त्री सेना को लेकर सब मोर्चों पर जवाहरसिंह की और गौस की सहायता करूंगी । बस्ती वालो से कह दो कि निश्चिन्त रहे परन्तु भीड बाघकर बाहर न चले फिरे ।’ भोपटकर ने मार्टिन के नाम एक पत्र आगरा भेजा, और नीचे वाली बुर्ज पर यूनियन जैक झंडा चढा दिया । ओर्छा के दूत को नत्थेखा के सन्देसे का उत्तर दिया कि लक्ष्मीबाई एक स्त्री हैं, खासाहब को अबला की रक्षा करनी चाहिये न कि उसके साथ इस प्रकार का व्यवहार । रानी अङ्गरेजो की ओर से झासी का प्रबन्ध कर रही हैं, ओर्छा अङ्गरेजो का मित्र राज्य है, इसलिये ओर्छा की ओर से झासी पर आक्रमण होना बिलकुल अनुचित है यदि आक्रमण हुआ तो झासी अपनी रक्षा करेगी । दूत संदेसे का उत्तर लेकर तुरन्त चला गया । रानी ने दीवान से कहा, ‘मुझे खेद है कि झासी के समग्र निवासी युद्ध विद्या में निपुण नही किये जा सके है । मै नत्थेखा से निबटलूॅ तब अवश्य इस ओर अधिक ध्यान दूंगी ।’
लक्ष्मीबाई ३०७ इसके उपरान्त वह अनन्त चतुर्दशा की पूजा के उपकरणो में संलग्न हो गई । जवाहरसिंह, कर्नल ज़माखा, भाऊ बख्शी, गुलाम गौसखा इत्यादि अपने काम में जोर के साथ जुट पडे । उनके लिये एक एक क्षण महत्व का था । भाऊ बख्शी ने कडकबिजली दक्षिण की ऊँची बुर्ज पर चढादी । गुलाम गौसखा एक बडी तोप और कई छोटी तोपे लेकर ओर्छे दरवाजे पर पहुच गया । सब फाटको की बुर्जों पर तोपें रख दी गईं । उनका मसाला तथा गोलन्दाज भी यथा स्थान नियुक्त कर दिये गये । जवाहरसिंह की सेना फाटको और परकोटे के दीवारो के छेदों के पास बन्दूकें लेकर डट गई । उन सब के भोजन और शयन का वही प्रबन्ध हो गया । चार पाच घण्टे के भीतर झासी ने रणक्षेत्र का रूप धारण कर लिया । तीसरे पहर लगभग ३ बजे रानी अनन्त चतुर्दशी का पूजन समाप्त करने को ही थी कि एक धडाका हुआ । दामोदरराव को अनन्त रक्षा का गडा बँधवा कर बाहर हुई थी कि समाचार मिला, 'नत्थेखा ने चढाई करदी है और गोला शायद शहर में गिरा है ।' रानी ने दिन भर उपवास किया था । थोडा सा फलाहार किया । इतने में समाचार आया कि टकसाल के पीछे एक सेठ के मकान में गोला गिरा है । रानी ने कल्पना की कि या तो नत्थेखा का गोलन्दाज अनजान है, इतने बडे किले को उसने अनी पर नही साध पाया या काफी चतुर है—अनुमान से महल को निशाना बनाया, परन्तु गोले ने करवट ले ली और महल को बचा गया । योद्धा वेश में तुरन्त घोडे पर सवार हुईं और अपनी तीनो सहेलियो को लेकर ओर्छे दरवाजे पहुची । गुलाम गौसखा को आज्ञा दी, 'शत्रु इसी ओर है । गोलो की लगातार वर्षा करो ।' काशीबाई से कहा, 'तू तुरन्त किले पर जा । बख्शी से कहना कि जैसे ही नत्थेखा की सेना टौरियो का आश्रय लेने के लिये पश्चिम में
सैयर फाटक की ओर बढे, कडकबिजली की मार करे। जब तक उसकी सेना ओर्छा फाटक से पश्चिम की ओर न बढे, कडकबिजली चुप बनी रहे।' काशीबाई तुरन्त गई। गौस ने अपने तोपखाने को सभाला। एक के बाद दूसरी तोप पर पलीता पडना शुरू हुआ ११ तोपे थी। जब तक अन्तिम तोप गोला उगलती तब तक पहली विनाश-वमन के लिये तैयार हो जाती। गोला, बारूद और काम करने वाले सुव्यवस्थित। ओर्छा फाटक के पूर्व उत्तर की ओर थोडी दूरी पर सागर खिडकी और उससे कुछ अधिक दूरी पर लक्ष्मी फाटक था। सुन्दर और मुन्दर के साथ रानी सागर खिडकी पर आई। इस खिडकी से पश्चिम की ओर ओर्छा फाटक की तरफ-कुछ ही डग के फासले पर एक मुहरी थी। नगर के दक्षिणी भाग के पानी का बहाव इसी में होकर था। यह मुहरी इतनी बड़ी थी कि नाटे कद का आदमी आसानी से इसमें होकर निकल सकता था। सागर खिडकी के ऊपर जो तोपे थी, उनमे से एक को रानी ने, इस मुहरी के ऊपर दीवार के पीछे लगा दिया। एक से अधिक तोपें वहा रक्खी भी नही जा सकती थी। सागर खिडकी पर दीवान दूल्हाजू गोलन्दाज था। उसको रानी ने आदेश दिया, 'तुम पश्चिम दक्षिण की ओर कुछ अन्तर से तोप दागो। कोई दिखलाई पडे या नही, परन्तु जब तक मेरा निषेध न मिले, ऐसा ही करते जाना।' दूल्हाजू जरा ठमठमाया। रानी ने समझाया, 'मै चाहती हू कि नत्थेखा की सेना और तोपे दक्षिण की ओर ओर्छा फाटक और सैयर फाटक के बीच में ही बनी रहे। तुम्हारे पास से होकर पूर्व और उत्तर की ओर न बढने पावे। मैं जहा चाहती हू, युद्ध वही हो। समझ गये?' दूल्हाजू ने कहा, 'हा सरकार।'
लक्ष्मीबाई ३०६ इसी प्रकार सब फाटको पर आवश्यक आज्ञा देकर रानी ओर्छा फाटक पर फिर आ गई । नत्थेखा की सेना मार खाकर पीछे हटी, परन्तु टोरिया पर नही चढी । उनके बीच में जो खाइया थी, उनमें रक्षा का यत्न करने लगी । इतने में रात हो गई । रानी मुन्दर को वही छोडकर महल चली आई । गीता के अठारहवें अध्याय का परायण या श्रवण वह यथासभव नित्य करती थी । पाठ समाप्त करके आधी घडी विश्राम किया था कि मुन्दर ने समाचार दिया—‘नत्थेखा ने नगर-कोट पर चारो ओर से आक्रमण किया है, ओर्छा फाटक पर आक्रमण सबसे अधिक भयकर है ।’ रानी सहेलियो समेत सवार होकर तुरन्त ओर्छा फाटक पर पहुँची । चादनी रात । आकाश निर्मल । पास का काफी अच्छा दिखलाई पड रहा था और दूर का घूमरा घूमरा । सागर-खिडकी पर गोले वरस रहे थे और ओर्छा-फाटक तो ऐसा जान पडता था कि अब गया, अब गया । रानी ने गुलामगौस और उसके तोपचियो को समझाया, 'दो बाढे जल्दी जल्दी दाग कर बिलकुल चुप हो जाओ । वैरी समझेगा कि तोपे बन्द करली । बढेगा । बढते ही दीवार के छेदो में से बन्दूको की बाढ दागी जाय । वैरी अपनी तोपे ऊँची टोरिया पर चढा कर ले जावेगा और वहा से फाटक और बुर्ज को ध्वस्त करने का उपाय करेगा । उस समय तोपे दागना । काशीबाई से कहा, ‘तुम भाऊ बख्शी से किले में जाकर कहो कि कडकबिजली के प्रयोग का समय आ गया । जैसे ही ओर्छा-फाटक की हमारी तोपे बन्द हो और अपनी बन्दूको की बाढ के उपरान्त शत्रु के तोपखाने से बाढ दगे, वह कड़कबिजली और उसी बुर्ज के तोपखाने से ओर्छा-फाटक के बाहर की दाई ओर वाली ऊँची टोरिया को अपना अचूक निशाना बनावे और अनवरत गोलाबारी करे ।’ काशीबाई सम्वाद लेकर गई ।
३१० झाँसी की रानी रानी ने मुन्दर और सुन्दर को कुछ हिदायते देकर दूसरी दिशाओ में भेजा । गुलामगौस ने अपनी तोपो से जल्दी जल्दी दो बाढे छोडी । नत्थेखां की सेना ने जवाब दिया । गौस की तोपे बिलकुल बन्द हो गई । नत्थेखा ने सोचा तोपची मारे गये । उसके सिपाही दीवार पर चढने के लिये बढे । इधर से बन्दूको की बाढ दगी । उसका कोई बडा असर नही हुआ । जब बाढो पर बाढे दगी तब उसके सिपाही पीछे हटे । नत्थेखा ने निश्चय किया कि ऊँची टौरिया पर तोपखाना चढा कर ओर्च्छा-फाटक और अगल-बगल की दीवारो पर गोलाबारी करने से शहर के लिये मार्ग मिल जायगा और फिर किले को अधिकृत कर लेना सहज हो जायगा । सागर-खिडकी की ओर से बराबर गोलाबारी हो रही थी और उसका एक तोपखाना उस ओर मोर्चा लगाये था । ओर्च्छा-फाटक की तोपे बन्द थी, इसलिये उसको अपना यही उपाय महाफलदायक जान पडा । उसने ऊँची टौरिया पर अपनी तोपे चढा दी और फाटक पर बाढ दागी । दीवारो पर उस बाढ का विनाशकारी प्रभाव पडा । तोपची उकता उठे । रानी ने वर्जित किया । नत्थेखा की तोपो से दूसरी बाढ नही दगने पाई । टौरिया पर घम घम हुआ और विकट चीत्कार और तुरन्त किले से चली हुई तोपो का भयंकर गर्जन-तर्जन सुनाई पडा । भाऊ का निशाना अचूक बैठा । फिर बाढ आई । इधर रानी ने गुलाम गौस को अपनी तोपो पर पलीता देने की आज्ञा दी । अब नत्थेखा को मालूम हुआ कि किसका सामना कर रहा हूँ । उसने स्थिति को संभालने का प्रयत्न किया, परन्तु कुछ न बन पडा । तोपो और सामान को छोडकर नत्थेखा भागा । वह केवल एक दाग लगा गया—लक्ष्मी-फाटक पर कर्नल जमाखा मारा गया । रात को लडाई बहुत धीमी गति से चली । परन्तु रानी की सावधानी में रत्ती भर भी अन्तर नही आया ।
लक्ष्मीबाई ३११
दूसरे दिन भी लडाई चली, परन्तु शहर से जरा हटकर। नत्थेखा की सेना का एक वडा भाग झासी के उत्तर में जाकर प्रताप मिश्र के परकोटे की आड पा गया, परन्तु यही उसके नाश का भी कारण हुआ। दीवान रघुनाथसिंह एक दूर गाव में था, इसलिये विलम्ब से समाचार मिला था। वह लडाई के दूसरे दिन उनाव की ओर से, जो झासी के उत्तर में है, आ गया। फाटक सब वन्द थे। खुलवाने की ज़रूरत भी न थी। उसने नत्थेखा की सेना की उस टुकडी पर ज़ोर के साथ हमला किया, जो प्रताप मिश्र के परकोटे से झासी के उत्तरी भाग को परेशानी में डाले थी। इस परकोटे के करीब एक पहाडी है। इस पहाडी की ओट से रघुनाथसिंह और नगर-कोट के पीछे से झासी की सेना की बन्दूको ने नत्थेखा की सेना को छलनी कर दिया। ठीक अवसर पाकर रघुनाथसिंह ने प्रचण्ड वेग के साथ प्रहार किया और उस टुकडी को तहस-नहस कर डाला। दक्षिण-पश्चिम की ओर से काशीनाथ भैया आ पहुँचा। सर्वनाश में जो कसर रह गई थी वह उसने पूरी कर दी। फिर कई दिन तक झासी से ज़रा दूर नत्थेखा की सेना की छोटी- बडी टुकडिया भागते भागते लड़ती रही। परन्तु तोपें और बहुत सी युद्ध- सामग्री छोडकर नत्थेखा को पराजित होकर भागना पडा। नत्थेखाँ एक टुकडी समेत नवाब अलीबहादुर के नईवस्ती वाले महल में आ गया था। नवाब अलीबहादुर नही चाहते थे, परन्तु विवश थे। नत्थेखा के भागने पर उनके महल पर काशीनाथ भैया के दस्ते ने आक्रमण किया। अलीबहादुर ने समझ लिया कि सब गया। बच निकलने का प्रयत्न किया। उनके महल के पीछे बहुत निचाई पर मेहदीबाग नाम का उद्यान था। एक सुरङ्ग में होकर इस बगीचे से निकल जाने का मार्ग था। जवाहर इत्यादि जितना सामान बना लेकर पीरअली के साथ बाहर निकल आये। बालबच्चे और एक नौकर भी। सुरक्षित स्थान में पहुँचने पर पीरअली ने कहा, 'आप अकेले भाडेर चले जाइये। मे यही रहूँगा। रानी की सेना के साथ मिलकर महल पर
३१२ झाँसी की रानी मैं भी हमला करूंगा। उनका भला बन जाऊँगा और महल मे जो कुछ बचाने योग्य है, बचाने की कोशिश करूंगा। यहा रह कर आपकी अधिक सेवा कर सकूंगा।' 'किस तरह ?', अलीबहादुर ने आतुरता के साथ पूछा। पीरअली ने उत्तर दिया, 'आपको समय समय पर समाचार मिलता रहेगा और जब अङ्गरेज यहा रानी से लडने के लिये आवेंगे तब उनको आपके सेवक के द्वारा बडी सहायता मिलेगी। आप फिर झासी आवेंगे ? फिर महल आपके होगे और कोई बडी जागीर भी कम्पनी सरकार की तरफ से आपको मिलेगी, क्योकि रानी का राज थोडे दिन ही और टिकेगा। इस वक्त तो खून का सा घूँट पीकर रह जाइये। अपमान का बदला लिया जायगा आप प्रतीति रखिये। अलीबहादुर चले गये। पीरअली रानी के सैनिको की ओर लौट पडा। उसको सैनिक पहिचानते थे। मारने पकडने को दौडे। सागरसिंह उस भीड में था। पीरअली ने कहा, 'क्या करते हो, मै तो तुम्हारा मित्र हू। महारानी साहव का शुभचिन्तक। बस्ती भर जानती है। नौकरी नवाब साहब की जरूर करता रहा हूँ परन्तु सदा उनको समझाता रहा कि सीधे रास्ते पर चलो। वे नही माने उन्होने भुगता। मै तुम्हारी सहायता करने आया हू। यह महल गोला गोली लायक नही है। इसमें आग लगाओ।' सैनिको को कुछ आश्वासन हुआ। सागरसिंह ने पूछा, 'किधर से आग लगाये ? नवाब साहव कहा हैं ?' 'भीतर,' पीरअली ने उत्तर दिया, 'आग फाटक से लगाना शुरू करो। दरवाजा अपने आप खुल जायगा। भीतर काफी माल है। मुझको सब पता है। राई-रत्ती बतलाऊँगा।' सिपाहियो ने फाटक में आग लगा दी। जल जाने पर घुसने का मार्ग मिल गया। फिर भीतर के फाटको में आग लगाई। एक दो जगह और।