झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)
Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography
वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंलक्ष्मीबाई ३०७ इसके उपरान्त वह अनन्त चतुर्दशा की पूजा के उपकरणो में संलग्न हो गई । जवाहरसिंह, कर्नल ज़माखा, भाऊ बख्शी, गुलाम गौसखा इत्यादि अपने काम में जोर के साथ जुट पडे । उनके लिये एक एक क्षण महत्व का था । भाऊ बख्शी ने कडकबिजली दक्षिण की ऊँची बुर्ज पर चढादी । गुलाम गौसखा एक बडी तोप और कई छोटी तोपे लेकर ओर्छे दरवाजे पर पहुच गया । सब फाटको की बुर्जों पर तोपें रख दी गईं । उनका मसाला तथा गोलन्दाज भी यथा स्थान नियुक्त कर दिये गये । जवाहरसिंह की सेना फाटको और परकोटे के दीवारो के छेदों के पास बन्दूकें लेकर डट गई । उन सब के भोजन और शयन का वही प्रबन्ध हो गया । चार पाच घण्टे के भीतर झासी ने रणक्षेत्र का रूप धारण कर लिया । तीसरे पहर लगभग ३ बजे रानी अनन्त चतुर्दशी का पूजन समाप्त करने को ही थी कि एक धडाका हुआ । दामोदरराव को अनन्त रक्षा का गडा बँधवा कर बाहर हुई थी कि समाचार मिला, 'नत्थेखा ने चढाई करदी है और गोला शायद शहर में गिरा है ।' रानी ने दिन भर उपवास किया था । थोडा सा फलाहार किया । इतने में समाचार आया कि टकसाल के पीछे एक सेठ के मकान में गोला गिरा है । रानी ने कल्पना की कि या तो नत्थेखा का गोलन्दाज अनजान है, इतने बडे किले को उसने अनी पर नही साध पाया या काफी चतुर है—अनुमान से महल को निशाना बनाया, परन्तु गोले ने करवट ले ली और महल को बचा गया । योद्धा वेश में तुरन्त घोडे पर सवार हुईं और अपनी तीनो सहेलियो को लेकर ओर्छे दरवाजे पहुची । गुलाम गौसखा को आज्ञा दी, 'शत्रु इसी ओर है । गोलो की लगातार वर्षा करो ।' काशीबाई से कहा, 'तू तुरन्त किले पर जा । बख्शी से कहना कि जैसे ही नत्थेखा की सेना टौरियो का आश्रय लेने के लिये पश्चिम में