झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)
Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography
वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसैयर फाटक की ओर बढे, कडकबिजली की मार करे। जब तक उसकी सेना ओर्छा फाटक से पश्चिम की ओर न बढे, कडकबिजली चुप बनी रहे।' काशीबाई तुरन्त गई। गौस ने अपने तोपखाने को सभाला। एक के बाद दूसरी तोप पर पलीता पडना शुरू हुआ ११ तोपे थी। जब तक अन्तिम तोप गोला उगलती तब तक पहली विनाश-वमन के लिये तैयार हो जाती। गोला, बारूद और काम करने वाले सुव्यवस्थित। ओर्छा फाटक के पूर्व उत्तर की ओर थोडी दूरी पर सागर खिडकी और उससे कुछ अधिक दूरी पर लक्ष्मी फाटक था। सुन्दर और मुन्दर के साथ रानी सागर खिडकी पर आई। इस खिडकी से पश्चिम की ओर ओर्छा फाटक की तरफ-कुछ ही डग के फासले पर एक मुहरी थी। नगर के दक्षिणी भाग के पानी का बहाव इसी में होकर था। यह मुहरी इतनी बड़ी थी कि नाटे कद का आदमी आसानी से इसमें होकर निकल सकता था। सागर खिडकी के ऊपर जो तोपे थी, उनमे से एक को रानी ने, इस मुहरी के ऊपर दीवार के पीछे लगा दिया। एक से अधिक तोपें वहा रक्खी भी नही जा सकती थी। सागर खिडकी पर दीवान दूल्हाजू गोलन्दाज था। उसको रानी ने आदेश दिया, 'तुम पश्चिम दक्षिण की ओर कुछ अन्तर से तोप दागो। कोई दिखलाई पडे या नही, परन्तु जब तक मेरा निषेध न मिले, ऐसा ही करते जाना।' दूल्हाजू जरा ठमठमाया। रानी ने समझाया, 'मै चाहती हू कि नत्थेखा की सेना और तोपे दक्षिण की ओर ओर्छा फाटक और सैयर फाटक के बीच में ही बनी रहे। तुम्हारे पास से होकर पूर्व और उत्तर की ओर न बढने पावे। मैं जहा चाहती हू, युद्ध वही हो। समझ गये?' दूल्हाजू ने कहा, 'हा सरकार।'