भारतकोश
झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography

वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा

DevanagariHindipublished526 पृष्ठ

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लक्ष्मीबाई ३०६ इसी प्रकार सब फाटको पर आवश्यक आज्ञा देकर रानी ओर्छा फाटक पर फिर आ गई । नत्थेखा की सेना मार खाकर पीछे हटी, परन्तु टोरिया पर नही चढी । उनके बीच में जो खाइया थी, उनमें रक्षा का यत्न करने लगी । इतने में रात हो गई । रानी मुन्दर को वही छोडकर महल चली आई । गीता के अठारहवें अध्याय का परायण या श्रवण वह यथासभव नित्य करती थी । पाठ समाप्त करके आधी घडी विश्राम किया था कि मुन्दर ने समाचार दिया—‘नत्थेखा ने नगर-कोट पर चारो ओर से आक्रमण किया है, ओर्छा फाटक पर आक्रमण सबसे अधिक भयकर है ।’ रानी सहेलियो समेत सवार होकर तुरन्त ओर्छा फाटक पर पहुँची । चादनी रात । आकाश निर्मल । पास का काफी अच्छा दिखलाई पड रहा था और दूर का घूमरा घूमरा । सागर-खिडकी पर गोले वरस रहे थे और ओर्छा-फाटक तो ऐसा जान पडता था कि अब गया, अब गया । रानी ने गुलामगौस और उसके तोपचियो को समझाया, 'दो बाढे जल्दी जल्दी दाग कर बिलकुल चुप हो जाओ । वैरी समझेगा कि तोपे बन्द करली । बढेगा । बढते ही दीवार के छेदो में से बन्दूको की बाढ दागी जाय । वैरी अपनी तोपे ऊँची टोरिया पर चढा कर ले जावेगा और वहा से फाटक और बुर्ज को ध्वस्त करने का उपाय करेगा । उस समय तोपे दागना । काशीबाई से कहा, ‘तुम भाऊ बख्शी से किले में जाकर कहो कि कडकबिजली के प्रयोग का समय आ गया । जैसे ही ओर्छा-फाटक की हमारी तोपे बन्द हो और अपनी बन्दूको की बाढ के उपरान्त शत्रु के तोपखाने से बाढ दगे, वह कड़कबिजली और उसी बुर्ज के तोपखाने से ओर्छा-फाटक के बाहर की दाई ओर वाली ऊँची टोरिया को अपना अचूक निशाना बनावे और अनवरत गोलाबारी करे ।’ काशीबाई सम्वाद लेकर गई ।