भारतकोश
झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography

वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा

DevanagariHindipublished526 पृष्ठ

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३०६ झाँसी की रानी भाऊ—‘जो आज्ञा सरकार ।’ रानी—‘बरुवासागर वाला सागरसिंह कहा है ?’ भाऊ—‘मऊवाले काशीनाथ भैया के साथ करेरा की ओर गये हुये हैं।’ रानी—‘दोनो को वहा से बुलवाओ । सेना हमारे पास बहुत थोडी है । यदि नत्थेखा वास्तव में २० सहस्र सेना लेकर आ रहा है, तो कर्रा सामना पडेगा, परन्तु चिन्ता मत करो । हमारे पास किला है। बुर्जे और तोपे हैं । और गोलन्दाज अच्छे हैं ।’ भाऊ—‘गोलन्दाज हमारे पास कुछ कम हैं, परन्तु सरकार का जैसा आदेश होगा, उनकी वैसी ही नियुक्ति कर ली जावेगी ।’ रानी—‘मै कुछ स्त्रियो को तोपची का काम सिखलाना चाहती थी, अभी उनकी शिक्षा पूरी नही हो पाई है, इसलिये गुलाम गौसखा को ओर्छा दरवाजे के लिये तैयार रक्खो और तुम स्वय किले की दक्षिणी बुर्ज पर कडक बिजली चढाकर काम करो । मै अपनी स्त्री सेना को लेकर सब मोर्चों पर जवाहरसिंह की और गौस की सहायता करूंगी । बस्ती वालो से कह दो कि निश्चिन्त रहे परन्तु भीड बाघकर बाहर न चले फिरे ।’ भोपटकर ने मार्टिन के नाम एक पत्र आगरा भेजा, और नीचे वाली बुर्ज पर यूनियन जैक झंडा चढा दिया । ओर्छा के दूत को नत्थेखा के सन्देसे का उत्तर दिया कि लक्ष्मीबाई एक स्त्री हैं, खासाहब को अबला की रक्षा करनी चाहिये न कि उसके साथ इस प्रकार का व्यवहार । रानी अङ्गरेजो की ओर से झासी का प्रबन्ध कर रही हैं, ओर्छा अङ्गरेजो का मित्र राज्य है, इसलिये ओर्छा की ओर से झासी पर आक्रमण होना बिलकुल अनुचित है यदि आक्रमण हुआ तो झासी अपनी रक्षा करेगी । दूत संदेसे का उत्तर लेकर तुरन्त चला गया । रानी ने दीवान से कहा, ‘मुझे खेद है कि झासी के समग्र निवासी युद्ध विद्या में निपुण नही किये जा सके है । मै नत्थेखा से निबटलूॅ तब अवश्य इस ओर अधिक ध्यान दूंगी ।’