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झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography

वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा

DevanagariHindipublished526 पृष्ठ

३०६ झाँसी की रानी भाऊ—‘जो आज्ञा सरकार ।’ रानी—‘बरुवासागर वाला सागरसिंह कहा है ?’ भाऊ—‘मऊवाले काशीनाथ भैया के साथ करेरा की ओर गये हुये हैं।’ रानी—‘दोनो को वहा से बुलवाओ । सेना हमारे पास बहुत थोडी है । यदि नत्थेखा वास्तव में २० सहस्र सेना लेकर आ रहा है, तो कर्रा सामना पडेगा, परन्तु चिन्ता मत करो । हमारे पास किला है। बुर्जे और तोपे हैं । और गोलन्दाज अच्छे हैं ।’ भाऊ—‘गोलन्दाज हमारे पास कुछ कम हैं, परन्तु सरकार का जैसा आदेश होगा, उनकी वैसी ही नियुक्ति कर ली जावेगी ।’ रानी—‘मै कुछ स्त्रियो को तोपची का काम सिखलाना चाहती थी, अभी उनकी शिक्षा पूरी नही हो पाई है, इसलिये गुलाम गौसखा को ओर्छा दरवाजे के लिये तैयार रक्खो और तुम स्वय किले की दक्षिणी बुर्ज पर कडक बिजली चढाकर काम करो । मै अपनी स्त्री सेना को लेकर सब मोर्चों पर जवाहरसिंह की और गौस की सहायता करूंगी । बस्ती वालो से कह दो कि निश्चिन्त रहे परन्तु भीड बाघकर बाहर न चले फिरे ।’ भोपटकर ने मार्टिन के नाम एक पत्र आगरा भेजा, और नीचे वाली बुर्ज पर यूनियन जैक झंडा चढा दिया । ओर्छा के दूत को नत्थेखा के सन्देसे का उत्तर दिया कि लक्ष्मीबाई एक स्त्री हैं, खासाहब को अबला की रक्षा करनी चाहिये न कि उसके साथ इस प्रकार का व्यवहार । रानी अङ्गरेजो की ओर से झासी का प्रबन्ध कर रही हैं, ओर्छा अङ्गरेजो का मित्र राज्य है, इसलिये ओर्छा की ओर से झासी पर आक्रमण होना बिलकुल अनुचित है यदि आक्रमण हुआ तो झासी अपनी रक्षा करेगी । दूत संदेसे का उत्तर लेकर तुरन्त चला गया । रानी ने दीवान से कहा, ‘मुझे खेद है कि झासी के समग्र निवासी युद्ध विद्या में निपुण नही किये जा सके है । मै नत्थेखा से निबटलूॅ तब अवश्य इस ओर अधिक ध्यान दूंगी ।’

लक्ष्मीबाई ३०७ इसके उपरान्त वह अनन्त चतुर्दशा की पूजा के उपकरणो में संलग्न हो गई । जवाहरसिंह, कर्नल ज़माखा, भाऊ बख्शी, गुलाम गौसखा इत्यादि अपने काम में जोर के साथ जुट पडे । उनके लिये एक एक क्षण महत्व का था । भाऊ बख्शी ने कडकबिजली दक्षिण की ऊँची बुर्ज पर चढादी । गुलाम गौसखा एक बडी तोप और कई छोटी तोपे लेकर ओर्छे दरवाजे पर पहुच गया । सब फाटको की बुर्जों पर तोपें रख दी गईं । उनका मसाला तथा गोलन्दाज भी यथा स्थान नियुक्त कर दिये गये । जवाहरसिंह की सेना फाटको और परकोटे के दीवारो के छेदों के पास बन्दूकें लेकर डट गई । उन सब के भोजन और शयन का वही प्रबन्ध हो गया । चार पाच घण्टे के भीतर झासी ने रणक्षेत्र का रूप धारण कर लिया । तीसरे पहर लगभग ३ बजे रानी अनन्त चतुर्दशी का पूजन समाप्त करने को ही थी कि एक धडाका हुआ । दामोदरराव को अनन्त रक्षा का गडा बँधवा कर बाहर हुई थी कि समाचार मिला, 'नत्थेखा ने चढाई करदी है और गोला शायद शहर में गिरा है ।' रानी ने दिन भर उपवास किया था । थोडा सा फलाहार किया । इतने में समाचार आया कि टकसाल के पीछे एक सेठ के मकान में गोला गिरा है । रानी ने कल्पना की कि या तो नत्थेखा का गोलन्दाज अनजान है, इतने बडे किले को उसने अनी पर नही साध पाया या काफी चतुर है—अनुमान से महल को निशाना बनाया, परन्तु गोले ने करवट ले ली और महल को बचा गया । योद्धा वेश में तुरन्त घोडे पर सवार हुईं और अपनी तीनो सहेलियो को लेकर ओर्छे दरवाजे पहुची । गुलाम गौसखा को आज्ञा दी, 'शत्रु इसी ओर है । गोलो की लगातार वर्षा करो ।' काशीबाई से कहा, 'तू तुरन्त किले पर जा । बख्शी से कहना कि जैसे ही नत्थेखा की सेना टौरियो का आश्रय लेने के लिये पश्चिम में

सैयर फाटक की ओर बढे, कडकबिजली की मार करे। जब तक उसकी सेना ओर्छा फाटक से पश्चिम की ओर न बढे, कडकबिजली चुप बनी रहे।' काशीबाई तुरन्त गई। गौस ने अपने तोपखाने को सभाला। एक के बाद दूसरी तोप पर पलीता पडना शुरू हुआ ११ तोपे थी। जब तक अन्तिम तोप गोला उगलती तब तक पहली विनाश-वमन के लिये तैयार हो जाती। गोला, बारूद और काम करने वाले सुव्यवस्थित। ओर्छा फाटक के पूर्व उत्तर की ओर थोडी दूरी पर सागर खिडकी और उससे कुछ अधिक दूरी पर लक्ष्मी फाटक था। सुन्दर और मुन्दर के साथ रानी सागर खिडकी पर आई। इस खिडकी से पश्चिम की ओर ओर्छा फाटक की तरफ-कुछ ही डग के फासले पर एक मुहरी थी। नगर के दक्षिणी भाग के पानी का बहाव इसी में होकर था। यह मुहरी इतनी बड़ी थी कि नाटे कद का आदमी आसानी से इसमें होकर निकल सकता था। सागर खिडकी के ऊपर जो तोपे थी, उनमे से एक को रानी ने, इस मुहरी के ऊपर दीवार के पीछे लगा दिया। एक से अधिक तोपें वहा रक्खी भी नही जा सकती थी। सागर खिडकी पर दीवान दूल्हाजू गोलन्दाज था। उसको रानी ने आदेश दिया, 'तुम पश्चिम दक्षिण की ओर कुछ अन्तर से तोप दागो। कोई दिखलाई पडे या नही, परन्तु जब तक मेरा निषेध न मिले, ऐसा ही करते जाना।' दूल्हाजू जरा ठमठमाया। रानी ने समझाया, 'मै चाहती हू कि नत्थेखा की सेना और तोपे दक्षिण की ओर ओर्छा फाटक और सैयर फाटक के बीच में ही बनी रहे। तुम्हारे पास से होकर पूर्व और उत्तर की ओर न बढने पावे। मैं जहा चाहती हू, युद्ध वही हो। समझ गये?' दूल्हाजू ने कहा, 'हा सरकार।'

लक्ष्मीबाई ३०६ इसी प्रकार सब फाटको पर आवश्यक आज्ञा देकर रानी ओर्छा फाटक पर फिर आ गई । नत्थेखा की सेना मार खाकर पीछे हटी, परन्तु टोरिया पर नही चढी । उनके बीच में जो खाइया थी, उनमें रक्षा का यत्न करने लगी । इतने में रात हो गई । रानी मुन्दर को वही छोडकर महल चली आई । गीता के अठारहवें अध्याय का परायण या श्रवण वह यथासभव नित्य करती थी । पाठ समाप्त करके आधी घडी विश्राम किया था कि मुन्दर ने समाचार दिया—‘नत्थेखा ने नगर-कोट पर चारो ओर से आक्रमण किया है, ओर्छा फाटक पर आक्रमण सबसे अधिक भयकर है ।’ रानी सहेलियो समेत सवार होकर तुरन्त ओर्छा फाटक पर पहुँची । चादनी रात । आकाश निर्मल । पास का काफी अच्छा दिखलाई पड रहा था और दूर का घूमरा घूमरा । सागर-खिडकी पर गोले वरस रहे थे और ओर्छा-फाटक तो ऐसा जान पडता था कि अब गया, अब गया । रानी ने गुलामगौस और उसके तोपचियो को समझाया, 'दो बाढे जल्दी जल्दी दाग कर बिलकुल चुप हो जाओ । वैरी समझेगा कि तोपे बन्द करली । बढेगा । बढते ही दीवार के छेदो में से बन्दूको की बाढ दागी जाय । वैरी अपनी तोपे ऊँची टोरिया पर चढा कर ले जावेगा और वहा से फाटक और बुर्ज को ध्वस्त करने का उपाय करेगा । उस समय तोपे दागना । काशीबाई से कहा, ‘तुम भाऊ बख्शी से किले में जाकर कहो कि कडकबिजली के प्रयोग का समय आ गया । जैसे ही ओर्छा-फाटक की हमारी तोपे बन्द हो और अपनी बन्दूको की बाढ के उपरान्त शत्रु के तोपखाने से बाढ दगे, वह कड़कबिजली और उसी बुर्ज के तोपखाने से ओर्छा-फाटक के बाहर की दाई ओर वाली ऊँची टोरिया को अपना अचूक निशाना बनावे और अनवरत गोलाबारी करे ।’ काशीबाई सम्वाद लेकर गई ।

३१० झाँसी की रानी रानी ने मुन्दर और सुन्दर को कुछ हिदायते देकर दूसरी दिशाओ में भेजा । गुलामगौस ने अपनी तोपो से जल्दी जल्दी दो बाढे छोडी । नत्थेखां की सेना ने जवाब दिया । गौस की तोपे बिलकुल बन्द हो गई । नत्थेखा ने सोचा तोपची मारे गये । उसके सिपाही दीवार पर चढने के लिये बढे । इधर से बन्दूको की बाढ दगी । उसका कोई बडा असर नही हुआ । जब बाढो पर बाढे दगी तब उसके सिपाही पीछे हटे । नत्थेखा ने निश्चय किया कि ऊँची टौरिया पर तोपखाना चढा कर ओर्च्छा-फाटक और अगल-बगल की दीवारो पर गोलाबारी करने से शहर के लिये मार्ग मिल जायगा और फिर किले को अधिकृत कर लेना सहज हो जायगा । सागर-खिडकी की ओर से बराबर गोलाबारी हो रही थी और उसका एक तोपखाना उस ओर मोर्चा लगाये था । ओर्च्छा-फाटक की तोपे बन्द थी, इसलिये उसको अपना यही उपाय महाफलदायक जान पडा । उसने ऊँची टौरिया पर अपनी तोपे चढा दी और फाटक पर बाढ दागी । दीवारो पर उस बाढ का विनाशकारी प्रभाव पडा । तोपची उकता उठे । रानी ने वर्जित किया । नत्थेखा की तोपो से दूसरी बाढ नही दगने पाई । टौरिया पर घम घम हुआ और विकट चीत्कार और तुरन्त किले से चली हुई तोपो का भयंकर गर्जन-तर्जन सुनाई पडा । भाऊ का निशाना अचूक बैठा । फिर बाढ आई । इधर रानी ने गुलाम गौस को अपनी तोपो पर पलीता देने की आज्ञा दी । अब नत्थेखा को मालूम हुआ कि किसका सामना कर रहा हूँ । उसने स्थिति को संभालने का प्रयत्न किया, परन्तु कुछ न बन पडा । तोपो और सामान को छोडकर नत्थेखा भागा । वह केवल एक दाग लगा गया—लक्ष्मी-फाटक पर कर्नल जमाखा मारा गया । रात को लडाई बहुत धीमी गति से चली । परन्तु रानी की सावधानी में रत्ती भर भी अन्तर नही आया ।

लक्ष्मीबाई ३११

दूसरे दिन भी लडाई चली, परन्तु शहर से जरा हटकर। नत्थेखा की सेना का एक वडा भाग झासी के उत्तर में जाकर प्रताप मिश्र के परकोटे की आड पा गया, परन्तु यही उसके नाश का भी कारण हुआ। दीवान रघुनाथसिंह एक दूर गाव में था, इसलिये विलम्ब से समाचार मिला था। वह लडाई के दूसरे दिन उनाव की ओर से, जो झासी के उत्तर में है, आ गया। फाटक सब वन्द थे। खुलवाने की ज़रूरत भी न थी। उसने नत्थेखा की सेना की उस टुकडी पर ज़ोर के साथ हमला किया, जो प्रताप मिश्र के परकोटे से झासी के उत्तरी भाग को परेशानी में डाले थी। इस परकोटे के करीब एक पहाडी है। इस पहाडी की ओट से रघुनाथसिंह और नगर-कोट के पीछे से झासी की सेना की बन्दूको ने नत्थेखा की सेना को छलनी कर दिया। ठीक अवसर पाकर रघुनाथसिंह ने प्रचण्ड वेग के साथ प्रहार किया और उस टुकडी को तहस-नहस कर डाला। दक्षिण-पश्चिम की ओर से काशीनाथ भैया आ पहुँचा। सर्वनाश में जो कसर रह गई थी वह उसने पूरी कर दी। फिर कई दिन तक झासी से ज़रा दूर नत्थेखा की सेना की छोटी- बडी टुकडिया भागते भागते लड़ती रही। परन्तु तोपें और बहुत सी युद्ध- सामग्री छोडकर नत्थेखा को पराजित होकर भागना पडा। नत्थेखाँ एक टुकडी समेत नवाब अलीबहादुर के नईवस्ती वाले महल में आ गया था। नवाब अलीबहादुर नही चाहते थे, परन्तु विवश थे। नत्थेखा के भागने पर उनके महल पर काशीनाथ भैया के दस्ते ने आक्रमण किया। अलीबहादुर ने समझ लिया कि सब गया। बच निकलने का प्रयत्न किया। उनके महल के पीछे बहुत निचाई पर मेहदीबाग नाम का उद्यान था। एक सुरङ्ग में होकर इस बगीचे से निकल जाने का मार्ग था। जवाहर इत्यादि जितना सामान बना लेकर पीरअली के साथ बाहर निकल आये। बालबच्चे और एक नौकर भी। सुरक्षित स्थान में पहुँचने पर पीरअली ने कहा, 'आप अकेले भाडेर चले जाइये। मे यही रहूँगा। रानी की सेना के साथ मिलकर महल पर

३१२ झाँसी की रानी मैं भी हमला करूंगा। उनका भला बन जाऊँगा और महल मे जो कुछ बचाने योग्य है, बचाने की कोशिश करूंगा। यहा रह कर आपकी अधिक सेवा कर सकूंगा।' 'किस तरह ?', अलीबहादुर ने आतुरता के साथ पूछा। पीरअली ने उत्तर दिया, 'आपको समय समय पर समाचार मिलता रहेगा और जब अङ्गरेज यहा रानी से लडने के लिये आवेंगे तब उनको आपके सेवक के द्वारा बडी सहायता मिलेगी। आप फिर झासी आवेंगे ? फिर महल आपके होगे और कोई बडी जागीर भी कम्पनी सरकार की तरफ से आपको मिलेगी, क्योकि रानी का राज थोडे दिन ही और टिकेगा। इस वक्त तो खून का सा घूँट पीकर रह जाइये। अपमान का बदला लिया जायगा आप प्रतीति रखिये। अलीबहादुर चले गये। पीरअली रानी के सैनिको की ओर लौट पडा। उसको सैनिक पहिचानते थे। मारने पकडने को दौडे। सागरसिंह उस भीड में था। पीरअली ने कहा, 'क्या करते हो, मै तो तुम्हारा मित्र हू। महारानी साहव का शुभचिन्तक। बस्ती भर जानती है। नौकरी नवाब साहब की जरूर करता रहा हूँ परन्तु सदा उनको समझाता रहा कि सीधे रास्ते पर चलो। वे नही माने उन्होने भुगता। मै तुम्हारी सहायता करने आया हू। यह महल गोला गोली लायक नही है। इसमें आग लगाओ।' सैनिको को कुछ आश्वासन हुआ। सागरसिंह ने पूछा, 'किधर से आग लगाये ? नवाब साहव कहा हैं ?' 'भीतर,' पीरअली ने उत्तर दिया, 'आग फाटक से लगाना शुरू करो। दरवाजा अपने आप खुल जायगा। भीतर काफी माल है। मुझको सब पता है। राई-रत्ती बतलाऊँगा।' सिपाहियो ने फाटक में आग लगा दी। जल जाने पर घुसने का मार्ग मिल गया। फिर भीतर के फाटको में आग लगाई। एक दो जगह और।

लक्ष्मीबाई ३१३ पीरअली ने स्वयं कई जगह अग्नि प्रज्वलित की। जब भीतर पहुंचे तो वहा कोई न मिला । 'मालूम होता है गडवड में नवाब साहब निकल भागे। मगर असबाब सामान तो मौजूद है।' पीरअली ने उनकी साधारण धन सम्पत्ति लुटवा दी। थोडी देर में आग शान्त हो गई, परन्तु काफी क्षति हो गई थी। पीरअली का नाम हो गया कि रानी की सेना के साथ वह नवाब साहब और नत्थेखा की फौज के खिलाफ लडा। काशीनाथ और सागर- सिंह ने विश्वास दिलाया। मोतीबाई को आश्चर्य था। परन्तु विजय के हर्ष में अपने हितचिन्तक पर सन्देह करना ईश्वर के प्रति कृतज्ञता की मात्रा को कम करना था। इसलिये पीरअली शीघ्र विश्वासपात्र लोगो की गिनती में मान लिया गया। रानी ने गुलाम गौसखा, रघुनाथसिंह और भाऊ बख्शी को विशेष तौर पर पुरस्कृत किया। दीवान खास में जब रघुनाथसिंह अकेला रह गया तब उसने रानी से प्रार्थना की। 'सरकार मुझको सब कुछ मिल गया। केवल लड्डू रह गये।' रानी हँसी मुन्दर पास खडी थी। उससे कहा, 'उस दिन तू ही थाल उठा लाई थी। आज भी तू ही ला।' मुन्दर थाल ले आई। बहुत प्रसन्न थी। रानी ने आदेश दिया, 'अब तू ही खिला भी दे।' मुन्दर ने रघुनाथसिंह को लड्डू खिलाये। वह हँस-हँसकर लड्डू खिलाने में सचेष्ट थी, परन्तु रघुनाथसिंह अधिक नही खा सका। उसके गले में कुछ अटक अटक जाता था।

३१४ झांसी की रानी [ ५६ ] रात को मोतीबाई आई । रानी ने भजन सुना । समाप्ति पर काशी- बाई ने कहा, 'सरकार मैं बडी तोप चलाने का काम सीखना चाहती हूँ। जब बख्शी जी कडकबिजली चला रहे थे, में उनके पास थी । निशाना मिलाना, ध्यान के साथ बाहर की स्थिति को परखकर तोप का रुख बदलना और पलीता छुलाकर बैरी की बडी सेना में भी अकेले खलबली उत्पन्न कर देना, मुझको बहुत अच्छा लगा ।' रानी बोली, 'मैने निश्चय कर लिया है । तुम सबको तोप का काम सिखवाऊँगी । परन्तु पूरी शिक्षा के लिये कुछ समय लगेगा ।' सुन्दर ने कहा, 'अपने यहा गुलाम गोस तो बहुत चतुर तोपची है ही, अङ्गरेजी सेना से आया हुआ एक लालता ब्राह्मण भी बहुत अच्छा ज़ानकार है । उसके ज्ञान का भी लाभ उठाया जाय ।' 'दीवान रघुनाथसिंह भी इस काम को बहुत अच्छा जानते हैं,' मुन्दर ने उत्साह के साथ कहा । एक पल के बहुत छोटे अंश के लिये रानी की आख असाधारण सजग हुई, और तुरन्त ही शान्त । मुन्दर ने लक्ष नही किया । रानी ने मोतीबाई से पूछा, 'तू नाटक खेलना भूल गई कि अभी आता है ?' मोतीबाई—'सरकार, जो एक बार पानी में तैरना सीख लेता है, वह फिर कभी नही भूल सकता । आज्ञा हो तो किसी दिन कोई अच्छा खेल दिखलाऊँ ?' रानी—'सुचित्त हो जाऊँ तो किसी दिन अवश्य देखूँगी । तू किस खेल को सबसे अच्छा समझती है ?' मोतीबाई—'रत्नावली को । वैसे शकुन्तला, हरिश्चन्द्र, प्रबोध- चन्द्रोदय भी बहुत अच्छे हैं ।' रानी—'मैंने सुना है कि ग्वालियर में एक मण्डली हरिश्चन्द्र नाटक बहुत अच्छा खेलती है ।'

लक्ष्मीबाई ३१५ मोतीबाई—'हम लोगो का और ग्वालियर की मण्डली का भी अभिनय देखा जावे। फिर सरकार तुलना करे। मुझको विश्वास है कि झासी की बात सिरे पर रहेगी।' रानी—'मोती, मैं झांसी को हर बात में आगे देखना चाहती हूँ। अश्वारोहण और अग्नि-विद्या में उस्ताद वजीरखा, अमीरखा; गोलन्दाजी में गुलाम गौस, सैन्य-सञ्चालन में जवाहरसिंह, रघुनाथसिंह, गायन में मुगलखा, शस्त्र बनाने में भाऊ बख्शी, कपडे सीने में बलदेव दर्जी, नृत्य में दुर्गा। ये सब झांसी के गौरव हैं। मै चाहती हूँ कि प्रत्येक विद्या में झांसी देश भर में सब से आगे रहे, परन्तु होगा यह तभी जब देश को अङ्गरेजो के पञ्जे से छुटकारा मिल जाय।' मोतीबाई—'सरकार ने जिस यज्ञ का आरम्भ किया है, वह किसी न किसी दिन वरदान देगा।' मुन्दर—'सरकार, ब्राह्मण लोग कहते हैं कि एक यज्ञ भी होना चाहिये।' रानी—ब्राह्मणो को यज्ञ और मिष्ट-भोज चाहिये। करा दूँगी, परन्तु युद्ध के देवता कार्तिकेय, इस युग में बारूद और गोले का होम अधिक पसन्द करने लगे हैं। और ब्राह्मणो को कलयुग की यह बात कम मालूम है।' मुन्दर—'अपने यहा के भट्ट और शास्त्री लोग अनुष्ठान के लिये बहुत आग्रह कर रहे हैं। कहते हैं कि सब काम छोड कर, पहले उनके विधान का पालन होना चाहिये।' रानी—'सब काम छोडकर तो ऐसा न होगा, परन्तु और सब कार्यों के साथ साथ अवश्य हो जायगा। तो पहला काम यह है कि कल से तोप चलाना मोतीबाई गौस से, काशीबाई भाऊ बख्शी से, मुन्दर रघुनाथसिंह से, और सुन्दर • •' मुन्दर—'सरकार, दीवान दूल्हाजू भी अच्छे जानकार हैं।'

३१६ झाँसी की रानी रानी—'उस पर ध्यान नही जम रहा था। उस दिन वह ठमठमा गया था, परन्तु तोप अच्छी चलाता है। ठीक है। उससे सुन्दर सीखे।' काशीबाई—'उस रात भाऊ बख्शी ने ऐसा प्रहार किया, कि नत्थेखा इस जन्म में तो भूलेगा नही। मेरे कान तो आज तक सनसना रहे हैं।' रानी—'अब की बार दिखता है कि गोरो का सामना होगा। तुम सब की उस समय परीक्षा होगी।' काशीबाई—'सरकार, हम लोगो की परीक्षा के फल से निराश न होगी।' मोतीबाई को एक बात कसक रही थी। उसने प्रसङ्ग-विक्षेप सा करते हुये कहा। 'सरकार ने कहा था कि सब कार्य साथ साथ चलेंगे, तो नाटकशाला का भी काम चालू कर दूँ?' 'तुमको उसके लिये विशेष प्रयत्न करना ही क्या पडेगा?' रानी बोली, 'नृत्य-गान जानती ही हो। अवसर आने पर बतला दूगी।' मोतीबाई—'सरकार ने दुर्गा के नृत्य के विषय में कहा था। वह कथक नृत्य बहुत अच्छा करती है, परन्तु प्राचीन नृत्यकला को बिलकुल नही जानती।' रानी मुस्कराई। रानी—'मै भूल गई थी मोती। नृत्य के विषय में झाँसी का गौरव वास्तव में तुम हो, परन्तु वैरियो को तो गोलो से रिझाना होगा।' मोतीबाई ने दृढतापूर्वक कहा, 'सरकार, उनको ऐसा रिझाया जावेगा कि अनन्त काल तक उनकी चर्चा होगी।' सुन्दर ने अनुरोध किया, 'सरकार, नाटक भी किसी दिन खिलवाया जाय।' 'अच्छा सुन्दर,' रानी ने कहा, 'मोतीबाई उसकी भी तैयारी करेगी। यज्ञ की जिस दिन पूर्णाहुति होगी, उसी रात नाटक होगा। मोती, नाटक के सम्बन्ध में, मै तुझसे कुछ पूछना चाहती हू।'

लक्ष्मीबाई ३१७ मोतीबाई—'आज्ञा हो सरकार।' रानी—'तू जब अभिनय करती है, तब क्या अपने को बिलकुल भूल जाती है ?' मोतीबाई—'बिलकुल तो नही भूल सकती सरकार।' रानी—'क्या याद रहता है ?' मोतीबाई—'अपना निजत्व, दर्शक और अभिनय।' रानी—'क्या सब दर्शक ?' मोतीबाई—'नहीं सरकार । जो दर्शक विशेष रुचि दिखलाते हैं, उनके ऊपर प्रायः ध्यान जाता है। तभी अभिनय अच्छा हो सकता है।' रानी—'तुमको अपने दर्शक याद रहते हैं ?' मोतीबाई—'यदि वे बार बार नाटकशाला में आवे तो।' रानी—'तुम्हे अपने कुछ दर्शको का अब भी स्मरण है ?' मोतीबाई की आंख जरा लजीली हुई, परन्तु उसने तुरन्त सँभल कर कहा, 'हा सरकार कोई याद रह जाते हैं।' रानी ने पूछा, 'तुझे कौन सबसे अधिक याद है ?' क्षण के दशांश के लिये सहेलियो ने एक दूसरे के प्रति दृष्टिपात किया। मोतीबाई की आंख परवश नीची पड गई। सिर उठाया। कहने को हुई। जरा सा हँसी। फिर गम्भीर हो गई। खासी। बोली, 'कोई नाम याद नही आता सरकार।' और हँसी। रानी को भी हँसी आ गई। अच्छा जब याद आ जावे तब बतलाना,' रानी ने कहा, 'अभी कोई जल्दी नही।' मोती ने निष्कृति की सास ली।' काशीबाई—'सरकार, इनके साथ जूही भी अभिनय किया करती थी।' रानी—'वह भी अब अपना काम कर रही है।'

३१८ झाँसी की रानी मोतीबाई—'उसने खूब काम किया ओर करेगी ।' रानी—'उसको भी गुलामगौस से तोप चलाना सिखलाओ । हमको बहुत तोपचियो की आवश्यकता पडेगी । जिसके पास तोपें ओर तोपची, उसी के हाथ विजय ।' काशीबाई--'जहा हमारी श्रीमन्त सरकार होगी, वही विजय होगी ।'

लक्ष्मीबाई ३१६ [ ६० ] झांसी के दक्षिण में सागर का जिला और सागर के दक्षिण पश्चिम में भोपाल रियासत । भोपाल रियासत में आमापानी नाम की गढी थी । थोडी दूर पर राहतगढ नाम का किला था । आमापानी के अधिकारी ने राहतगढ पर कब्जा कर लिया । राहतगढ में बहुत से पठान इकट्ठे हो गये । सागर की सेना ने विद्रोह किया और सागर को लूट लिया । जबलपुर में विप्लव हुआ । सारे विन्ध्यखण्ड में विप्लव की लपटें बढीं । सन् १८५८ के मध्य सितम्बर में जनरल सरह्यू रोज ससैन्य इगलैंड से बम्बई उतरा । विप्लवकारियो से बदला लेना और विप्लव का दमन करना उसका दृढ़ निश्चय था । उसी महीने में दिल्ली का पतन हुआ । बहादुरशाह कैद कर लिया गया और उसके दो शाहजादे मार डाले गये । लखनऊ का मुहासिरा समाप्त हुआ । कानपुर में तात्या टोपे ने अङ्गरेजो के कम से कम तीन जनरलो को लडाई में हराया । परन्तु दिल्ली के पतन का विप्लवकारियो पर बुरा प्रभाव पडा । लखनऊ के प्रथम पतन पर भी अवध में जनता ने युद्ध जारी रक्खा अङ्गरेज़ो ने इलाहाबाद फतेहपूर इत्यादि में प्रचण्ड हिंसा वृत्ति से प्रेरित होकर भीषण और वीभत्स क्रूर कृत्य किये । इनके समाचार झांसी में आये । बिठूर का पतन हुआ । नाना साहब कठिनाई से रात के समय अपनी पत्नियो और विमाता को नाव में बिठालाकर निकल पाये और लखनऊ की बेगम के पास पहुंच पाये । झांसी वालो के संसर्ग में फिर कभी नही आये । रावसाहब और तात्या टोपे अपनी सेना लेकर कालपी आ गये और यहाँ से युद्ध की योजनाये प्रयुक्त करने लगे । यह समाचार भी झांसी आया । झांसी में हार खाकर नत्थेखा टीकमगढ मे शान्ति के साथ नही बैठा, वरन झाँसी के पूर्वीय परगनो में डेढ दो महीने तक लूटमार करता

३२० झांसी की रानी रहा। उसकी पडवाहा, गरोठा और नौटा की लूट विख्यात है। परन्तु रानी ने थोडे समय में ही यह सब लूट मार कुचल दी और नत्थेखा को बिलकुल हट जाना पडा । रानी की छोटी सी सेना को दहलाने और हैरान करने के लिये यह सब काफी था, परन्तु रानी को घबराया हुआ या चिन्तित कभी किसी ने नही देखा। उनका कार्य सतत, अनवरत जारी था। वही कार्य क्रम। वही दिन चर्या। वही सद्भावना और जनता की रक्षा तथा जनता के नायकत्व का वही दृढ सङ्कल्प। 'यदि अकेले ही स्वराज्य की लडाई लडनी पडे तो लडी जायगी'—यह रानी का अटल निश्चय था। और उनका अचल विश्वास था कि एक युद्ध और एक जन्म से ही कार्य पूरी तौर पर सम्पन्न नही होता। 'सम्भवामि युगे युगे' उन्होने पढा था, उनको याद था और उनके कण-कण में व्याप्त था। वे अपने युग के उपकरण और साधन काम मे लाती थी। जिस समाज में उनका जन्म हुआ था, उसी में होकर उनको काम करना था, परन्तु उस समाज की हथकडियो और बेडियो की उन्होने पूजा नही की। वे अपने युग से आगे निकल गई थी, किन्तु उन्होने अपने युग और समाज को साथ ले चलने को, भरसक प्रयत्न किया। झांसी में विशेषतः और विन्ध्यखण्ड मे साधारणतया, स्त्री की अपेक्षाकृत स्वतन्त्रता और नारीत्व की स्वस्थता लक्ष्मीबाई के नाम के साथ बहुत सम्बद्ध है। मङ्गल और शुक्र के दिन रानी, महालक्ष्मी के मन्दिर मे जाया करती थी. जो लक्ष्मी-फाटक के बाहर, लक्ष्मीताल के ऊपर है। कभी पालकी मे, कभी घोडे पर। कभी पालकी पर चिक डालकर, कभी बिना चिक के। कभी साडी पहिन कर, कभी पुरुष वेश मे—सुन्दर साफा बाधे हुये। कभी बिलकुल अकेली, और कभी धूमधाम के साथ। जब पालकी पर जाती कुछ स्त्रिया अलङ्कारो से लदी, लाल मखमली जूते पहिने, परतले मे पिस्तोल लटकाये पालकी का पाया पकडे साथ दौडती हुई जाती

लक्ष्मीबाई ३२१ थी । पालकी के आगे सवार गेरुआ झंडा फहराता हुआ चलता था । उसके आगे सौ घुड़सवार । साथ में रणवाद्य, नौबत । पीछे पठानों, मेवातियों और बुन्देलखंडियों का रिसाला । बगल में प्राय भाऊ बख्शी घोड़े पर सवार । मार्ग में विनती भी सुनती थी । एक दिन एक भिक्षुक ब्राह्मण आ खड़ा हुआ । काशी से आया था । पत्नी मर गई थी । दूसरा विवाह करना चाहता था । दरिद्र होने के कारण लड़की वाला विवाह करने को तैयार न था । चार सौ रुपए की अटक थी । उन्हीं दिनों कुंवर मंडली में एक नया व्यक्ति भर्ती हुआ था । नाम रामचन्द्र देशमुख । देशमुख को आज्ञा दी, खजाने से इस ब्राह्मण को पाँच सौ रुपया दिलवा दो । देशमुख ने कहा, 'जो हुकुम ।' ब्राह्मण ने आशीर्वाद दिया । रानी ने ब्राह्मण से मुस्कराकर कहा, 'विवाह के समय मुझको न्योता देना न भूल जाना ।' ब्राह्मण गद्गद् हो गया । आँखों से आँसू बह पड़े मुँह से एक शब्द न निकला । साथियों में, सहेलियों में, जनता में, सेना में, ब्राह्मणों में अब्राह्मणों में विद्युत् वेग के साथ यह बात फैल गई । ऐसी रानी के लिये, ऐसी रानी की बात के लिये, ऐसी स्त्री के सिद्धान्त के लिये, क्यों न लोग सहज ही प्राण दे डालने को सन्नद्ध होते ? कुंवार का महीना आया । रानी ने श्राद्ध किया । नवरात्र में यज्ञ का अनुष्ठान । महल के सामने पुस्तकालय था । निकटवर्ती मैदान में यज्ञ-मंडप खड़ा किया गया । सौ ब्राह्मण हवन करने के लिये नियुक्त किये गये । अन्य ब्राह्मण विविध विधान के लिये । गणेश मन्दिर में अथर्व का आवर्तन अलग हो रहा था । सप्तशती के पाठके लिये १४ ब्राह्मण दुर्गा के मंदिर में चांदी के शमइयों में घी

३२२ झांसी की रानी के दिये जलाये पाठ करने पर नियुक्त। जब यज्ञ समाप्त हुआ' मुख्य सकल्प रानी के नाम से और नान्दीश्राद्ध दामोदरराव के हाथ से कराया गया - पूना तरफ के एक ब्राह्मण ने आक्षेप किया और शास्त्रो के वचन उद्धृत करने आरम्भ किये । उसकी बात मानी गई । वह विजय-गर्व से फूल गया ।* रानी को यह दुःसह हुआ। रानी ने काशीबाई से कहा, 'काशी तू शान्ति के साथ सोच विचार किया करती है। ब्राह्मणो का यह विवाद तुझको कैसा लगा ?' काशी ने उत्तर दिया, 'सरकार, इन लोगो का वितण्डावाद कभी न झुका, देश का दुर्भाग्य कभी न रुका - ये लोग सदा इसी में मस्त रहे। मालूम नही भगवान ने इतनी ना समझी क्यो इन शास्त्रज्ञो के ही पल्ले में परसी है ।' रानी ने कहा, 'कर्म अच्छा है, परन्तु उसके कराने वाले आकर्मण्य हैं' 'बड़ी बात यह है कि राज्य का भार इन लोगो पर नही है, नही तो हम सब डूब जाते जाते,' काशी बोली, 'राजकीय समस्याओ के सुलझाने में यदि ये लोग इतना विवेक खर्च करे तो कितना बड़ा काम हो।' 'काशी,' रानी ने कहा, 'जब ये लोग राजनीति का व्यायाम करते है तब वितण्डा नही करते । धर्म से ही न जाने ये लोग क्यो ऐसे रूठे हैं।' विजयादशमी के दिन दरबार हुआ । अंग्रेजो ने जो जागीरे ज़ब्त कर ली थी, वे वापिस कर दी गईं । नत्थेखा वाली लडाई में जिन लोगो ने बड़े काम किये थे, उनको या उनके वारिसो को, जो पहले ही पुरस्कृत नही हो चुके थे, पारितोषिक दिये गये । सागरसिंह और पीरअली भी खाली हाथ न लौटे । जब सागरसिंह सामने आया रानी ने कहा, 'तुमको नवाब साहब की हवेली में से कितना माल मिला ?' *देखिये परिशिष्ट ।

लक्ष्मीबाई ३२३ सागरसिंह ने उत्तर दिया, 'बहुत कम सरकार । पीरअली मेरे गवाह हैं । वे साथ थे । नवाब साहब की हवेली में आग लगाने वालो में ये सबसे आगे थे ।' पीरअली आगे बढा । बोला, 'श्रीमन्त सरकार, मैने नवाब साहब का बहुत दिनो नमक अदा किया, परन्तु जब देखा कि वे श्रीमन्त सरकार के विरुद्ध है, तब उनसे अलग हो गयाँ । बेवस मुझको लडना भी पडा । आग मैंने सबसे पहले नही लगाई । आग लग चुकी थी । माल अवश्य मैंने सिपाहियो को बतलाया, क्योकि यह उचित था । थोडा ही मिला । नवाब साहब पहले ही निकाल ले गये ।' रानी को अच्छा नही लगा, परन्तु उन्होने कहा कुछ नही । रात को नाटक हुआ । पुरुष और स्त्रियो का—दोनो का-अभिनय स्त्रियो ने ही किया । नाटकशाला भी स्त्रियो के सिवाय पुरुष एक भी न था । खेल शकुन्तला का था । जूही ने शकुन्तला का अभिनय किया, मोती ने उसकी सहेली का और काशी ने दुष्यन्त का ।' नाटक की समाप्ति पर रानी ने मोतीबाई से पूछा, 'पहले भी ऐसा ही अभिनय किया करती थी ?' मोतीबाई—'आज, सरकार, हम लोगो ने अच्छे से अच्छा प्रयत्न किया है ।' रानी—'जूही तो शकुन्तला जैसी जची, परन्तु इसका दुष्यन्त रद्दी था ।' जूही—'नही सरकार ।' रानी को कुछ स्मरण हो आया । बोली, 'ठीक कहती है जूही । तेरा और तेरे दुष्यन्त जोहर युद्ध में देखूँगी ।' जूही ने निसंकोच कहा, 'सरकार मेरा और मेरे दुष्यन्त का जौहर देखकर पुरस्कार देगी ।' काशीबाई हँसकर बोली, 'मुझको तो आगे कभी दुष्यन्त बनना नही ।'

३२४ झांसी की रानी रानी ने चुटकी काटी। कहा, 'तब और कोई दुष्यन्द बनेगा।' और मोतीबाई की ओर देखा। मोतीबाई ने गर्दन मोड़ी। जूही झेरकर पीछे सट गई। सहेलियो मे विनोद छागया। जाते जाते रानी ने मोतीबाई से अकेले में कहा, 'खुदाबख्श से कहना कि बारूद के कारखाने का ध्यान रक्खे। हमको इतनी बारूद चाहिए कि हम किले में बैठकर महीनो लड सकें।' मोतीबाई ने नीचा सिर किये हुये पूछा, 'सरकार् की इस आज्ञा का कथन मै ही करूँ?' 'और कौन करेगा पगली,' रानी ने हँसकर कहा, 'तात्या टोपे का भी समाचार मँगवा। देख क्या वे अब भी कालपी मे हैं? उनका झासी आना जाना बना रहना चाहिए। न मालूम अङ्गरेज कब आजावे। हम लोग झासी में घिरे हुए अनन्त काल तक तो लड़ नही सकते। उनको इतना समीप रहना चाहिए कि अटक पडने पर सहायता लेकर, शीघ्र आसके।' दूसरे दिन रानी ने दीवान खास में जवाहरसिंह और रघुनाथसिंह को बुलवाया। रानी कार्य की प्रगति को और तेज़ करना चाहती थी। रानी — तोपे ऐसी ढल रही हैं न, जो पीछे धक्का न दे और जल्दी गरम न हो?' जवाहरसिंह — 'हा सरकार, बख्शी जी और उनके कारीगर इस विद्या में निपुण हैं।' रानी — 'बारूद?' रघुनाथसिंह — 'तीन महीने की लडाई के लिए तैयार है। आज से कुंवर खुदाबख्श ने और भी तेजी पकड़ी है।' रानी — 'अच्छी बन्दूके और तलवारें भी बहुत सख्या में चाहिए।' जवाहरसिंह — 'बन गई हैं और बन रही हैं।' रानी — 'गोले?'

लक्ष्मीबाई ३२५ जवाहरसिंह—'भाऊ बख्शी आध सेर से लेकर पैंसट सेर तक गोले तैयार कर रहे हैं। ठोस और पोले–फटने वाले भी।' रानी—'मैं चाहती हूँ कि इन सब हथियारो के चलाने वाले भी अधिकता से तैयार किये जावें।' जवाहरसिंह—'जनता में बहुत उत्साह है। ऊँची-नीची सब जातिया युद्ध की उमङ्ग से उमड रही हैं।' रानी—'सबसे अधिक किन लोगो में उत्साह है?' जवाहरसिंह— सरकार यह बतलाना कठिन है। ठाकुरो और पठानों में तो स्वाभाविक ही है। कोरियो, तेलियो और काछियो में भी बहुत उमङ्ग है। वनिये और ब्राह्मण भी पीछे नहीं हैं।' रानी—'क्या शास्त्रियो में भी?' जवाहरसिंह— वे भी तो झांसी के ही हैं, परन्तु उनको जब शास्त्र और पूजन से अवकाश मिलता है तब।' रानी—'हमारे देश में नीच-ऊँच का भेद न होता तो कितना अच्छा होता।' जवाहरसिंह—'भेद तो भगवान ने ही बनाया है, सरकार।' रानी चुप रही। थोडी देर बाद बोली, मैं चाहती हूँ कि सब जातियो के चुने हुये लोगो को, तोप बन्दूक का चलाना सिखलाया जावे।' जवाहरसिंह ने बहुत उत्साह बिना दिखलाए कहा, 'यह काम जारी है सरकार।' रानी—'मैं अपनी सहेलियो और कुछ अन्य स्त्रियो को, बहुत अच्छा गोलन्दाज़ बनाना चाहती हू।' रघुनाथसिंह—'आज्ञा मिल गई है। उसके अनुसार काम किया जायगा। अवश्य।' रानी—'किले में अन्न इत्यादि भी काफ़ी जमा करलो। कुछ ठीक नही कब घेरा पड़ जाय।'