झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)
Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography
वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३२४ झांसी की रानी रानी ने चुटकी काटी। कहा, 'तब और कोई दुष्यन्द बनेगा।' और मोतीबाई की ओर देखा। मोतीबाई ने गर्दन मोड़ी। जूही झेरकर पीछे सट गई। सहेलियो मे विनोद छागया। जाते जाते रानी ने मोतीबाई से अकेले में कहा, 'खुदाबख्श से कहना कि बारूद के कारखाने का ध्यान रक्खे। हमको इतनी बारूद चाहिए कि हम किले में बैठकर महीनो लड सकें।' मोतीबाई ने नीचा सिर किये हुये पूछा, 'सरकार् की इस आज्ञा का कथन मै ही करूँ?' 'और कौन करेगा पगली,' रानी ने हँसकर कहा, 'तात्या टोपे का भी समाचार मँगवा। देख क्या वे अब भी कालपी मे हैं? उनका झासी आना जाना बना रहना चाहिए। न मालूम अङ्गरेज कब आजावे। हम लोग झासी में घिरे हुए अनन्त काल तक तो लड़ नही सकते। उनको इतना समीप रहना चाहिए कि अटक पडने पर सहायता लेकर, शीघ्र आसके।' दूसरे दिन रानी ने दीवान खास में जवाहरसिंह और रघुनाथसिंह को बुलवाया। रानी कार्य की प्रगति को और तेज़ करना चाहती थी। रानी — तोपे ऐसी ढल रही हैं न, जो पीछे धक्का न दे और जल्दी गरम न हो?' जवाहरसिंह — 'हा सरकार, बख्शी जी और उनके कारीगर इस विद्या में निपुण हैं।' रानी — 'बारूद?' रघुनाथसिंह — 'तीन महीने की लडाई के लिए तैयार है। आज से कुंवर खुदाबख्श ने और भी तेजी पकड़ी है।' रानी — 'अच्छी बन्दूके और तलवारें भी बहुत सख्या में चाहिए।' जवाहरसिंह — 'बन गई हैं और बन रही हैं।' रानी — 'गोले?'