झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)
Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography
वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा
पृष्ठ 336, कुल 526 में से
संदर्भ में पढ़ेंलक्ष्मीबाई ३२५ जवाहरसिंह—'भाऊ बख्शी आध सेर से लेकर पैंसट सेर तक गोले तैयार कर रहे हैं। ठोस और पोले–फटने वाले भी।' रानी—'मैं चाहती हूँ कि इन सब हथियारो के चलाने वाले भी अधिकता से तैयार किये जावें।' जवाहरसिंह—'जनता में बहुत उत्साह है। ऊँची-नीची सब जातिया युद्ध की उमङ्ग से उमड रही हैं।' रानी—'सबसे अधिक किन लोगो में उत्साह है?' जवाहरसिंह— सरकार यह बतलाना कठिन है। ठाकुरो और पठानों में तो स्वाभाविक ही है। कोरियो, तेलियो और काछियो में भी बहुत उमङ्ग है। वनिये और ब्राह्मण भी पीछे नहीं हैं।' रानी—'क्या शास्त्रियो में भी?' जवाहरसिंह— वे भी तो झांसी के ही हैं, परन्तु उनको जब शास्त्र और पूजन से अवकाश मिलता है तब।' रानी—'हमारे देश में नीच-ऊँच का भेद न होता तो कितना अच्छा होता।' जवाहरसिंह—'भेद तो भगवान ने ही बनाया है, सरकार।' रानी चुप रही। थोडी देर बाद बोली, मैं चाहती हूँ कि सब जातियो के चुने हुये लोगो को, तोप बन्दूक का चलाना सिखलाया जावे।' जवाहरसिंह ने बहुत उत्साह बिना दिखलाए कहा, 'यह काम जारी है सरकार।' रानी—'मैं अपनी सहेलियो और कुछ अन्य स्त्रियो को, बहुत अच्छा गोलन्दाज़ बनाना चाहती हू।' रघुनाथसिंह—'आज्ञा मिल गई है। उसके अनुसार काम किया जायगा। अवश्य।' रानी—'किले में अन्न इत्यादि भी काफ़ी जमा करलो। कुछ ठीक नही कब घेरा पड़ जाय।'