भारतकोश
झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography

वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा

DevanagariHindipublished526 पृष्ठ

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लक्ष्मीबाई ३२३ सागरसिंह ने उत्तर दिया, 'बहुत कम सरकार । पीरअली मेरे गवाह हैं । वे साथ थे । नवाब साहब की हवेली में आग लगाने वालो में ये सबसे आगे थे ।' पीरअली आगे बढा । बोला, 'श्रीमन्त सरकार, मैने नवाब साहब का बहुत दिनो नमक अदा किया, परन्तु जब देखा कि वे श्रीमन्त सरकार के विरुद्ध है, तब उनसे अलग हो गयाँ । बेवस मुझको लडना भी पडा । आग मैंने सबसे पहले नही लगाई । आग लग चुकी थी । माल अवश्य मैंने सिपाहियो को बतलाया, क्योकि यह उचित था । थोडा ही मिला । नवाब साहब पहले ही निकाल ले गये ।' रानी को अच्छा नही लगा, परन्तु उन्होने कहा कुछ नही । रात को नाटक हुआ । पुरुष और स्त्रियो का—दोनो का-अभिनय स्त्रियो ने ही किया । नाटकशाला भी स्त्रियो के सिवाय पुरुष एक भी न था । खेल शकुन्तला का था । जूही ने शकुन्तला का अभिनय किया, मोती ने उसकी सहेली का और काशी ने दुष्यन्त का ।' नाटक की समाप्ति पर रानी ने मोतीबाई से पूछा, 'पहले भी ऐसा ही अभिनय किया करती थी ?' मोतीबाई—'आज, सरकार, हम लोगो ने अच्छे से अच्छा प्रयत्न किया है ।' रानी—'जूही तो शकुन्तला जैसी जची, परन्तु इसका दुष्यन्त रद्दी था ।' जूही—'नही सरकार ।' रानी को कुछ स्मरण हो आया । बोली, 'ठीक कहती है जूही । तेरा और तेरे दुष्यन्त जोहर युद्ध में देखूँगी ।' जूही ने निसंकोच कहा, 'सरकार मेरा और मेरे दुष्यन्त का जौहर देखकर पुरस्कार देगी ।' काशीबाई हँसकर बोली, 'मुझको तो आगे कभी दुष्यन्त बनना नही ।'