झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)
Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography
वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३२२ झांसी की रानी के दिये जलाये पाठ करने पर नियुक्त। जब यज्ञ समाप्त हुआ' मुख्य सकल्प रानी के नाम से और नान्दीश्राद्ध दामोदरराव के हाथ से कराया गया - पूना तरफ के एक ब्राह्मण ने आक्षेप किया और शास्त्रो के वचन उद्धृत करने आरम्भ किये । उसकी बात मानी गई । वह विजय-गर्व से फूल गया ।* रानी को यह दुःसह हुआ। रानी ने काशीबाई से कहा, 'काशी तू शान्ति के साथ सोच विचार किया करती है। ब्राह्मणो का यह विवाद तुझको कैसा लगा ?' काशी ने उत्तर दिया, 'सरकार, इन लोगो का वितण्डावाद कभी न झुका, देश का दुर्भाग्य कभी न रुका - ये लोग सदा इसी में मस्त रहे। मालूम नही भगवान ने इतनी ना समझी क्यो इन शास्त्रज्ञो के ही पल्ले में परसी है ।' रानी ने कहा, 'कर्म अच्छा है, परन्तु उसके कराने वाले आकर्मण्य हैं' 'बड़ी बात यह है कि राज्य का भार इन लोगो पर नही है, नही तो हम सब डूब जाते जाते,' काशी बोली, 'राजकीय समस्याओ के सुलझाने में यदि ये लोग इतना विवेक खर्च करे तो कितना बड़ा काम हो।' 'काशी,' रानी ने कहा, 'जब ये लोग राजनीति का व्यायाम करते है तब वितण्डा नही करते । धर्म से ही न जाने ये लोग क्यो ऐसे रूठे हैं।' विजयादशमी के दिन दरबार हुआ । अंग्रेजो ने जो जागीरे ज़ब्त कर ली थी, वे वापिस कर दी गईं । नत्थेखा वाली लडाई में जिन लोगो ने बड़े काम किये थे, उनको या उनके वारिसो को, जो पहले ही पुरस्कृत नही हो चुके थे, पारितोषिक दिये गये । सागरसिंह और पीरअली भी खाली हाथ न लौटे । जब सागरसिंह सामने आया रानी ने कहा, 'तुमको नवाब साहब की हवेली में से कितना माल मिला ?' *देखिये परिशिष्ट ।