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झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography

वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा

DevanagariHindipublished526 पृष्ठ

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लक्ष्मीबाई ३२१ थी । पालकी के आगे सवार गेरुआ झंडा फहराता हुआ चलता था । उसके आगे सौ घुड़सवार । साथ में रणवाद्य, नौबत । पीछे पठानों, मेवातियों और बुन्देलखंडियों का रिसाला । बगल में प्राय भाऊ बख्शी घोड़े पर सवार । मार्ग में विनती भी सुनती थी । एक दिन एक भिक्षुक ब्राह्मण आ खड़ा हुआ । काशी से आया था । पत्नी मर गई थी । दूसरा विवाह करना चाहता था । दरिद्र होने के कारण लड़की वाला विवाह करने को तैयार न था । चार सौ रुपए की अटक थी । उन्हीं दिनों कुंवर मंडली में एक नया व्यक्ति भर्ती हुआ था । नाम रामचन्द्र देशमुख । देशमुख को आज्ञा दी, खजाने से इस ब्राह्मण को पाँच सौ रुपया दिलवा दो । देशमुख ने कहा, 'जो हुकुम ।' ब्राह्मण ने आशीर्वाद दिया । रानी ने ब्राह्मण से मुस्कराकर कहा, 'विवाह के समय मुझको न्योता देना न भूल जाना ।' ब्राह्मण गद्गद् हो गया । आँखों से आँसू बह पड़े मुँह से एक शब्द न निकला । साथियों में, सहेलियों में, जनता में, सेना में, ब्राह्मणों में अब्राह्मणों में विद्युत् वेग के साथ यह बात फैल गई । ऐसी रानी के लिये, ऐसी रानी की बात के लिये, ऐसी स्त्री के सिद्धान्त के लिये, क्यों न लोग सहज ही प्राण दे डालने को सन्नद्ध होते ? कुंवार का महीना आया । रानी ने श्राद्ध किया । नवरात्र में यज्ञ का अनुष्ठान । महल के सामने पुस्तकालय था । निकटवर्ती मैदान में यज्ञ-मंडप खड़ा किया गया । सौ ब्राह्मण हवन करने के लिये नियुक्त किये गये । अन्य ब्राह्मण विविध विधान के लिये । गणेश मन्दिर में अथर्व का आवर्तन अलग हो रहा था । सप्तशती के पाठके लिये १४ ब्राह्मण दुर्गा के मंदिर में चांदी के शमइयों में घी