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झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography

वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा

DevanagariHindipublished526 पृष्ठ

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पृष्ठ 331

३२० झांसी की रानी रहा। उसकी पडवाहा, गरोठा और नौटा की लूट विख्यात है। परन्तु रानी ने थोडे समय में ही यह सब लूट मार कुचल दी और नत्थेखा को बिलकुल हट जाना पडा । रानी की छोटी सी सेना को दहलाने और हैरान करने के लिये यह सब काफी था, परन्तु रानी को घबराया हुआ या चिन्तित कभी किसी ने नही देखा। उनका कार्य सतत, अनवरत जारी था। वही कार्य क्रम। वही दिन चर्या। वही सद्भावना और जनता की रक्षा तथा जनता के नायकत्व का वही दृढ सङ्कल्प। 'यदि अकेले ही स्वराज्य की लडाई लडनी पडे तो लडी जायगी'—यह रानी का अटल निश्चय था। और उनका अचल विश्वास था कि एक युद्ध और एक जन्म से ही कार्य पूरी तौर पर सम्पन्न नही होता। 'सम्भवामि युगे युगे' उन्होने पढा था, उनको याद था और उनके कण-कण में व्याप्त था। वे अपने युग के उपकरण और साधन काम मे लाती थी। जिस समाज में उनका जन्म हुआ था, उसी में होकर उनको काम करना था, परन्तु उस समाज की हथकडियो और बेडियो की उन्होने पूजा नही की। वे अपने युग से आगे निकल गई थी, किन्तु उन्होने अपने युग और समाज को साथ ले चलने को, भरसक प्रयत्न किया। झांसी में विशेषतः और विन्ध्यखण्ड मे साधारणतया, स्त्री की अपेक्षाकृत स्वतन्त्रता और नारीत्व की स्वस्थता लक्ष्मीबाई के नाम के साथ बहुत सम्बद्ध है। मङ्गल और शुक्र के दिन रानी, महालक्ष्मी के मन्दिर मे जाया करती थी. जो लक्ष्मी-फाटक के बाहर, लक्ष्मीताल के ऊपर है। कभी पालकी मे, कभी घोडे पर। कभी पालकी पर चिक डालकर, कभी बिना चिक के। कभी साडी पहिन कर, कभी पुरुष वेश मे—सुन्दर साफा बाधे हुये। कभी बिलकुल अकेली, और कभी धूमधाम के साथ। जब पालकी पर जाती कुछ स्त्रिया अलङ्कारो से लदी, लाल मखमली जूते पहिने, परतले मे पिस्तोल लटकाये पालकी का पाया पकडे साथ दौडती हुई जाती