झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)
Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography
वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंलक्ष्मीबाई ३१५ मोतीबाई—'हम लोगो का और ग्वालियर की मण्डली का भी अभिनय देखा जावे। फिर सरकार तुलना करे। मुझको विश्वास है कि झासी की बात सिरे पर रहेगी।' रानी—'मोती, मैं झांसी को हर बात में आगे देखना चाहती हूँ। अश्वारोहण और अग्नि-विद्या में उस्ताद वजीरखा, अमीरखा; गोलन्दाजी में गुलाम गौस, सैन्य-सञ्चालन में जवाहरसिंह, रघुनाथसिंह, गायन में मुगलखा, शस्त्र बनाने में भाऊ बख्शी, कपडे सीने में बलदेव दर्जी, नृत्य में दुर्गा। ये सब झांसी के गौरव हैं। मै चाहती हूँ कि प्रत्येक विद्या में झांसी देश भर में सब से आगे रहे, परन्तु होगा यह तभी जब देश को अङ्गरेजो के पञ्जे से छुटकारा मिल जाय।' मोतीबाई—'सरकार ने जिस यज्ञ का आरम्भ किया है, वह किसी न किसी दिन वरदान देगा।' मुन्दर—'सरकार, ब्राह्मण लोग कहते हैं कि एक यज्ञ भी होना चाहिये।' रानी—ब्राह्मणो को यज्ञ और मिष्ट-भोज चाहिये। करा दूँगी, परन्तु युद्ध के देवता कार्तिकेय, इस युग में बारूद और गोले का होम अधिक पसन्द करने लगे हैं। और ब्राह्मणो को कलयुग की यह बात कम मालूम है।' मुन्दर—'अपने यहा के भट्ट और शास्त्री लोग अनुष्ठान के लिये बहुत आग्रह कर रहे हैं। कहते हैं कि सब काम छोड कर, पहले उनके विधान का पालन होना चाहिये।' रानी—'सब काम छोडकर तो ऐसा न होगा, परन्तु और सब कार्यों के साथ साथ अवश्य हो जायगा। तो पहला काम यह है कि कल से तोप चलाना मोतीबाई गौस से, काशीबाई भाऊ बख्शी से, मुन्दर रघुनाथसिंह से, और सुन्दर • •' मुन्दर—'सरकार, दीवान दूल्हाजू भी अच्छे जानकार हैं।'