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झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography

वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा

DevanagariHindipublished526 पृष्ठ

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३१६ झाँसी की रानी रानी—'उस पर ध्यान नही जम रहा था। उस दिन वह ठमठमा गया था, परन्तु तोप अच्छी चलाता है। ठीक है। उससे सुन्दर सीखे।' काशीबाई—'उस रात भाऊ बख्शी ने ऐसा प्रहार किया, कि नत्थेखा इस जन्म में तो भूलेगा नही। मेरे कान तो आज तक सनसना रहे हैं।' रानी—'अब की बार दिखता है कि गोरो का सामना होगा। तुम सब की उस समय परीक्षा होगी।' काशीबाई—'सरकार, हम लोगो की परीक्षा के फल से निराश न होगी।' मोतीबाई को एक बात कसक रही थी। उसने प्रसङ्ग-विक्षेप सा करते हुये कहा। 'सरकार ने कहा था कि सब कार्य साथ साथ चलेंगे, तो नाटकशाला का भी काम चालू कर दूँ?' 'तुमको उसके लिये विशेष प्रयत्न करना ही क्या पडेगा?' रानी बोली, 'नृत्य-गान जानती ही हो। अवसर आने पर बतला दूगी।' मोतीबाई—'सरकार ने दुर्गा के नृत्य के विषय में कहा था। वह कथक नृत्य बहुत अच्छा करती है, परन्तु प्राचीन नृत्यकला को बिलकुल नही जानती।' रानी मुस्कराई। रानी—'मै भूल गई थी मोती। नृत्य के विषय में झाँसी का गौरव वास्तव में तुम हो, परन्तु वैरियो को तो गोलो से रिझाना होगा।' मोतीबाई ने दृढतापूर्वक कहा, 'सरकार, उनको ऐसा रिझाया जावेगा कि अनन्त काल तक उनकी चर्चा होगी।' सुन्दर ने अनुरोध किया, 'सरकार, नाटक भी किसी दिन खिलवाया जाय।' 'अच्छा सुन्दर,' रानी ने कहा, 'मोतीबाई उसकी भी तैयारी करेगी। यज्ञ की जिस दिन पूर्णाहुति होगी, उसी रात नाटक होगा। मोती, नाटक के सम्बन्ध में, मै तुझसे कुछ पूछना चाहती हू।'