भारतकोश
झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography

वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा

DevanagariHindipublished526 पृष्ठ

पृष्ठ 328, कुल 526 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 328

लक्ष्मीबाई ३१७ मोतीबाई—'आज्ञा हो सरकार।' रानी—'तू जब अभिनय करती है, तब क्या अपने को बिलकुल भूल जाती है ?' मोतीबाई—'बिलकुल तो नही भूल सकती सरकार।' रानी—'क्या याद रहता है ?' मोतीबाई—'अपना निजत्व, दर्शक और अभिनय।' रानी—'क्या सब दर्शक ?' मोतीबाई—'नहीं सरकार । जो दर्शक विशेष रुचि दिखलाते हैं, उनके ऊपर प्रायः ध्यान जाता है। तभी अभिनय अच्छा हो सकता है।' रानी—'तुमको अपने दर्शक याद रहते हैं ?' मोतीबाई—'यदि वे बार बार नाटकशाला में आवे तो।' रानी—'तुम्हे अपने कुछ दर्शको का अब भी स्मरण है ?' मोतीबाई की आंख जरा लजीली हुई, परन्तु उसने तुरन्त सँभल कर कहा, 'हा सरकार कोई याद रह जाते हैं।' रानी ने पूछा, 'तुझे कौन सबसे अधिक याद है ?' क्षण के दशांश के लिये सहेलियो ने एक दूसरे के प्रति दृष्टिपात किया। मोतीबाई की आंख परवश नीची पड गई। सिर उठाया। कहने को हुई। जरा सा हँसी। फिर गम्भीर हो गई। खासी। बोली, 'कोई नाम याद नही आता सरकार।' और हँसी। रानी को भी हँसी आ गई। अच्छा जब याद आ जावे तब बतलाना,' रानी ने कहा, 'अभी कोई जल्दी नही।' मोती ने निष्कृति की सास ली।' काशीबाई—'सरकार, इनके साथ जूही भी अभिनय किया करती थी।' रानी—'वह भी अब अपना काम कर रही है।'