भारतकोश
झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography

वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा

DevanagariHindipublished526 पृष्ठ

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लक्ष्मीबाई ३११

दूसरे दिन भी लडाई चली, परन्तु शहर से जरा हटकर। नत्थेखा की सेना का एक वडा भाग झासी के उत्तर में जाकर प्रताप मिश्र के परकोटे की आड पा गया, परन्तु यही उसके नाश का भी कारण हुआ। दीवान रघुनाथसिंह एक दूर गाव में था, इसलिये विलम्ब से समाचार मिला था। वह लडाई के दूसरे दिन उनाव की ओर से, जो झासी के उत्तर में है, आ गया। फाटक सब वन्द थे। खुलवाने की ज़रूरत भी न थी। उसने नत्थेखा की सेना की उस टुकडी पर ज़ोर के साथ हमला किया, जो प्रताप मिश्र के परकोटे से झासी के उत्तरी भाग को परेशानी में डाले थी। इस परकोटे के करीब एक पहाडी है। इस पहाडी की ओट से रघुनाथसिंह और नगर-कोट के पीछे से झासी की सेना की बन्दूको ने नत्थेखा की सेना को छलनी कर दिया। ठीक अवसर पाकर रघुनाथसिंह ने प्रचण्ड वेग के साथ प्रहार किया और उस टुकडी को तहस-नहस कर डाला। दक्षिण-पश्चिम की ओर से काशीनाथ भैया आ पहुँचा। सर्वनाश में जो कसर रह गई थी वह उसने पूरी कर दी। फिर कई दिन तक झासी से ज़रा दूर नत्थेखा की सेना की छोटी- बडी टुकडिया भागते भागते लड़ती रही। परन्तु तोपें और बहुत सी युद्ध- सामग्री छोडकर नत्थेखा को पराजित होकर भागना पडा। नत्थेखाँ एक टुकडी समेत नवाब अलीबहादुर के नईवस्ती वाले महल में आ गया था। नवाब अलीबहादुर नही चाहते थे, परन्तु विवश थे। नत्थेखा के भागने पर उनके महल पर काशीनाथ भैया के दस्ते ने आक्रमण किया। अलीबहादुर ने समझ लिया कि सब गया। बच निकलने का प्रयत्न किया। उनके महल के पीछे बहुत निचाई पर मेहदीबाग नाम का उद्यान था। एक सुरङ्ग में होकर इस बगीचे से निकल जाने का मार्ग था। जवाहर इत्यादि जितना सामान बना लेकर पीरअली के साथ बाहर निकल आये। बालबच्चे और एक नौकर भी। सुरक्षित स्थान में पहुँचने पर पीरअली ने कहा, 'आप अकेले भाडेर चले जाइये। मे यही रहूँगा। रानी की सेना के साथ मिलकर महल पर