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झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography

वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा

DevanagariHindipublished526 पृष्ठ

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पृष्ठ 323

३१२ झाँसी की रानी मैं भी हमला करूंगा। उनका भला बन जाऊँगा और महल मे जो कुछ बचाने योग्य है, बचाने की कोशिश करूंगा। यहा रह कर आपकी अधिक सेवा कर सकूंगा।' 'किस तरह ?', अलीबहादुर ने आतुरता के साथ पूछा। पीरअली ने उत्तर दिया, 'आपको समय समय पर समाचार मिलता रहेगा और जब अङ्गरेज यहा रानी से लडने के लिये आवेंगे तब उनको आपके सेवक के द्वारा बडी सहायता मिलेगी। आप फिर झासी आवेंगे ? फिर महल आपके होगे और कोई बडी जागीर भी कम्पनी सरकार की तरफ से आपको मिलेगी, क्योकि रानी का राज थोडे दिन ही और टिकेगा। इस वक्त तो खून का सा घूँट पीकर रह जाइये। अपमान का बदला लिया जायगा आप प्रतीति रखिये। अलीबहादुर चले गये। पीरअली रानी के सैनिको की ओर लौट पडा। उसको सैनिक पहिचानते थे। मारने पकडने को दौडे। सागरसिंह उस भीड में था। पीरअली ने कहा, 'क्या करते हो, मै तो तुम्हारा मित्र हू। महारानी साहव का शुभचिन्तक। बस्ती भर जानती है। नौकरी नवाब साहब की जरूर करता रहा हूँ परन्तु सदा उनको समझाता रहा कि सीधे रास्ते पर चलो। वे नही माने उन्होने भुगता। मै तुम्हारी सहायता करने आया हू। यह महल गोला गोली लायक नही है। इसमें आग लगाओ।' सैनिको को कुछ आश्वासन हुआ। सागरसिंह ने पूछा, 'किधर से आग लगाये ? नवाब साहव कहा हैं ?' 'भीतर,' पीरअली ने उत्तर दिया, 'आग फाटक से लगाना शुरू करो। दरवाजा अपने आप खुल जायगा। भीतर काफी माल है। मुझको सब पता है। राई-रत्ती बतलाऊँगा।' सिपाहियो ने फाटक में आग लगा दी। जल जाने पर घुसने का मार्ग मिल गया। फिर भीतर के फाटको में आग लगाई। एक दो जगह और।

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