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झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography

वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा

DevanagariHindipublished526 पृष्ठ

पृष्ठ 324, कुल 526 में से

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पृष्ठ 324

लक्ष्मीबाई ३१३ पीरअली ने स्वयं कई जगह अग्नि प्रज्वलित की। जब भीतर पहुंचे तो वहा कोई न मिला । 'मालूम होता है गडवड में नवाब साहब निकल भागे। मगर असबाब सामान तो मौजूद है।' पीरअली ने उनकी साधारण धन सम्पत्ति लुटवा दी। थोडी देर में आग शान्त हो गई, परन्तु काफी क्षति हो गई थी। पीरअली का नाम हो गया कि रानी की सेना के साथ वह नवाब साहब और नत्थेखा की फौज के खिलाफ लडा। काशीनाथ और सागर- सिंह ने विश्वास दिलाया। मोतीबाई को आश्चर्य था। परन्तु विजय के हर्ष में अपने हितचिन्तक पर सन्देह करना ईश्वर के प्रति कृतज्ञता की मात्रा को कम करना था। इसलिये पीरअली शीघ्र विश्वासपात्र लोगो की गिनती में मान लिया गया। रानी ने गुलाम गौसखा, रघुनाथसिंह और भाऊ बख्शी को विशेष तौर पर पुरस्कृत किया। दीवान खास में जब रघुनाथसिंह अकेला रह गया तब उसने रानी से प्रार्थना की। 'सरकार मुझको सब कुछ मिल गया। केवल लड्डू रह गये।' रानी हँसी मुन्दर पास खडी थी। उससे कहा, 'उस दिन तू ही थाल उठा लाई थी। आज भी तू ही ला।' मुन्दर थाल ले आई। बहुत प्रसन्न थी। रानी ने आदेश दिया, 'अब तू ही खिला भी दे।' मुन्दर ने रघुनाथसिंह को लड्डू खिलाये। वह हँस-हँसकर लड्डू खिलाने में सचेष्ट थी, परन्तु रघुनाथसिंह अधिक नही खा सका। उसके गले में कुछ अटक अटक जाता था।

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