झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)
Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography
वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंलक्ष्मीबाई २७५ शाहगढ का राजा बखतबली था । उसने भी विप्लव किया । सागर, दमोह, जवलपूर के जिले में विद्रोहियो की सख्या बहुत बढ गई । दमोह जिले के तो समस्त लोधी क्रान्ति में सम्मिलित हो गये । ये सब शाहगढ के राजा के साथ थे । उससे लडने के लिये सागर से पलटन आई, पर राजा बखतबली ने उसको आसानी से हरा दिया । इस राजा के एक सरदार बोधन दौआ ने गढा कोटा पर चढाई की और उस पर अधिकार कर लिया । राजा मर्दनसिंह चन्देरी को अधिकृत करके सागर लौटा । उसी समय जवलपूर की हिन्दुस्थानी पलटन ने भी विप्लव कर दिया । अङ्गरेजो ने पन्ना राज्य से सहायता मागी । पन्ना के राजा ने अङ्गरेजो की सहायता के लिये अपनी काफी सेना भेजी । पन्ना की सेना ने विप्लवकारियो को दमोह के जिले में पराजित किया और अङ्गरेजो की ओर से दमोह का शासन किया । पन्ना की सेना जबलपूर की विप्लव- कारिणी पलटन से भी लडी और उसको भी हरा दिया । झासी के चारो ओर, दूर और पास, इसी प्रकार की परिस्थिति थी । इस परिस्थिति में रानी लक्ष्मीबाई झासी में एक सुदृढ स्फटिक सी थी । झासी जिले में उन्होने प्रबलता के साथ शान्ति स्थापित की । उनकी दिनचर्या वैसे ही नियम-सयम के साथ चली जा रही थी । उनकी चर्या में केवल दो अन्तर आये । एक तो वे सुबह के नित्य कृत्यो और पूजा ध्यान के उपरान्त राज्य के कर्मचारियो को मिलने और उनकी समस्याओ को सुनने के लिये समय देने लगी, दूसरे ठीक तीन बजे के पश्चात् वे कचहरी करने लगी । बडे और महत्वपूर्ण मुकद्दमे वे स्वय करती थी और तुरन्त निर्णय कर देती थी । कभी कभी दण्ड भी स्वय अपने हाथ से दे देती थी परन्तु केवल उन मामलो में जिनमें किसी ने बालक या स्त्री को सताया हो । वे कचहरी में टोपी लगाकर बैठती थी । भीतर लोहा ऊपर लाल रेशम । टोपी झालरदार-मोतियो और जवाहरो की । कठ मे हीरो की माला । सुडोल और भरे हुये वक्षस्थल पर कचुकी, जो सुनहरी जरीदार