भारतकोश
झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography

वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा

DevanagariHindipublished526 पृष्ठ

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२७४ झांसी की रानी [ ५४ ] विन्ध्यखण्ड की समग्र जनता में सनसनी फैली हुई थी । यहा की जनता ने कभी किसी अत्याचारी का शासन आसानी के साथ नही माना । स्वाभिमान को आघात पहुचा कि व्यक्ति ने सिर उठाया और -हथियार हाथ में लिया । शायद भारत का यही खण्ड एक ऐसा है जहा डाकू को 'बागी' कहते हैं । विन्ध्यखण्ड छोटी-बडी रियासतो में बिखरा हुआ था । सब बडी बडी रियासते कम्पनी सरकार का साथ दिये थी । बानपूर और शाहगढ साधारण राज्य थे । ये राज्य विप्लव मे शामिल हुये । रानी को इन दोनो राजाओ के स्वाधीनता-प्रिय विचारो का पता था । इन दोनो को उन्होने स्वराज्य-स्थापना के सग्राम में भाग लेने के लिये पत्र भेजे । वे दोनो लडने के लिये उद्यत हो गये । बानपूर राज्य के राजा मर्दनसिंह ने अपनी सेना को लेकर सागर जिले में प्रवेश किया और खुरई तहसील तथा नरयावली के परगने पर अधिकार कर लिया । इसके उपरान्त वह झासी जिले के दक्षिण में ललितपूर आया और चन्देरी की ओर बढा । चन्देरी अगरेज़ो के अधिकार मे थी । वहा विप्लव नही हुआ था । वहा के हाकिम परगना को राजा मर्दनसिंह के आने की ख़बर एक चन्देरी निवासी ने दी । वह कचहरी में था । रैडटेपिज्म ( लाल फीता- जाब्ता) का पुजारी था । खबर देने वाले ने कहा, 'साहब बलवा हो गया है । फौज चढी चली आ रही है ।' साहब उपेक्षा के साथ बोला, 'अर्जी लिखवाकर लाओ । ज़बानी नही सुना जायगा ।' थोडी देर में राजा मर्दनसिंह आ गया । उसने बिना किसी अर्जी- दरख्वास्त के चन्देरी को घेर लिया और बिना किसी अर्जी-पुर्जी के चन्देरी में अग्रेजी शासन को खतम कर दिया ।