झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)
Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography
वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंलक्ष्मीबाई २७३ मार डाला। इस क्रूर दुष्कृत्य के उपरान्त उन लोगो ने स्त्रियो और बच्चो का वध करना चाहा, परन्तु नाना को खबर लग गई और उसने तुरन्त प्रयत्न करके इनको बचा लिया। फिर कुछ समय उपरान्त जब इनको नावो में बिठला कर इलाहाबाद की ओर भेजा जा रहा था, सिपा- हियो ने, नाना की आज्ञा बिना, बल्कि उसकी आज्ञा के प्रतिकूल, कतल करके अपने को कलंकित किया। कानपुर के कुल अङ्गरेजो में से एक स्त्री और चार पुरुष बचकर निकल पाये थे। इन घटनाओ ने अङ्गरेज़ और हिन्दुस्थानी की परस्पर हिंसा को बेहद बढा दिया। लखनऊ में विप्लव ३० मई को आरम्भ हुआ था। अवध भर में विप्लव की आग फैल गई। तो भी कई स्थानो पर विप्लवकारियो ने अङ्गरेज़ स्त्री-बच्चो की प्राणपण से रक्षा की। इलाहाबाद को कब्जे मे करके नील लखनऊ की ओर बढा और जनरल हैवलाक़ कानपुर की ओर। अवध अदम्य जान पडता था। पञ्जाब की छावनियो में भी गडवड हुई, लेकिन उसको दबाने में अङ्गरेजो को ज्यादा मुश्किल का सामना नही करना पडा। झासी के विप्लव का समाचार सागर और बुन्देलखण्ड़ के अन्य ज़िलो में पहुचा। गार्डन के सरिश्तेदार ने सागर चिट्ठी भेजी, जिसमें अङ्गरजो की ओर से रानी द्वारा झासी का प्रबन्ध किये जाने की ओर सकेत था। सागर के अङ्गरेजो को यह भी विदित कर दिया कि झासी के अङ्गरेज़ स्त्री-पुरुषो और बालको की हत्या में रानी का बिलकुल भी हाथ नही था। इस चिट्ठी के पहुचने पर सागर के अङ्गरेज़ सावधान हुये, परन्तु वे विप्लव को थोडे समय तक ही रोकने में सफल हो पाये। सागर की एक हिन्दुस्थानी पल्टन विप्लव में शामिल हो गई। दूसरी पल्टन सरकार-भक्त बनी रही।