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झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography

वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा

DevanagariHindipublished526 पृष्ठ

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पृष्ठ 346

लक्ष्मीबाई ३३५ झासी की भाषा हिन्दी है । नाटक यदि हिन्दी में हो, तो हो, नही तो मुझसे कोई सरोकार न होगा । मेरा निश्चय है ।' सहेलियो ने स्वीकार कर लिया । नाटकमण्डली वालो से कहा गया । उनमें थोडे अभिनेता ही हिन्दी जानते थे । उनकी यह कठिनाई दूर कर दी गई । झासी के हिन्दी जानने वाले अभिनेता शामिल कर लिये गये । उस मण्डली ने हरिश्चन्द्र का अभिनय उत्कृष्टता के साथ किया । मोतीबाई इत्यादि जानकारो तक ने सराहना की । रानी ने मण्डली के प्रबन्धक को चार सहस्र रुपया पुरस्कार दिया । मण्डली ग्वालियर चली गई ।* रानी ललित कलाओ की प्रवल पोषक थी । उस कठिन और चिन्ताकुल समय में भी रानी प्रत्येक नवागन्तुक गायक, वीणकार, सितारिये इत्यादि को सुनने के लिये थोडा बहुत समय दिया करती थी और उचित पुरस्कार भी । कवि, चित्रकार, शिल्पी कोई भी उन्मुख नही जाता था । शास्त्री, याज्ञिक, ज्योतिषी, वैद्य, हकीम इत्यादि भी पोषण पाते थे । अपनी इसी वृत्ति को वे स्वराज्य में विकसित और प्रसरित देखना चाहती थी । पीरअली देर-सवेर सब महात्वपूर्ण समाचार नवाब अलीबहादुर के पास बडी सावधानी के साथ' भेजता रहता था । झासी छोडने के कुछ दिनो बाद वे घूमते-घामते दतिया पहुचे । वहा थोडे समय रहकर भाडेर पहुच गये । झासी से दतिया १७ मील और भाडेर चौबीस । नवाब अलीबहादुर उन्ही स्थानो से अग्रेजो को काम के समाचार भेजते रहते थे । रोज इत्यादि अंग्रेज जनरल झासी को अधिकृत करने के महत्व को जानते थे । उन लोगो को नवाब से निरर्थक और सार्थक—सभी तरह के - हाल समय समय पर मिलते रहते थे । मदनपूर युद्ध के पश्चात झासी रोज का प्रथम लक्ष्य और पहला कर्तव्य बनी ।

  • देखिये परिशिष्ट ।