झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)
Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography
वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३३४ झाँसी की रानी भागा । रोज ने अपनी सेना के भिन्न-भिन्न टुकडो को आदेश दिया कि विप्लवकारियो का पीछा करते हुये वे उसको झासी के निकट मिलें । वानपुर के राजा मर्दनसिंह ने मदनपूर की पराजय और नर-संहार का वृत्तान्त झासी भेजा । झासी में और राज्य के बडे बड़े नगरो और ग्रामो में, जहा जहा गढ और किले थे, तैयारी शुरू हो गई । उन्ही दिनो ग्वालियर से झासी में एक नाटकमंडली आई । मुन्दर ने अनुनय पूर्वक कहा, 'सरकार, लडाई के आरम्भ होने के पहले एकाध खेल अपनी नाटकशाला में भी हो जाने की अनुमति दी जाय।' 'यह समय नाटक और तमाशो का नही है,' रानी मिठास के साथ बोली । सुन्दर ने अनुरोध किया, 'में लडाई में मारी गई तो फिर कब नाटक देखूँगी ।' रानी ने हँसकर कहा, 'दूसरे जन्म में । उस समय तुझको स्वराज्य स्थापित किया हुआ मिलेगा ।' काशीबाई ने आग्रह किया, 'केवल एक खेल सरकार, और फिर हम लोग जो खेल खेलेगी उसको स्वराज्य वाले सदा स्मरण किया करेंगे ।' 'युद्ध वास्तव में है ही किस निमित्त ?' रानी मुस्कुराकर बोली, अपने जीवन और धर्म की रक्षा के लिये, अपनी संस्कृति और अपनी कला के बचाने के लिये । नही तो युद्ध एक व्यर्थ का रक्तपात ही है। यह खेल जल्दी हो जाय और फिर उस खेल को ऐसा खेलो कि अंग्रेजो के छक्के छूट जायें और यह देश उनकी फास से मुक्त हो जाय ।' मुन्दर ने हर्ष में कहा, 'सरकार खेल मराठी में होगा ।' रानी बोली—'झासी में मराठी ! महाराष्ट्र यहा बडी सख्या में हैं यह ठीक है, और वे लोग अपने मनोरजन के लिये मराठी में नाटक खिलवावे परन्तु वह नाटकमण्डली राज्य का आश्रय तभी पावेगी जब नाटक हिन्दी में खेले । अवश्य मेरा जन्म महाराष्ट्र कुल में हुआ है, परन्तु में अपने को महाराष्ट्र न समझकर विन्ध्याखण्डी समझती हू। मेरी