झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)
Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography
वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंलक्ष्मीबाई ३३३ [ ६३ ] जब जनरल रोज़ ने सागर पर आक्रमण करके क़ैदी अङ्गरेजो को मुक्त किया, उनको इतना हर्ष हुआ कि उन्होने तोपो की सलामी दागी ! सागर को अधिकार में कर लेने के बाद रोज़ ने गढाकोटा को हाथ में लिया । परन्तु जगह जगह विप्लवकारियो के सशस्त्र दल विखरे हुये थे । इनका दमन करने के लिये रोज़ ने अपनी सेना के कई भाग किये और उनको भिन्न-भिन्न दिशाओ में भेजा । वह स्वय सेना के एक बडे भाग के साथ झासी के लिये नारहट घाटी की ओर आया । उसकी सेना का एक भाग शाहगढ के राजा बखतवली का मुकाबला करने के लिये गया था । वहा देखा तो बखतवली काफी बडी सेना लिये हुये मौजूद है। नारहट घाटी पर मर्दनसिंह की भी सेना बहुसख्यक थी । रोज़ अपनी सेना लेकर मदनपूर घाटी की ओर बढा । मर्दनसिंह ने भी उसी ओर बाग मोडी, रोज़ चाहता था कि बखतबली और मर्दनसिंह मिलने न पावे, इसलिये उसने सेना का एक भाग मर्दनसिंह को अटकाने के लिये नारहट घाटी की ओर लौटाया और स्वय मदनपूर की ओर चल दिया । मदनपूर उस स्थल से पूर्व की ओर लगभग २० मील था । मर्दनसिंह रोज़ की इस चाल को न समझ सका और वह मदनपूर की ओर न बढकर नारहट घाटी पर लौट आया । बखतवली के साथ रोज़ का घोर युद्ध हुआ । दो पहाडो के बीच में मदनपूर का गाँव और झील है। इस सुहावनी झील के पास ही वह भयकर सग्राम हुआ था । बहुत अङ्गरेजी सेना मारी गई । खुद रोज़ घायल हुआ । परन्तु वह लडाई जीत गया । यदि मर्दनसिंह और बखतबली की सेनाओ का मेल हो गया होता तो रोज़ की पराजय निश्चित थी— मदनपूर की झील में रोज़ के सेनापतित्व का अन्तिम इतिहास उसी दिन लिख गया होता । बखतबली के अनेक सरदार पकडे गये और मार डाले गये । बखतबली की पराजय का हाल सुनकर मर्दनसिंह नारहट घाटी को छोडकर