झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)
Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography
वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३३२ झाँसी की रानी 'पञ्चायत के निर्णय का कैसे उल्लङ्घन करूँ ?' 'सरकार, बछिया मरी नह्या ।' 'ब्राह्मण को बुलवाओ जसकी बछिया थी ।' जब तक ब्राह्मण आया, तब तक रानी बाजार वालो से, उनके बालबच्चो की कुशलवार्ता पूछती रही । ब्राह्मण के आने पर रानी ने अपनी सौगन्ध धराकर सच्चा हाल कहने का आग्रह किया । कोई गुञ्जायश झूठ बोलने के लिये न रही । ब्राह्मण ने कहा, 'महाराज, चाहे मारें चाहे पाले, सच बात यह है कि बछिया मरी नही है । वह मेरे एक नातेदार के यहा दतिया राज्य में भेज दी गई है ।' रानी ब्राह्मण को उसके फरेब के लिये कुछ दण्ड देना चाहती थी, परन्तु बाजार के मुखिया-चौधरी आडे आगये । ब्राह्मण छोड दिया गया । परन्तु बाजार वाले भोचक्के से रह गये । जो लोग झलकारी की गधा-सवारी का जुलूम देखने के आकाङ्क्षी थे, बहुत निराश हुये । पञ्चो को अपना निर्णय वापिस लेने मे असुविधा हुई । वापिस लेना पडा, परन्तु पूरन को एक पगत बछिया के घायल होने के कारण तो भी देनी पडी । प्रायश्चित्त की ऐसी पङ्गतो में कुछ ब्राह्मण और कुछ अन्य जातियो के सरपञ्च बुलाये जाते थे । पूरन ने कुछ ब्राह्मण तो न्योत लिये, परन्तु बाजार के सरपञ्च श्याम चौधरी और मगन गन्दी को नही बुलाया । ये दोनो बिना निमन्त्रण के पूरन के यहा पहुँच गये । पूरन को आश्चर्य और परिताप हुआ । श्याम चौधरी ने कहा, 'तुम न्योतना भूल गये तो हम पङ्गत में आना तो नही भूले ।' ऐसे लोगो के लिये भोजन ब्राह्मण बनाता था और ये लोग भोज में शरीक होते थे । इसी प्रकार के सहयोग के कारण तत्कालीन समाज के वे दुखदायक पहलू किसी प्रकार भुगत लिये जाते थे ।