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झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography

वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा

DevanagariHindipublished526 पृष्ठ

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लक्ष्मीबाई ३३१ 'खाना पकाने के लिये कोई पूरन को आगी तक न दे।' 'कोई उसको छुये नही।' इत्यादि व्यवस्थायें भी दे डाली गईं। पूरन ने खोजकर पता लगा लिया कि वछिया मरी नही है। परन्तु लोगो को अपनी बात और व्यवस्था वापिस नही लेनी थी, इसलिये ब्राह्मण को फोड लिया और उसने घायल वछिया को छिपा लिया। कह दिया कि न जाने कहा गई—मर गई। कोरियो ने पञ्चायत की। वहिष्कार का दण्ड दिया। उस युग के हिन्दू के लिये रौरव नरक से बढकर। काला मुँह करके गधे पर चढाकर बाजार में जुलूस निकालने की वात तै की। पूरन के बहुत घिघियाने-पतियाने और कुछ और स्त्रियो के आडे आ जाने के कारण काला मुँह करना तो, निर्णय में से कम कर दिया गया बाकी सजा बहाल रही। जिस दिन प्रायश्चित का यह रूप प्रकट होना था, उस दिन शुक्रवार था सन्ध्या का समय निश्चित था। उसी दिन रानी महालक्ष्मी के मन्दिर को जाने वाली थी वे हलवाई- पुरे के पश्चिमी सिरे पर उस दिन अकेली सवार आ रही थी। थोडी दूर पीछे एक अङ्गरक्षक था। कुछ अधनगे मगतो ने घेरा। रानी ने पूछा, 'क्या है?' उत्तर मिला—'ठन्क के मारे मर रहे हैं। कपडा नही है।' रानी ने अङ्गरक्षक को बुलाकर आज्ञा दी, 'दीवान से कहो कि शहर में जितने मागने, भिखारी साधू, फकीर हो, उन सब को एक एक कुर्ती बनवा दें और एक एक कम्बल दे।' मगतो को विश्वास हो गया कि आज्ञा का पालन होगा। हलवाईपुरा के मध्य में पहुची कि पूरन घोडे के सामने जा गिरा। रानी के पूछने पर उसने अपनी विपत्ति सुनाई। रानी सोच- विचार में पड गई।