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झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography

वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा

DevanagariHindipublished526 पृष्ठ

लक्ष्मीबाई ३३१ 'खाना पकाने के लिये कोई पूरन को आगी तक न दे।' 'कोई उसको छुये नही।' इत्यादि व्यवस्थायें भी दे डाली गईं। पूरन ने खोजकर पता लगा लिया कि वछिया मरी नही है। परन्तु लोगो को अपनी बात और व्यवस्था वापिस नही लेनी थी, इसलिये ब्राह्मण को फोड लिया और उसने घायल वछिया को छिपा लिया। कह दिया कि न जाने कहा गई—मर गई। कोरियो ने पञ्चायत की। वहिष्कार का दण्ड दिया। उस युग के हिन्दू के लिये रौरव नरक से बढकर। काला मुँह करके गधे पर चढाकर बाजार में जुलूस निकालने की वात तै की। पूरन के बहुत घिघियाने-पतियाने और कुछ और स्त्रियो के आडे आ जाने के कारण काला मुँह करना तो, निर्णय में से कम कर दिया गया बाकी सजा बहाल रही। जिस दिन प्रायश्चित का यह रूप प्रकट होना था, उस दिन शुक्रवार था सन्ध्या का समय निश्चित था। उसी दिन रानी महालक्ष्मी के मन्दिर को जाने वाली थी वे हलवाई- पुरे के पश्चिमी सिरे पर उस दिन अकेली सवार आ रही थी। थोडी दूर पीछे एक अङ्गरक्षक था। कुछ अधनगे मगतो ने घेरा। रानी ने पूछा, 'क्या है?' उत्तर मिला—'ठन्क के मारे मर रहे हैं। कपडा नही है।' रानी ने अङ्गरक्षक को बुलाकर आज्ञा दी, 'दीवान से कहो कि शहर में जितने मागने, भिखारी साधू, फकीर हो, उन सब को एक एक कुर्ती बनवा दें और एक एक कम्बल दे।' मगतो को विश्वास हो गया कि आज्ञा का पालन होगा। हलवाईपुरा के मध्य में पहुची कि पूरन घोडे के सामने जा गिरा। रानी के पूछने पर उसने अपनी विपत्ति सुनाई। रानी सोच- विचार में पड गई।

३३२ झाँसी की रानी 'पञ्चायत के निर्णय का कैसे उल्लङ्घन करूँ ?' 'सरकार, बछिया मरी नह्या ।' 'ब्राह्मण को बुलवाओ जसकी बछिया थी ।' जब तक ब्राह्मण आया, तब तक रानी बाजार वालो से, उनके बालबच्चो की कुशलवार्ता पूछती रही । ब्राह्मण के आने पर रानी ने अपनी सौगन्ध धराकर सच्चा हाल कहने का आग्रह किया । कोई गुञ्जायश झूठ बोलने के लिये न रही । ब्राह्मण ने कहा, 'महाराज, चाहे मारें चाहे पाले, सच बात यह है कि बछिया मरी नही है । वह मेरे एक नातेदार के यहा दतिया राज्य में भेज दी गई है ।' रानी ब्राह्मण को उसके फरेब के लिये कुछ दण्ड देना चाहती थी, परन्तु बाजार के मुखिया-चौधरी आडे आगये । ब्राह्मण छोड दिया गया । परन्तु बाजार वाले भोचक्के से रह गये । जो लोग झलकारी की गधा-सवारी का जुलूम देखने के आकाङ्क्षी थे, बहुत निराश हुये । पञ्चो को अपना निर्णय वापिस लेने मे असुविधा हुई । वापिस लेना पडा, परन्तु पूरन को एक पगत बछिया के घायल होने के कारण तो भी देनी पडी । प्रायश्चित्त की ऐसी पङ्गतो में कुछ ब्राह्मण और कुछ अन्य जातियो के सरपञ्च बुलाये जाते थे । पूरन ने कुछ ब्राह्मण तो न्योत लिये, परन्तु बाजार के सरपञ्च श्याम चौधरी और मगन गन्दी को नही बुलाया । ये दोनो बिना निमन्त्रण के पूरन के यहा पहुँच गये । पूरन को आश्चर्य और परिताप हुआ । श्याम चौधरी ने कहा, 'तुम न्योतना भूल गये तो हम पङ्गत में आना तो नही भूले ।' ऐसे लोगो के लिये भोजन ब्राह्मण बनाता था और ये लोग भोज में शरीक होते थे । इसी प्रकार के सहयोग के कारण तत्कालीन समाज के वे दुखदायक पहलू किसी प्रकार भुगत लिये जाते थे ।

लक्ष्मीबाई ३३३ [ ६३ ] जब जनरल रोज़ ने सागर पर आक्रमण करके क़ैदी अङ्गरेजो को मुक्त किया, उनको इतना हर्ष हुआ कि उन्होने तोपो की सलामी दागी ! सागर को अधिकार में कर लेने के बाद रोज़ ने गढाकोटा को हाथ में लिया । परन्तु जगह जगह विप्लवकारियो के सशस्त्र दल विखरे हुये थे । इनका दमन करने के लिये रोज़ ने अपनी सेना के कई भाग किये और उनको भिन्न-भिन्न दिशाओ में भेजा । वह स्वय सेना के एक बडे भाग के साथ झासी के लिये नारहट घाटी की ओर आया । उसकी सेना का एक भाग शाहगढ के राजा बखतवली का मुकाबला करने के लिये गया था । वहा देखा तो बखतवली काफी बडी सेना लिये हुये मौजूद है। नारहट घाटी पर मर्दनसिंह की भी सेना बहुसख्यक थी । रोज़ अपनी सेना लेकर मदनपूर घाटी की ओर बढा । मर्दनसिंह ने भी उसी ओर बाग मोडी, रोज़ चाहता था कि बखतबली और मर्दनसिंह मिलने न पावे, इसलिये उसने सेना का एक भाग मर्दनसिंह को अटकाने के लिये नारहट घाटी की ओर लौटाया और स्वय मदनपूर की ओर चल दिया । मदनपूर उस स्थल से पूर्व की ओर लगभग २० मील था । मर्दनसिंह रोज़ की इस चाल को न समझ सका और वह मदनपूर की ओर न बढकर नारहट घाटी पर लौट आया । बखतवली के साथ रोज़ का घोर युद्ध हुआ । दो पहाडो के बीच में मदनपूर का गाँव और झील है। इस सुहावनी झील के पास ही वह भयकर सग्राम हुआ था । बहुत अङ्गरेजी सेना मारी गई । खुद रोज़ घायल हुआ । परन्तु वह लडाई जीत गया । यदि मर्दनसिंह और बखतबली की सेनाओ का मेल हो गया होता तो रोज़ की पराजय निश्चित थी— मदनपूर की झील में रोज़ के सेनापतित्व का अन्तिम इतिहास उसी दिन लिख गया होता । बखतबली के अनेक सरदार पकडे गये और मार डाले गये । बखतबली की पराजय का हाल सुनकर मर्दनसिंह नारहट घाटी को छोडकर

३३४ झाँसी की रानी भागा । रोज ने अपनी सेना के भिन्न-भिन्न टुकडो को आदेश दिया कि विप्लवकारियो का पीछा करते हुये वे उसको झासी के निकट मिलें । वानपुर के राजा मर्दनसिंह ने मदनपूर की पराजय और नर-संहार का वृत्तान्त झासी भेजा । झासी में और राज्य के बडे बड़े नगरो और ग्रामो में, जहा जहा गढ और किले थे, तैयारी शुरू हो गई । उन्ही दिनो ग्वालियर से झासी में एक नाटकमंडली आई । मुन्दर ने अनुनय पूर्वक कहा, 'सरकार, लडाई के आरम्भ होने के पहले एकाध खेल अपनी नाटकशाला में भी हो जाने की अनुमति दी जाय।' 'यह समय नाटक और तमाशो का नही है,' रानी मिठास के साथ बोली । सुन्दर ने अनुरोध किया, 'में लडाई में मारी गई तो फिर कब नाटक देखूँगी ।' रानी ने हँसकर कहा, 'दूसरे जन्म में । उस समय तुझको स्वराज्य स्थापित किया हुआ मिलेगा ।' काशीबाई ने आग्रह किया, 'केवल एक खेल सरकार, और फिर हम लोग जो खेल खेलेगी उसको स्वराज्य वाले सदा स्मरण किया करेंगे ।' 'युद्ध वास्तव में है ही किस निमित्त ?' रानी मुस्कुराकर बोली, अपने जीवन और धर्म की रक्षा के लिये, अपनी संस्कृति और अपनी कला के बचाने के लिये । नही तो युद्ध एक व्यर्थ का रक्तपात ही है। यह खेल जल्दी हो जाय और फिर उस खेल को ऐसा खेलो कि अंग्रेजो के छक्के छूट जायें और यह देश उनकी फास से मुक्त हो जाय ।' मुन्दर ने हर्ष में कहा, 'सरकार खेल मराठी में होगा ।' रानी बोली—'झासी में मराठी ! महाराष्ट्र यहा बडी सख्या में हैं यह ठीक है, और वे लोग अपने मनोरजन के लिये मराठी में नाटक खिलवावे परन्तु वह नाटकमण्डली राज्य का आश्रय तभी पावेगी जब नाटक हिन्दी में खेले । अवश्य मेरा जन्म महाराष्ट्र कुल में हुआ है, परन्तु में अपने को महाराष्ट्र न समझकर विन्ध्याखण्डी समझती हू। मेरी

लक्ष्मीबाई ३३५ झासी की भाषा हिन्दी है । नाटक यदि हिन्दी में हो, तो हो, नही तो मुझसे कोई सरोकार न होगा । मेरा निश्चय है ।' सहेलियो ने स्वीकार कर लिया । नाटकमण्डली वालो से कहा गया । उनमें थोडे अभिनेता ही हिन्दी जानते थे । उनकी यह कठिनाई दूर कर दी गई । झासी के हिन्दी जानने वाले अभिनेता शामिल कर लिये गये । उस मण्डली ने हरिश्चन्द्र का अभिनय उत्कृष्टता के साथ किया । मोतीबाई इत्यादि जानकारो तक ने सराहना की । रानी ने मण्डली के प्रबन्धक को चार सहस्र रुपया पुरस्कार दिया । मण्डली ग्वालियर चली गई ।* रानी ललित कलाओ की प्रवल पोषक थी । उस कठिन और चिन्ताकुल समय में भी रानी प्रत्येक नवागन्तुक गायक, वीणकार, सितारिये इत्यादि को सुनने के लिये थोडा बहुत समय दिया करती थी और उचित पुरस्कार भी । कवि, चित्रकार, शिल्पी कोई भी उन्मुख नही जाता था । शास्त्री, याज्ञिक, ज्योतिषी, वैद्य, हकीम इत्यादि भी पोषण पाते थे । अपनी इसी वृत्ति को वे स्वराज्य में विकसित और प्रसरित देखना चाहती थी । पीरअली देर-सवेर सब महात्वपूर्ण समाचार नवाब अलीबहादुर के पास बडी सावधानी के साथ' भेजता रहता था । झासी छोडने के कुछ दिनो बाद वे घूमते-घामते दतिया पहुचे । वहा थोडे समय रहकर भाडेर पहुच गये । झासी से दतिया १७ मील और भाडेर चौबीस । नवाब अलीबहादुर उन्ही स्थानो से अग्रेजो को काम के समाचार भेजते रहते थे । रोज इत्यादि अंग्रेज जनरल झासी को अधिकृत करने के महत्व को जानते थे । उन लोगो को नवाब से निरर्थक और सार्थक—सभी तरह के - हाल समय समय पर मिलते रहते थे । मदनपूर युद्ध के पश्चात झासी रोज का प्रथम लक्ष्य और पहला कर्तव्य बनी ।

  • देखिये परिशिष्ट ।

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त्रस्त ( क्या सचमुच ? ) [ ६४ ] मदनपूर की लडाई जीतने के बाद रोज की सेना ने शाहगढ को अधिकार में किया । फिर मडावरा की गढी को कब्जे में करने के उपरान्त वानपूर राज्य को अङ्गरेजी राज्य में मिला लिया। वानपूर के महल के कुछ भाग को तोप से उडा दिया, बाकी को जला दिया और इन दोनो राज्यो के बडे कर्मचारियो को फासी पर चढा दिया । इन महलो में पुस्तको और चित्रो का भी सग्रह था, परन्तु विप्लवकारियो की सम्पत्ति होने के कारण वे अस्पृश्य हो गये थे । वध और अग्नि बरसाती हुई, रोज की सेना १२ मार्च सन् १८५८ को तालवेहट आ पहुँची । तालवेहट का प्राचीन दृढ किला लडाई के लिये उपयुक्त था, परन्तु उसमें विप्लवकारी बहुत थोडी सख्या में थे और उनका नायक कोई बडा आदमी न था । मुकाबले में रोज सरीखा चतुर और विजय प्राप्त सेनापति तथा अङ्गरेजो की विशाल सेना और तोपे - विप्ल- वकारी भाग गये और रोज ने तालवेहट का किला सहज ही अधिकार में कर लिया । चन्देरी में वानपूर के राजा का एक दस्ता था । रोज ने सोचा बग़ल के इस काटे को पहले निकाल डालना चाहिये । उसने चंदेरी पर

३३८ झाँसी की रानी हमला करने के लिये अपने एक अफसर ब्रिगेडियर स्टुअर्ट को भेजा । स्टुअर्ट ने बिना किसी कठिनाई के चंदेरी को पराजित कर दिया । झाँसी की पूर्वी तहसील मऊ में एक छोटा सा गढ था । इस गढ में रानी की ओर से काशीनाथ भैया और आनन्दराय इत्यादि छोटे छोटे जागीरदार तैयारी कर चुके थे । मऊ के दमन के लिये रोज ने बानपूर विध्वंस के बाद अपना एक दस्ता सीधा भेज दिया था । रोज ने झाँसी पर चढाई करने के पहले रानी लक्ष्मीबाई के पास सम्वाद भेजा । 'आप अपने दीवान लक्ष्मणराव, लाला भाऊबख्शी, मोरोपन्त ताम्बे ( आपके पिता ), नाना भोपटकर, दीवान जवाहरसिंह, दीवान रघुनाथसिंह, कुंवर खुदाबख्श और मोतीसाई के साथ निश्शस्त्र चली आवें अन्यथा कठोर और भयंकर फल के लिये तैयार रहे ।' इस प्रकार के संवाद के लिये रानी तैयारी थी, परन्तु जिस मोतीसाईं को जनरल रोज चाहते थे उसके स्मरण से रानी के दीवान खास में हंसी का तूफान खडा हो गया - 'नाना साहब,' रानी ने हंसी को रोक कर कहा, 'इस मोतीसाई को कहा से पकड़ बुलाऊँ ?' नाना भोरटकर ने कहा, 'सरकार के यहा यदि बनावट चलती होती और जाली सिक्के ढलते होते तो किसी न किसी को सांई का चोगा पहिना दिया जाता ।' मोतीबाई दीवान खास में मौजूद थी भुझलाई हुई सूरत बनाकर बोली, 'सरकार दूत को बुलाकर पूछा जाय कि मोतीसाई किस हुलिया का आदमी है ।' मोरोपन्त ने कहा, 'उसके लम्बी दाढी होगी, बडे बडे केश और टूनी आखें । सांइयो और साधुओ ने अङ्गरेजी फौज के भडकाने में ज्यादा भाग लिया है, इसलिये रोज़ को एक सांई भी चाहिये ।' दीवान लक्ष्मणराव गंभीर होकर बोला, 'सरकार उत्तर जल्दी भेज

लक्ष्मीबाई ३३६ दिया जाना चाहिये। दूत को शीघ्र लौटना है, क्योकि उसको कोई भी अपने घर नही ठहराना चाहेगा। भाऊ बख्शी ने कहा, 'और रोज़ यहा से बहुत दूर भी नही है। शायद दूत के पीछे पीछे आ रहा हो।' मोतीबाई ने पूछा, 'और यह मोतीसाई कौन सी बला है ? इसका क्या उत्तर होगा ?' रानी ने हँसी को दबाकर कहा, 'मै बतलाऊँगी।' लक्ष्मणराव फिर बोला, 'क्या उत्तर दिया जाय ?' रानी ने और भी अधिक गंभीर होकर कहा, 'मै अकेली उत्तर देने वाली कौन होती हूँ ? झासी के समग्र मुखियो को, सब जातियो के पञ्चो को जोड़ो। अपने सब सरदार इस समय झासी में ही हैं। वे सब और आप लोग एकमत होकर कहदे तो मै अकेली निश्शस्त्र चली जाऊँगी।' वाक्य समाप्त होते होते रानी ने श्वास और उच्छ्वास लिये और किसी उखडते हुये भाव का कठिनता के साथ, कठोरता के साथ नियन्त्रण किया। तुरन्त झासी के मुखिया, पञ्च, सरदार इत्यादि इकट्ठे किये गये। जो कुछ उन लोगो ने कहा उसमे महत्व की बाते ये थी। 'लडेंगे। अपनी झासी के लिये, अपनी रानी के लिये, मरेंगे।' 'हमारे पास जितना रुपया और आभूषण हैं, सब स्वराज्य की लड़ाई के लिये रानी के हाथ सकल्प है।' 'हम दिखलायेंगे कि झासी का पानी कितना स्वच्छ और कितना गहरा है।' 'आप अङ्गरेजो को उत्तर दीजिये कि झासी उन लोगो को मा की छठी के दूध की याद दिलावेगी।' जनमत रानी के मत से मिला हुआ था ही, इस समय बहुत प्रवल हो गया। परन्तु रानी ने झासी की हुँकार को, वीणा की टङ्कार मे परिवर्तित करके भेजा। उन्होने लिखा।

३४० झाँसी की रानी मिलने के लिये क्यो बुलाया-इसका व्योरा आपने कुछ नही दिया । मिलाप के पर्दे में मुझे धोखा दिखलाई पडता है । मै स्त्री हू । निश्शस्त्र कैसे आ सकती हू ? राज्य के दीवान और वख्शी ससैन्य आ सकते हैं।' रानी ने इस चिट्ठी पर अपने हस्ताक्षर किये । भोपटकर से कहा, 'आपकी नीति का क्या फल हुआ ?' उसने उत्तर दिया 'यही कि अंग्रेज लोग बिना सूचना के झाँसी पर नही चढ दौडे ।' 'मार्टिन को चिट्ठी लिखी थी ?' 'हा सरकार । उसने जबलपूर के कमिश्नर को और इस जनरल को अवश्य कुछ लिखा होगा ।' 'फल ?' 'कुछ समय मिल गया, यही बहुत है ।' दूत को रानी की चिट्ठी देदी गई । दूत गया । उसने प्रस्थान न कर पाया होगा कि पीरअली ने रानी के पास सदेसा भेजा, सरकार की आज्ञा हो तो में अंग्रेज छावनी की खबर ले आऊँ कि कितनी और कैसी सेना है, तथा कितनी तोपें हैं और वे लोग किस ढँग से झाँसी पर आक्रमण करेगे ।' मोतीबाई ने इन बातो का पता लगाने का सामर्थ्य तो प्रकट किया, परन्तु पीरअली के भेजे जाने पर आक्षेप नही किया । पीरअली को अनुमति मिल गई । रानी ने मोतीबाई से कहा, 'तेरा नाम कैसे सुन्दर रूप में अंग्रेजो के पास पहुचा है । मुझको कोई सन्देह नही मेरे जासूसी विभाग के सरदार को ही माई बना लिया गया है ।' मोतीबाई बोली, 'सरकार के सामने गाली नही निकलती, परन्तु यदि उन मुँहझौसे रोज को पा गई तो तोप, बन्दूक या तलवार से सच्चा नाम बतलाये बिना न मानूँगी ।'

लक्ष्मीबाई ३४१ मैंने तो दरबार में', रानी ने कहा, 'बड़ी कठिनाई से हँसी को रोक पाया। मोतीबाई ! मोतीबाई कैसा बढ़िया नाम है।' और वह खिलखिलाकर हँस पड़ी। मोतीबाई भी हँसते हँसते बोली, 'सरकार, मेरी चल नही सकती थी, नही तो में चिट्ठी के सिरनामे पर लिखवाती 'मैम साहब रोज को मोतीबाई का सलाम । चुपचाप हिन्दुस्थान को पीठ दिखाओ और अपनी विलायत में झख मारो।' जब यह चिट्ठी उसकी फौज में चर्चा पाती तब उस मुँहजले को मुँह दिखलाने में लाज आती।' रानी गम्भीर हो गई । 'पीरअली कल तो लौट आवेगा ?' 'यदि उसको किसी ने मार्ग में ही समाप्त न कर दिया तो।' 'आदमी तो चतुर है।' 'बहुत काइयाँ। मुझको उस पर कभी कभी अविश्वास हो जाता था, परन्तु कुछ दिनो से वह ऐसा जी लगाकर काम करता है कि सन्देह निवृत्त हो गया।' 'अङ्गरेजो के साथ हिन्दुस्थानी सिपाही भी हैं।' 'मैने भी सुना है। भोपाल और हैदराबाद की रियासतो के दस्ते | हैं। कुछ तिलङ्गा पल्टन है, बाक़ी गोरे।' 'सब कितने होगे ?' 'सरकार ठीक ठीक पता तो नही। कई हजार हैं। ठीक बात पीरअली के लौटने पर मालूम होगी।'

३४२ | झांसी की रानी

[ ६५ ] पीरअली इतनी तेजी के साथ गया कि उसको जनरल रोज़ का दूत मार्ग में मिल गया । उसने जनरल रोज़ के पास पहुँचने की प्रार्थना की । पीरअली को रोज़ के पास पहुँचा दिया गया । उसके पास नवाब अलीबहादुर का सन्देसा और पीरअली का नाम पहुँच चुका था । पीरअली को पाकर रोज़ प्रसन्न हुआ । पीरअली ने रोज़ को झासी की पक्की और कच्ची सब बाते सुनाई । स्त्रियों की सेना का सविस्तार वर्णन सुनकर रोज़ हैरान हो गया । हिन्दुस्थान की स्त्रिया सिपाहीगिरी का काम करती हैं । उसको विश्वास न होता था, परन्तु अलीबहादुर की चिट्ठियो से और उसने बम्बई में आते ही विप्लवकारियो का जो वर्णन सुना था और उस वर्णन में रानी ने जो स्थान पाया था, उससे वह इस असम्भव बात को मानने के लिये तैयार हो गया । रोज़ ने पूछा, 'रानी ने अङ्गरेज बच्चो और स्त्रियो का कतल करवाया ? 'हर्गिज नहीं,' पीरअली ने सच्चा उत्तर दिया । रोज़ को मार्टिन की चिट्ठी की बात जबलपुर के कमिश्नर ने बतलाई थी, और उसने मार्टिन की चिट्ठी पर अपना अविश्वास भी प्रकट किया था । परन्तु रोज़ और उसके साथी अङ्गरेज रानी की निर्दोषिता को मानने के लिये तैयार ही न थे । झासी के कुछ लोगो ने उनके बालबच्चो का वध किया था, इसलिये उनको सारी झासी और सारी भूमि से बदला लेना था । रानी झासी का सजग चिन्ह थी, इसलिये उनको दोषमुक्त कैसे माना जा सकता था ? दूत ने रानी का जो उत्तर दिया, वह शिष्ट और मधुर होते हुये भी स्पष्ट था । रोज़ ने १७ मार्च को तालबेहट से कूच करके बेतवा पार की । पीरअली आगे किस प्रकार जनरल रोज़ की सहायता करेगा, यह तै हो गया और वह शीघ्र झाँसी लौट आया । रोज़ झाँसी की ओर सावधानी के साथ बढा । आसपास का प्रदेश दृढता के साथ अपने अधिकार में करने में उसको दो तीन दिन लग गये ।

लक्ष्मीबाई ३४३ इसी समय रोज को प्रधान सेनापति कैम्बैल का आदेश मिला— 'तात्या टोपे ने चरखारी के राजा को घेर लिया है। पहले चरखारी की सहायता करो।' रोज ने आदेश 'का उल्ल घन किया—वह झासी के महत्व को जानता था। उसने उत्तर दिया, 'मै आज्ञा की अवज्ञा के लिये क्षमा चाहता हूं। चरखारी का गिर पडना या खडा रहना कुछ मूल्य नही रखता। मुझको पहले झासी से निबटना है।' चरखारी को राजभक्ति का पुरस्कार मिल गया। तात्या टोपे ने चरखारी से २४ तोपें और तीन लाख रुपये छीन लिये, और कालपी लौट आया। पीरअली ने जो समाचार रानी के पास भिजवाया वह बहुत अनोखा न था, परन्तु उसको काफी महत्व दिया गया। उसने बतलाया कि पलटने अमुक-अमुक नम्बर की हैं और प्रत्येक पलटन में इतने सिपाही। तोपो की गिनती बतलाई और प्रबन्ध की खूबी को प्रकट किया। रोज की कुल सेना सात हजार कूती गई। नाना भोपटकर तक को पीरअली का विश्वास हो गया और वह- रहस्य के कार्यों में शामिल किया जाने लगा। जब मोतीबाई को ही पीरअली पर सन्देह न रहा तब रानी को सन्देह हो ही क्यो सकता था ? पीरअली ने नवाब साहब के पास भाडेर समाचार भेज दिया और कहला भेजा कि अब बहुत समय तक कोई खबर न मिल सकेगी। पीरअली भयानक खेल खेल रहा था। जिस दिन पीरअली लौटकर आया उसी दिन राहतगढ के भागे हुये लगभग पाच सौ पठान रानी के शरणार्थी हुये। रानी ने उनको नौकर रख लिया। उनके एक सरदार का नाम गुलमुहम्मद था। इन लोगो का समाचार पीरअली ने रोज को नही भेज पाया और इस बात का उसको खेद था।

३४४ झाँसी की रानी रानी के पास जब ये पठान आये तब वे बडी हीन अवस्था में थे। कपडे सब फट गये थे। न जाने कितने दिन से उनको भरपेट भोजन न मिला था। अच्छे हथियार पास न थे। कुछ के पास तो सिवाय लाठी या छुरी के और कुछ न था। रानी ने उनको सब प्रकार की सुविधाये दी। उन्होने प्रण किया, 'स्वराज्य के लिये रानी के कदमो में अपने सबके सिर देगे।' इन पठानो ने अपने प्रण को जैसा निभाया उसको इतिहास जानता है और झासी की लोक परम्परा उसको नही भूली और न कभी भूलेगी। पीरअली को कुछ पठान मिले। उसने पूछा , 'तुम्हारा कौन मुल्क है खान ?' 'झासी अमारा मुलक है बाबा, तुम्हारा मुलक ?' 'मैं झासी का ही रहने वाला हूँ।' 'तब अम तुम बाई बाई हे बाबा ।, 'बाईसाहब का राज्य है खान' 'बेशक हे। और हमारा तुम्हारा बी।' झासी नगर के कोट के सब फाटको पर बडी और छोटी तोपो का उचित प्रबन्ध कर दिया गया। बारूद और गोले फाटको की बुर्जो में इकट्ठे कर दिये गये और निरन्तर युद्ध सामग्री तथा रसद भेजने का प्रबन्ध कर दिया गया। फसीलो के छेद्रो मे से बन्दूको की मार का काम जिन सिपाहियो को दिया गया, उनकी तथा उनके अफसरो की उत्कृष्ट व्यवस्था करली गई। सबसे बडी बात यह हुई कि एक स्थान से दूसरे स्थान को और सब स्थानो से रानी के पास तथा उनके पास से सब स्थानो सब मोर्चों को तुरन्त समाचार और आज्ञाये भेजने का बहुत अच्छा बन्दोबस्त कर लिया गया। ऐसा विश्वास था कि रोज दक्षिण की ओर से आ गया, इसलिये सागर-खिडकी, ओर्छा फाटक और सैयर फाटक का खास इन्तजाम किया गया। दीवान दूल्हाजू ओर्छा फाटक पर, पीरअली सागर खिडकी पर, कुंवर खुदाबख्श सैयर फाटक पर, कुंवर सागरसिंह , खंडेराव फाटक पर,

लक्ष्मीबाई ३४५ पूरन कोरी उनाव फाटक पर नियुक्त किये गये। दीवान जवाहरसिंह के हाथ में सम्पूर्ण नगर और नगर के फाटकों की रक्षा का भार सौंपा गया। किले में हर बुर्ज पर सब मिलाकर इक्यावन बडी बडी तोपे साजी सँभाली गईं। दक्षिणी बुर्ज की तोपे गुलाम गौसखां के सञ्चालन में, पूर्व और उत्तर की तोपे भाऊ बख्शी के हाथ में और पश्चिम की तोपे दीवान रघुनाथसिंह के अधिकार में दी गईं। किले में पठान, चुने हुये बुन्देलखण्डी सैनिक और रानी की स्त्री सेना की नियुक्त कर दी गई। सब सैनिक लगभग चार हजार होगे। पानी का प्रबन्ध बहुत अच्छा न था, परन्तु सन्तोषप्रद था—किले के पश्चिमी भाग में—शंकरगढ में जहा महादेव जी का मन्दिर है—एक कुआँ था उसी से सारी सेना को पानी पिलाने के लिये ब्राह्मण नियुक्त कर दिये गये। चैत की अमावस हो गई। नवरात्र का आरम्भ हुआ। किले में गौर की स्थापना हुई। रानी ने धूमधाम के साथ सिन्दूरोत्सव मनाया। गौर के सामने चांदी ही चांदी के बर्तनो की तड़क भड़क और मन्दिर के बाहर सबके लिये भीगे चने और बताशो का प्रसाद। नगर की स्त्रिया सजधज के साथ उत्सव में शरीक हुई। फूलो की सुन्दरता और सुगन्धि से महादेव जी का मन्दिर भर गया। स्त्रिया थोडी देर के लिये आने वाली विपत्ति को भूल गईं। वे अपने किले में थी, अपनी हँसती-मुस्कराती रानी के पास। उनकी तोपे, उनके गोलन्दाज, उनके सिपाही आसपास और अपनी रक्षा का पुख्ता हौसला अपने मन में। फिर किस बात की चिन्ता थी? महादेव जी के मन्दिर के समीप पलाश का एक वृक्ष था। उसमें इन दिनो प्रति वर्ष बडे बडे लाल फूल लगते थे और तीक्ष्ण ग्रीष्म ऋतु में उसके हरे चिकने बडे पत्ते छाया दिया करते थे। जङ्गल का अवशेष और स्मारक, महादेव के मन्दिर का अकेला पडौसी-वह वृक्ष काटने से बचा दिया गया था। नवरात्र में वह पलाश लाल फूलो से गस गया। स्त्रिया फूलो की एक एक माला उसकी भी डालो को पहिना दे रही थी।

३४६ झाँसी की रानी मानो सौन्दर्य को सुगन्धि प्रदान की गई हो। लाल फूलो पर बेला, 'चमेली, गेंदा और जूही की-रगबिरंगी मालाएँ ऐसी लगती थी जैसे प्रभात के समय ऊषा की किरणो ने गुलाल बिखेर दी हो। इस वृक्ष के नीचे कुआ था और कुएँ के ऊपर एक बारहदरी । इस बारहदरी की रक्षा के लिये ऊँचा परकोटा था। इसके पूर्व में बहुत ऊँचाई पर किले की पश्चिमी बुर्ज और उसके पीछे जरा दूर महल । पूजन के पश्चात स्त्रिया पलाश के वृक्ष के पास से सीढ़ियो द्वारा बारहदारी में इकट्ठी हो हो जा रही थी। रानी वही थी, । वही सिन्दूरोत्सव हो रहा था—हल्दी कूँ कूँ । रानी विधवा थी, इसलिये वह स्वयं सिन्दूर नही दे रही थी, परन्तु वहा भाऊ बख्शी की पत्नी थी और भी अनेक सधवाये थी, जो आपस मे सिन्दूर दे रही थी और किसी न किसी बहाने एक दूसरे के पति का नाम लिवाने का हंस हस कर प्रयत्न कर रही थी । मोतीबाई ने भाऊ बख्शी की पत्नी से कहा, 'तुम अपने देवर को क्या कहकर'पुकारोगी ?' बख्शिन—मेरे देवर हैं ही नही । मोतीबाई—'होता, तो बख्शिनजू उसको कैसे पुकारती?' बख्शिन—'लाला कहती ।' रानी—'और बुन्देलखण्ड में लाला के लिये दूसरा शब्द क्या है ?' बख्शिन—'सरकार, भउआ ।' सब हँस पडी । बख्शिन ने क्रोध में मुद्रा बनाकर कहा, 'महारानी साहब की सहायता से हरा लिया, नही तो मै इतना छकाती कि ये सब याद करती ।' रानी बोली, 'तुम इन सबके लिये अकेली ही बहुत हो ।' बख्शिन मोतीबाई के पीछे पड गई । उसे पकड़कर अकेले में ले गई । बख्शिन—'बतलाओ'भगवान का दूसरा नाम क्या है ?' मोतीबाई—'राम, कृष्ण, मुरारी, परमात्मा, अल्लाह ।' बख्शिन—'ओर, ओर ?'

लक्ष्मीबाई ४७ मोतीबाई—'दयासागर, परिवरदिगार, रहीम...।' बखिशन—'मैं तुम्हारा मुँह मीड दूँगी। बतलाओ वह नाम जिसको मुसलमान लोग दिनरात जपते हैं, नही तो तुम्हारी गत बनाऊँगी।' मीतीबाई ने धीरे से कहा, 'खुदा।' बखिशन ने उसका सिर पकडकर कन्धे से लगा लिया।- बोली, खुदा से दूर हो या उसके पास ?' मोतीबाई ने उत्तर दिया, 'दूर हूँ दीदी। यदि अच्छे दिन आये तो ब्याह करूंगी।' रानी के सामने आने को थी कि मोतीबाई ने बखिशन से कहा, जूही से कुछ मत पूछना। वह सरदार तात्या टोपे को प्राण दिये बैठी है, पर उन्होने आज तक प्यार की दो बाते भी उससे नही की।' 'नही पूछूंगी', बखिशन ने आश्वासन दिया। रानी समझ लिया। छेड़छाड़ नही की। झलकारी नही आई थी। रानी ने उसको बुलवाया। उसने आते ही रानी के पैर पकड लिये। रानी ने कहा, 'मैंने इसके लिये नही बुलाया था। तू हरसाल आती थी। इस साल अब तक क्यो नही आई ?' 'सरकार', झलकारी ने उत्तर दिया, 'मोसें अपराध हो गयो हतो।' रानी बोली, 'कोई अपराध नही हुआ।' झलकारी—'बछिया घायल तौ हो गई ती।' रानी—'हो गई होगी। मरी तो नही—बच गई।' झलकारी—'सरकार ने मोय और मोरे आदमी खों बचा लओ, नई तर कऊँ ठिकानो न हतो।' रानी—'तुम्हारे आदमी का नाम भूल गई उसको क्या कहते है ?' झलकारी—'ऊँ...ऊँ...।' रानी—'ऊँ ऊँ भी कोई नाम होता है ?' बखिशन ने कहा, 'सरकार, इससे बुन्देलखण्डी बोली में बोले।'

३४८ झाँसी की रानी मोतीबाई ने आग्रह किया, सरकार के मुँह से यहां की बोली बहुत अच्छी लगती है।' जूही ने अनुरोध किया । सुन्दर, मुन्दर और काशीबाई भी पीछे पड गईँ । मुन्दर बोली, 'सरकार बुन्देलखण्डो में बोले तो यह अवश्य अपने पति का नाम बतला देगी। बतलाओगी न झलकारी ? बतला देना भला, नही तो हम लोगो की बात बिगड जायगी।' झलकारी ने उस बारहदरी के वातावरण को परिहास, सौन्दर्य, सुगन्धि और आग्रह से भरा पाया-उसने हामी का सिर झुकाया । रानी ने कहा,'तोरे घर वारे को का नाओ भलकारी ?' झलकारी—'हओ ऐसे सूदऊँ बताओ जात कऊँ ?' रानी—'तौ कैसे बताये पनमेसरी ?' झलकारी—'मोए कौनऊँ धोको देओ। जैसे एक बेर पूँछी हती तैसैं पूँछो अपुन ।' रानी—'आज कौन मिती है ?' झलकारी—'पाँचै महाराज ।' रानी—'दस दिन पाँछै का हुये ?' झलकारी—'पूनै ।' रानी हँस पडी । उन्होने फूलो की एक माला झलकारी के गले में डाली । सिर पर हाथ फेरा । विनोद की समाप्ति पर सब स्त्रिया महादेव के मन्दिर के पास उतर आईं । उतरती जाती थी और पलाश के पेड को हिलाती जाती थी । उसके लाल फूल मालाओ समेत झूम झूम जाते थे । महादेव का मन्दिर छोटा सा है और आसपास का-आगन भी सकरा ही है, परन्तु उसमें बहुत स्त्रिया इकट्ठी थी । चहल पहल को बन्द करके रानी ने स्त्रियो से कहा,'दो चार दिन के भीतर ही अपनी झासी के ऊपर गोरो का प्रहार होने वाला है। तुममें

लक्ष्मीबाई ३४६ से अनेक युद्ध विद्या सीख गई हो। जो जिस कार्य को कर सके वह उस कार्य को हाथ मे ले। लडने वालो के पास गोला, बारूद, खाना पानी इत्यादि ठीक समय पर पहुँचता रहना चाहिये। आवश्यकता पडने पर हथियार भी चलाना पडेगा। तुममें से कोई मेरी बहिन के बराबर हो, कोई माता के समान। अपने बाप की, अपने ससुर की, अपने पति की अपने भाई की लाज तुम्हारे हाथ है। ऐसे काम करना जिसमें अपने पुरखो को कीर्ति मिले। मैंने नगर का प्रबन्ध कर दिया है। तुम्हारी आवश्यकता मुझको किले में है। मेरे साथ रहना। बीच बीच में छुट्टी मिल जाया करेगी, तब घर हो आया करो।' झलकारी बोली, 'मैं सरकार अपने आदमी के पासइ रैहो। अपुन ने उनाव, फाटक की तोप उनखो सौपी है।' रानी ने मुस्कराकर कहा, 'ऐसोइ हुइहै झलकारी। अपने आदमी के पास रहियो, पै ऊको नाओ तो बताओ।' झलकारी घू घट काढ कर बोली, 'हू—अबईं तो बताओ तो।' सब स्त्रिया हँस पडी। रानी ने कहा, 'अब एक बार सब भगवान का नाम लो, 'हर हर महादेव।' सब स्त्रियो के कंठ से ध्वनित हुआ, 'हर हर महादेव।' उन कोमल, किन्तु दृढ कठो का वह निनाद किले की कठोर दीवालो से जा टकराया। उसकी भाई महादेव के मन्दिर में लौट पड़ी। हुआ 'हर हर महादेव' अनन्त दिशाओ में, अनन्त काल में वह अनन्त, अमर नाद समा गया। महल के पास सिपाहियो के कोठे थे। उनमें नवागन्तुक पठान भी थे। हल्ले को सुनकर हथियार लेकर बाहर निकल आये। बुन्देलखण्डी सिपाहियो ने उस हल्ले का उनको सविस्तार अर्थ समझाया।

३५० झांसी की रानी उनका अगुआ गुलमुहम्मद बोला, 'बाई जहां की औरत लडने को ऐसा तैयार है, वहा का मरद तो आसपास को चक्कर खिला देगा । और हम लोग—हम लोग—खुदाकसम—इस मुलक के लिये सब मर मिटेगा । वकत आने दो, बाई वक़्त !' पठानो ने दात मीसकर मन ही मन प्रण किया ।