झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)
Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography
वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंलक्ष्मीबाई ४७ मोतीबाई—'दयासागर, परिवरदिगार, रहीम...।' बखिशन—'मैं तुम्हारा मुँह मीड दूँगी। बतलाओ वह नाम जिसको मुसलमान लोग दिनरात जपते हैं, नही तो तुम्हारी गत बनाऊँगी।' मीतीबाई ने धीरे से कहा, 'खुदा।' बखिशन ने उसका सिर पकडकर कन्धे से लगा लिया।- बोली, खुदा से दूर हो या उसके पास ?' मोतीबाई ने उत्तर दिया, 'दूर हूँ दीदी। यदि अच्छे दिन आये तो ब्याह करूंगी।' रानी के सामने आने को थी कि मोतीबाई ने बखिशन से कहा, जूही से कुछ मत पूछना। वह सरदार तात्या टोपे को प्राण दिये बैठी है, पर उन्होने आज तक प्यार की दो बाते भी उससे नही की।' 'नही पूछूंगी', बखिशन ने आश्वासन दिया। रानी समझ लिया। छेड़छाड़ नही की। झलकारी नही आई थी। रानी ने उसको बुलवाया। उसने आते ही रानी के पैर पकड लिये। रानी ने कहा, 'मैंने इसके लिये नही बुलाया था। तू हरसाल आती थी। इस साल अब तक क्यो नही आई ?' 'सरकार', झलकारी ने उत्तर दिया, 'मोसें अपराध हो गयो हतो।' रानी बोली, 'कोई अपराध नही हुआ।' झलकारी—'बछिया घायल तौ हो गई ती।' रानी—'हो गई होगी। मरी तो नही—बच गई।' झलकारी—'सरकार ने मोय और मोरे आदमी खों बचा लओ, नई तर कऊँ ठिकानो न हतो।' रानी—'तुम्हारे आदमी का नाम भूल गई उसको क्या कहते है ?' झलकारी—'ऊँ...ऊँ...।' रानी—'ऊँ ऊँ भी कोई नाम होता है ?' बखिशन ने कहा, 'सरकार, इससे बुन्देलखण्डी बोली में बोले।'