भारतकोश
झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography

वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा

DevanagariHindipublished526 पृष्ठ

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३४८ झाँसी की रानी मोतीबाई ने आग्रह किया, सरकार के मुँह से यहां की बोली बहुत अच्छी लगती है।' जूही ने अनुरोध किया । सुन्दर, मुन्दर और काशीबाई भी पीछे पड गईँ । मुन्दर बोली, 'सरकार बुन्देलखण्डो में बोले तो यह अवश्य अपने पति का नाम बतला देगी। बतलाओगी न झलकारी ? बतला देना भला, नही तो हम लोगो की बात बिगड जायगी।' झलकारी ने उस बारहदरी के वातावरण को परिहास, सौन्दर्य, सुगन्धि और आग्रह से भरा पाया-उसने हामी का सिर झुकाया । रानी ने कहा,'तोरे घर वारे को का नाओ भलकारी ?' झलकारी—'हओ ऐसे सूदऊँ बताओ जात कऊँ ?' रानी—'तौ कैसे बताये पनमेसरी ?' झलकारी—'मोए कौनऊँ धोको देओ। जैसे एक बेर पूँछी हती तैसैं पूँछो अपुन ।' रानी—'आज कौन मिती है ?' झलकारी—'पाँचै महाराज ।' रानी—'दस दिन पाँछै का हुये ?' झलकारी—'पूनै ।' रानी हँस पडी । उन्होने फूलो की एक माला झलकारी के गले में डाली । सिर पर हाथ फेरा । विनोद की समाप्ति पर सब स्त्रिया महादेव के मन्दिर के पास उतर आईं । उतरती जाती थी और पलाश के पेड को हिलाती जाती थी । उसके लाल फूल मालाओ समेत झूम झूम जाते थे । महादेव का मन्दिर छोटा सा है और आसपास का-आगन भी सकरा ही है, परन्तु उसमें बहुत स्त्रिया इकट्ठी थी । चहल पहल को बन्द करके रानी ने स्त्रियो से कहा,'दो चार दिन के भीतर ही अपनी झासी के ऊपर गोरो का प्रहार होने वाला है। तुममें