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झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography

वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा

DevanagariHindipublished526 पृष्ठ

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लक्ष्मीबाई ३४६ से अनेक युद्ध विद्या सीख गई हो। जो जिस कार्य को कर सके वह उस कार्य को हाथ मे ले। लडने वालो के पास गोला, बारूद, खाना पानी इत्यादि ठीक समय पर पहुँचता रहना चाहिये। आवश्यकता पडने पर हथियार भी चलाना पडेगा। तुममें से कोई मेरी बहिन के बराबर हो, कोई माता के समान। अपने बाप की, अपने ससुर की, अपने पति की अपने भाई की लाज तुम्हारे हाथ है। ऐसे काम करना जिसमें अपने पुरखो को कीर्ति मिले। मैंने नगर का प्रबन्ध कर दिया है। तुम्हारी आवश्यकता मुझको किले में है। मेरे साथ रहना। बीच बीच में छुट्टी मिल जाया करेगी, तब घर हो आया करो।' झलकारी बोली, 'मैं सरकार अपने आदमी के पासइ रैहो। अपुन ने उनाव, फाटक की तोप उनखो सौपी है।' रानी ने मुस्कराकर कहा, 'ऐसोइ हुइहै झलकारी। अपने आदमी के पास रहियो, पै ऊको नाओ तो बताओ।' झलकारी घू घट काढ कर बोली, 'हू—अबईं तो बताओ तो।' सब स्त्रिया हँस पडी। रानी ने कहा, 'अब एक बार सब भगवान का नाम लो, 'हर हर महादेव।' सब स्त्रियो के कंठ से ध्वनित हुआ, 'हर हर महादेव।' उन कोमल, किन्तु दृढ कठो का वह निनाद किले की कठोर दीवालो से जा टकराया। उसकी भाई महादेव के मन्दिर में लौट पड़ी। हुआ 'हर हर महादेव' अनन्त दिशाओ में, अनन्त काल में वह अनन्त, अमर नाद समा गया। महल के पास सिपाहियो के कोठे थे। उनमें नवागन्तुक पठान भी थे। हल्ले को सुनकर हथियार लेकर बाहर निकल आये। बुन्देलखण्डी सिपाहियो ने उस हल्ले का उनको सविस्तार अर्थ समझाया।