भारतकोश
झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography

वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा

DevanagariHindipublished526 पृष्ठ

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पृष्ठ 357

३४६ झाँसी की रानी मानो सौन्दर्य को सुगन्धि प्रदान की गई हो। लाल फूलो पर बेला, 'चमेली, गेंदा और जूही की-रगबिरंगी मालाएँ ऐसी लगती थी जैसे प्रभात के समय ऊषा की किरणो ने गुलाल बिखेर दी हो। इस वृक्ष के नीचे कुआ था और कुएँ के ऊपर एक बारहदरी । इस बारहदरी की रक्षा के लिये ऊँचा परकोटा था। इसके पूर्व में बहुत ऊँचाई पर किले की पश्चिमी बुर्ज और उसके पीछे जरा दूर महल । पूजन के पश्चात स्त्रिया पलाश के वृक्ष के पास से सीढ़ियो द्वारा बारहदारी में इकट्ठी हो हो जा रही थी। रानी वही थी, । वही सिन्दूरोत्सव हो रहा था—हल्दी कूँ कूँ । रानी विधवा थी, इसलिये वह स्वयं सिन्दूर नही दे रही थी, परन्तु वहा भाऊ बख्शी की पत्नी थी और भी अनेक सधवाये थी, जो आपस मे सिन्दूर दे रही थी और किसी न किसी बहाने एक दूसरे के पति का नाम लिवाने का हंस हस कर प्रयत्न कर रही थी । मोतीबाई ने भाऊ बख्शी की पत्नी से कहा, 'तुम अपने देवर को क्या कहकर'पुकारोगी ?' बख्शिन—मेरे देवर हैं ही नही । मोतीबाई—'होता, तो बख्शिनजू उसको कैसे पुकारती?' बख्शिन—'लाला कहती ।' रानी—'और बुन्देलखण्ड में लाला के लिये दूसरा शब्द क्या है ?' बख्शिन—'सरकार, भउआ ।' सब हँस पडी । बख्शिन ने क्रोध में मुद्रा बनाकर कहा, 'महारानी साहब की सहायता से हरा लिया, नही तो मै इतना छकाती कि ये सब याद करती ।' रानी बोली, 'तुम इन सबके लिये अकेली ही बहुत हो ।' बख्शिन मोतीबाई के पीछे पड गई । उसे पकड़कर अकेले में ले गई । बख्शिन—'बतलाओ'भगवान का दूसरा नाम क्या है ?' मोतीबाई—'राम, कृष्ण, मुरारी, परमात्मा, अल्लाह ।' बख्शिन—'ओर, ओर ?'