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झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography

वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा

DevanagariHindipublished526 पृष्ठ

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लक्ष्मीबाई ३४५ पूरन कोरी उनाव फाटक पर नियुक्त किये गये। दीवान जवाहरसिंह के हाथ में सम्पूर्ण नगर और नगर के फाटकों की रक्षा का भार सौंपा गया। किले में हर बुर्ज पर सब मिलाकर इक्यावन बडी बडी तोपे साजी सँभाली गईं। दक्षिणी बुर्ज की तोपे गुलाम गौसखां के सञ्चालन में, पूर्व और उत्तर की तोपे भाऊ बख्शी के हाथ में और पश्चिम की तोपे दीवान रघुनाथसिंह के अधिकार में दी गईं। किले में पठान, चुने हुये बुन्देलखण्डी सैनिक और रानी की स्त्री सेना की नियुक्त कर दी गई। सब सैनिक लगभग चार हजार होगे। पानी का प्रबन्ध बहुत अच्छा न था, परन्तु सन्तोषप्रद था—किले के पश्चिमी भाग में—शंकरगढ में जहा महादेव जी का मन्दिर है—एक कुआँ था उसी से सारी सेना को पानी पिलाने के लिये ब्राह्मण नियुक्त कर दिये गये। चैत की अमावस हो गई। नवरात्र का आरम्भ हुआ। किले में गौर की स्थापना हुई। रानी ने धूमधाम के साथ सिन्दूरोत्सव मनाया। गौर के सामने चांदी ही चांदी के बर्तनो की तड़क भड़क और मन्दिर के बाहर सबके लिये भीगे चने और बताशो का प्रसाद। नगर की स्त्रिया सजधज के साथ उत्सव में शरीक हुई। फूलो की सुन्दरता और सुगन्धि से महादेव जी का मन्दिर भर गया। स्त्रिया थोडी देर के लिये आने वाली विपत्ति को भूल गईं। वे अपने किले में थी, अपनी हँसती-मुस्कराती रानी के पास। उनकी तोपे, उनके गोलन्दाज, उनके सिपाही आसपास और अपनी रक्षा का पुख्ता हौसला अपने मन में। फिर किस बात की चिन्ता थी? महादेव जी के मन्दिर के समीप पलाश का एक वृक्ष था। उसमें इन दिनो प्रति वर्ष बडे बडे लाल फूल लगते थे और तीक्ष्ण ग्रीष्म ऋतु में उसके हरे चिकने बडे पत्ते छाया दिया करते थे। जङ्गल का अवशेष और स्मारक, महादेव के मन्दिर का अकेला पडौसी-वह वृक्ष काटने से बचा दिया गया था। नवरात्र में वह पलाश लाल फूलो से गस गया। स्त्रिया फूलो की एक एक माला उसकी भी डालो को पहिना दे रही थी।