झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)
Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography
वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३४४ झाँसी की रानी रानी के पास जब ये पठान आये तब वे बडी हीन अवस्था में थे। कपडे सब फट गये थे। न जाने कितने दिन से उनको भरपेट भोजन न मिला था। अच्छे हथियार पास न थे। कुछ के पास तो सिवाय लाठी या छुरी के और कुछ न था। रानी ने उनको सब प्रकार की सुविधाये दी। उन्होने प्रण किया, 'स्वराज्य के लिये रानी के कदमो में अपने सबके सिर देगे।' इन पठानो ने अपने प्रण को जैसा निभाया उसको इतिहास जानता है और झासी की लोक परम्परा उसको नही भूली और न कभी भूलेगी। पीरअली को कुछ पठान मिले। उसने पूछा , 'तुम्हारा कौन मुल्क है खान ?' 'झासी अमारा मुलक है बाबा, तुम्हारा मुलक ?' 'मैं झासी का ही रहने वाला हूँ।' 'तब अम तुम बाई बाई हे बाबा ।, 'बाईसाहब का राज्य है खान' 'बेशक हे। और हमारा तुम्हारा बी।' झासी नगर के कोट के सब फाटको पर बडी और छोटी तोपो का उचित प्रबन्ध कर दिया गया। बारूद और गोले फाटको की बुर्जो में इकट्ठे कर दिये गये और निरन्तर युद्ध सामग्री तथा रसद भेजने का प्रबन्ध कर दिया गया। फसीलो के छेद्रो मे से बन्दूको की मार का काम जिन सिपाहियो को दिया गया, उनकी तथा उनके अफसरो की उत्कृष्ट व्यवस्था करली गई। सबसे बडी बात यह हुई कि एक स्थान से दूसरे स्थान को और सब स्थानो से रानी के पास तथा उनके पास से सब स्थानो सब मोर्चों को तुरन्त समाचार और आज्ञाये भेजने का बहुत अच्छा बन्दोबस्त कर लिया गया। ऐसा विश्वास था कि रोज दक्षिण की ओर से आ गया, इसलिये सागर-खिडकी, ओर्छा फाटक और सैयर फाटक का खास इन्तजाम किया गया। दीवान दूल्हाजू ओर्छा फाटक पर, पीरअली सागर खिडकी पर, कुंवर खुदाबख्श सैयर फाटक पर, कुंवर सागरसिंह , खंडेराव फाटक पर,