झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)
Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography
वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंलक्ष्मीबाई ३४३ इसी समय रोज को प्रधान सेनापति कैम्बैल का आदेश मिला— 'तात्या टोपे ने चरखारी के राजा को घेर लिया है। पहले चरखारी की सहायता करो।' रोज ने आदेश 'का उल्ल घन किया—वह झासी के महत्व को जानता था। उसने उत्तर दिया, 'मै आज्ञा की अवज्ञा के लिये क्षमा चाहता हूं। चरखारी का गिर पडना या खडा रहना कुछ मूल्य नही रखता। मुझको पहले झासी से निबटना है।' चरखारी को राजभक्ति का पुरस्कार मिल गया। तात्या टोपे ने चरखारी से २४ तोपें और तीन लाख रुपये छीन लिये, और कालपी लौट आया। पीरअली ने जो समाचार रानी के पास भिजवाया वह बहुत अनोखा न था, परन्तु उसको काफी महत्व दिया गया। उसने बतलाया कि पलटने अमुक-अमुक नम्बर की हैं और प्रत्येक पलटन में इतने सिपाही। तोपो की गिनती बतलाई और प्रबन्ध की खूबी को प्रकट किया। रोज की कुल सेना सात हजार कूती गई। नाना भोपटकर तक को पीरअली का विश्वास हो गया और वह- रहस्य के कार्यों में शामिल किया जाने लगा। जब मोतीबाई को ही पीरअली पर सन्देह न रहा तब रानी को सन्देह हो ही क्यो सकता था ? पीरअली ने नवाब साहब के पास भाडेर समाचार भेज दिया और कहला भेजा कि अब बहुत समय तक कोई खबर न मिल सकेगी। पीरअली भयानक खेल खेल रहा था। जिस दिन पीरअली लौटकर आया उसी दिन राहतगढ के भागे हुये लगभग पाच सौ पठान रानी के शरणार्थी हुये। रानी ने उनको नौकर रख लिया। उनके एक सरदार का नाम गुलमुहम्मद था। इन लोगो का समाचार पीरअली ने रोज को नही भेज पाया और इस बात का उसको खेद था।